राजनीति
पीएफआई शांति और सुरक्षा के लिए एक सांप्रदायिक चुनौती है

नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में उत्तर प्रदेश में भड़की आग के बाद राज्य सरकार ने अन्य उपायों के साथ ही चरमपंथी संगठन पाॅपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) पर प्रतिबंध लगाने की संस्तुति केंद्र सरकार से कर दी है।

गौरतलब है कि प्रदेश अध्यक्ष वसीम अहमद, कोषाध्यक्ष नदीम और मंडल अध्यक्ष अशफाक समेत प्रदेश पुलिस अब तक 25 पीएफआई सदस्यों को हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार कर चुकी है। वसीम अहमद ने शुरुआत में अपनी पहचान छुपाने का प्रयास किया परंतु कॉल विवरण की गहनता से छानबीन के बाद वसीम की पहचान साबित हो गई।

संगठन के विभिन्न दफ्तरों से अयोध्या और आतंकवाद आदि विषयों पर बहुत सी भड़काऊ सामग्री बरामद हुई है। इंटेलिजेंस ब्यूरो द्वारा संचालित मल्टी एजेंसी सेंटर के अनुसार पीएफआई ने हिंसा फैलाने के लिए प्रदेश में कई स्थानों पर मीटिंग की थीं।

नागरिकता कानून पर भड़काऊ प्रचार और दंगे भड़काने में पीएफआई की देशव्यापी और अग्रणी भूमिका सामने आई है। जहाँ असम में पीएफआई के शीर्ष नेतृत्व को गिरफ्तार किया गया है वहीं दिल्ली और कर्नाटक के मंगलौर शहर में हुई हिंसा में भी पीएफआई की स्पष्ट भूमिका उजागर हुई है। नागरिकता कानून पर हुई हिंसा के बाद सुर्खियों में आई पीएफआई का उग्रवाद से पुराना नाता रहा है। नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट नामक चरमपंथी संस्था के उत्तराधिकारी के रूप में सन 2006 में केरल में पीएफआई का उदय हुआ।

पहली बार यह संगठन राष्ट्रीय सुर्खियों में तब आया जब इसके कार्यकर्ताओं ने जुलाई 2010 में ईशनिंदा का आरोप लगाकर केरल के न्यूमैन कॉलेज के प्रोफेसर डीजे जोसेफ का दाहिना हाथ काट दिया था। प्रोफेसर जोसेफ का हाथ काटने का निर्णय पीएफआई कि राज्य में चल रही दारुल खदा नामक कई तालिबानी अदालतों में से एक में लिया गया था। हमले की जांच के दौरान केरल पुलिस ने सात शहरों में छापेमारी कर बड़ी मात्रा में कैडर के घरों से हथियार और अन्य आपत्तिजनक सामग्री बरामद की थी।

इसी क्रम में पीएफआई कार्यकर्ताओं से तालिबान और अलकायदा की सीडी व बड़ी मात्रा में राष्ट्र विरोधी और सांप्रदायिक साहित्य भी मिला था। पीएफआई कैडर के हौसले कितने बुलंद हैं यह इसी से पता चलता है कि पुलिस द्वारा की जा रही छापेमारी पर रशीद नामक एक अभियुक्त ने पुलिसकर्मियों को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दे दी थी। सन 2013 में कन्नूर के नरथ इलाके में पुलिस ने पीएफआई के ट्रेनिंग सेंटर पर छापा मारकर फिर एक बार हथियारों सहित 21 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया था।

सन् 2011 में मैसूर के एक कालेज से सुधींद्र और विग्नेश नामक दो युवकों के अपहरण और हत्या के मामले में भी पीएफआई से संबद्ध संगठन कर्नाटक फोरम ऑफ डिग्निटी के छह सदस्य गिरफ्तार किए गए। इन युवकों का अपहरण संगठन के लिए धन उगाही के मकसद से किया गया था।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं में डर बैठाने के लिए फ्रंट ने कई हत्याओं को अंजाम दिया है। कन्नूर में अखिल भारतीय विधार्थी परिषद के सचिन गोपाल व विशाल की हत्या, बंगलौर में रुद्रेश और मूदबिद्री में प्रशांच पुजारी की जघन्य हत्याओं के अलावा कई अन्य हत्याओं में पीएफआई के सदस्यों की गिरफ्तारी हुई है।

द हिंदू अखबार के एक समाचार के अनुसार केरल सरकार द्वारा दिए गए एक हलफनामे में पीएफआई को अकेले केरल में 27 हत्याओं, 86 हत्या के प्रयासों और 106 सांप्रदायिक घटनाओं का दोषी माना है। इन हमलों में ज्यादातर पीड़ित संघ कार्यकर्ता ही रहे हैं। फरवरी 2015 में शिमोगा में पीएफआई की एक रैली के दौरान सदस्यों द्वारा की गयी हिंसा में दो व्यक्तियों की जान चली गई थी। केरल के भूतपूर्व मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन ने फ्रंट पर पैसे व मतांतरण द्वारा केरल के इस्लामीकरण करने का आरोप लगाया था।

