राजनीति
उत्पीड़ित हिंदुओं के लिए भारत- प्रधानमंत्री को नागरिकता बिल पर सख्त रहना होगा

आशुचित्र- 

  • प्रधानमंत्री ने नागरिकता विधेयक पर बहुत सही बातें कही हैं। उनको असम में छोटे राजनीतिक फायदों के लिए अपनी बात से हटना नहीं चाहिए।
  • भारत ही एकमात्र देश है जो हिंदुओं को आश्रय दे सकता है और यह करने का सही तरीका है नागरिकता विधेयक।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह नागरिकता संशोधन विधेयक में मामूली बदलाव करने पर विचार कर रहे हैं। नागरिकता संशोधन विधेयक जो कि मुस्लिम बहुल्य देशों जैसे पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान के उत्पीड़ित अल्पसंख्यक जैसे हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध और ईसाई समुदाय के लोगों को बिना वैध दस्तावेजों के नागरिकता प्रदान करता है, उसका पूर्वोत्तर में विरोध किया जा रहा है। स्थानीय लोगों को डर है कि कहीं बंगाली प्रवासियों के कारण वहाँ बड़ी मात्रा में जनसांख्यिकी परिवर्तन न हो।

जबकि, प्रधानमंत्री मोदी ने 3 फरवरी को श्रीनगर के पास विजयनगर में लोगों को कहा कि वह भारत माँ के उत्पीड़ित बच्चों के साथ खड़े रहेंगे। अमित शाह ने दिल्ली में कहा कि उनकी पार्टी नागरिक विधेयक पर तभी कार्य करेगी जब, सभी राजनीतिक पार्टियों में आम सहमति होगी।

हालाँकि इस विधेयक पर आम सहमति बनाने के प्रयासों का विरोध करना अशिष्ट होगा इसलिए यह राज्यसभा में पारित हो जाएगा। जो हमारे पड़ोसियों द्वारा सताए जा रहे हैं उन हिंदुओं और अन्य भारतीय समुदायों के लिए भारत अंतिम गृहभूमि होने का दावा नहीं कर सकता है और इसलिए राज्य सभा में आम सहमति पाने के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) समझौता कर सकती है। बांग्लादेश से उत्पीड़ित हिंदुओं का गढ़ बनने का दावा खोने से बेहतर है कि भाजपा राज्य सभा में हार जाए।

हमारा उदार बुद्धिजीवी वर्ग इस पर तीखी ज़ुबान में बोल रहा है। एक तरफ वह राष्ट्रीय नागरिक सूची (एनआरसी) के विरोध में ज़हर उगल रहा है, जो कि 1971 के बाद असम आए हुए अवैध प्रवासियों को बंगलादेश वापस भेजने की बात करता है। पिछले साल अंतिम ड्राफ्ट में बचे 40 लाख लोगों में से अधिकांश बंगाली हिंदू थे। पर जैसे ही नागरिक संशोधन विधेयक की बात आई तो सभी धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी पलट गए और असम समझौते की बात करने लग गए। यह सबसे नीच स्तरीय पाखण्ड है।

इसको सुलझाने का यह तरीका हो सकता है कि दोनों बातों पर ध्यान दिया जाए; असमियों का अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक हो जाने का डर है और दूसरा कि बंगाली एकमात्र उस देश में राज्यहीन हो जाएँगे जहाँ उन्हें इस्लामी ताकतों से खतरा नहीं है। इसका समझौता इस तरह हो सकता है कि हिंदू बंगालियों को भारत की नागरिकता दे दी जाए और उनमें से कुछ को वित्तीय सहायता प्रदान की जाए ताकि वह दूसरे राज्यों में जाकर बस सकें और पूरा भार असम पर ना आए।

प्रवासियों की मदद करने के लिए ही नागरिक विधेयक लाया गया था। हालाँकि यह विधेयक उन हिंदुओं की नागरिकता के लिए मजबूरियों पर भी ध्यान देता जो पाकिस्तान चले गए, पर असली चुनौती बंगलादेश के बंगालियों के लिए भी वही समझौता करने में है। सिर्फ क्योंकि उनकी गिनती ज़्यादा है जो पाकिस्तान जा रहे है, उनका मुद्दा किसी राजनीतिक सहमति पर नहीं छोड़ा जा सकता, जहाँ भाजपा के अलावा सभी राजनीतिक पार्टियों का केंद्रीय मुद्दा अल्पसंख्यकों का वोट हासिल करना  है।

भारत को उत्पीड़ित हिंदुओं के बारे में हर जगह बोलना बंद करना पड़ेगा, ना कि सिर्फ पड़ोसी मुस्लिम बाहुल्य देशों में। एक ही ऐसा देश है जो हिंदू प्रवासियों को जगह दे सकता है, और वह है भारत। नागरिकता विधेयक इस बात को साबित करने का सही रास्ता है।

भारत पाकिस्तान की तरह धर्मशासित देश नहीं हो सकता। यह हमेशा बहुलवादी गणराज्य रहेगा। पर एक हद तक इसे दुनिया-भर के हिंदुओं को शरण देनी चाहिए। यह सौदा रोहिंग्याओं पर लागू नहीं होता, क्योंकि उनको शरण देने के लिए 50 से ज़्यादा मुस्लिम बाहुल्य देश है जहाँ वे शरण प्राप्त कर सकते हैं, पर बंगलादेशी हिंदुओं के लिए सिर्फ एक है, भारत।

प्रधानमंत्री ने नागरिकता विधेयक पर बहुत सही बातें कही हैं। उनको असम में छोटे राजनीतिक फायदों के लिए अपनी बात से हटना नहीं चाहिए। अगर वे इस पर समझौता करते हैं तो उनके राजनीतिक विरोधी भारत को हिंदुफोबिया के विचारों से सराबोर देंगे। तब भाजपा और कांग्रेस एक दूसरे से भिन्न नहीं रहेंगे।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।