पीएफआई पर लव जिहाद को बढ़ावा देने के भी कई आरोप लगते रहे हैं। “शहंशाह और सिराजुद्दीन” बनाम “स्टेट ऑफ़ केरल” केस में केरल हाई कोर्ट के जस्टिस केटी शंकरण ने डीजीपी को लव जिहाद की विवेचना के आदेश दिए थे।

स्पेशल ब्रांच की रिपोर्ट का हवाला देते हुए रिपोर्ट ने पीएफआई और उससे संबद्ध कैंपस फ्रंट पर आरोप लगाए कि यह संगठन उच्च शिक्षित और पेशेवर व्यवसायओं या निजी क्षेत्र में कार्यरत हिंदू और ईसाई युवतियों को अपना निशाना बनाते हैं।

मार्च 2018 की टाइम्स ऑफ इंडिया  की एक रिपोर्ट में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी के हवाले से लव जिहाद के जरिए धर्मांतरण को प्रेरित करने के लिए बाकायदा पीएफआई के एक सेंटर का उल्लेख आया थ। सत्यसारिणी नामक मंजेरी स्थित इस सेंटर में गैर मुस्लिमों को मृत्योपरांत विनाश की तस्वीर और मुस्लिमों पर अत्याचार के वीडियो दिखाकर धर्मांतरण के लिए प्रेरित किया जाता था।

परंतु सबसे ज्यादा चिंताजनक विषय फ्रंट के आतंकवादी संगठनों से संबंध हैं। पूर्व में प्रतिबंधित स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) के ही बहुत से सदस्यों द्वारा शुरू हुई पीएफआई के अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) से संबंध प्रकाश में आते रहे हैं। कन्नूर के ही वल्लपत्तनम से फ्रंट के करीब 40-50 लोग आईएसआईएस में शामिल हो चुके हैं।

श्रीलंका में हुए धमाकों के मास्टरमाइंड को इस्लामी कट्टरवादी बनाने में भी फ्रंट का नाम सामने आया है। जाने माने रक्षा विशेषज्ञ, लेफ्टिनेन्ट जनरल पीसी कटोच ने पीएफआई पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से साठगांठ की बात कही है। स्वयं कई मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने फ्रंट की गतिविधियों पर चिंता जताई है। सुप्रसिद्ध मलयालम लेखक मोहिउद्दीन कच्चेरी चेताते हैं कि पीएफआई सरीके संगठन मुस्लिम युवकों को अल मौदूदी की कट्टरपंथी राह पर ले जाकर केरल को तालिबानीकरण की ओर धकेल रहे हैं।

आज करीब नौ और संगठनों का अपने साथ विलय करके पीएफआई एक राष्ट्रव्यापी चुनौती बन गई है। इसका जाल सुदूर मणिपुर तक पहुँच चुका है। दिल्ली के शाहीनबाग में, जहाँ पिछले तीन सप्ताह से नागरिकता कानून के विरोध में धरना चल रहा है, फ्रंट का राष्ट्रीय मुख्यालय है। बहुत संभव है कि यह शक्ति प्रदर्शन प्रतिबंध की स्थिति में मुख्यालय को घेरे रखने और विरोध को उग्र बनाने का प्रयास हो।

कहने को यह संगठन मुस्लिम और मानवीय अधिकारों की रक्षा का बीड़ा भरता है परंतु इसका सांप्रदायिक और उग्रवादी चरित्र किसी से छिपा नहीं है। फ्रंट प्रजातंत्र द्वारा प्रदत्त अधिकारों का बड़ी चतुराई से उपयोग कर अपने सांप्रदायिक एजेंडे को आगे बढ़ाता है। इसके कार्यक्रम एकता मार्च और फ्रीडम मार्च जैसे शब्दों का उपयोग कर अलगाव और इस्लामीकरण को खुलकर मंच देते हैं।

हाथ में तिरंगा लेकर उपद्रव करना और आजादी जैसे नारों का अलगाववाद के लिए इस्तेमाल करना इसकी विशिष्ट शैली है। संगठन के पास तेजस नाम का अपना एक दैनिक अखबार भी है।

यह दुख का विषय है कि केरल की वाम सरकार और कांग्रेस राजनीतिक कारणों से पीएफआई का बचाव करती आई हैं। जहाँ केरल की वाम सरकार फ्रंट को विपक्ष के वोट काटने का उपयोगी माध्यम समझती हैं वहीं कांग्रेस ने पिछले कर्नाटका विधान सभा चुनाव में तटीय कर्नाटक की काफी सीटों पर पीएफआई और एसडीपीआई को अपने उम्मीदवार न उतारने के लिए राजी कर फ्रंट से एक तरह का गुपचुप गठबंधन कर लिया था।

परंतु पिछले दिनों हुई हिंसा में फ्रंट की राष्ट्रव्यापी भूमिका का संज्ञान लेने के बाद और केंद्र की दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के चलते अब उसकी मुश्किलें बढ़ गई हैं। झारखंड सरकार पीएफआई पर पहले ही प्रतिबंध लगा चुकी है।

अब उत्तर प्रदेश और असम सरकार ने भी केन्द्र सरकार से फ्रन्ट पर प्रतिबंध की मांग कर दी है। कर्नाटक सरकार ने भी कहा है कि एक वह न्यायिक जांच के बाद संगठन पर प्रतिबंध की मांग करेगी। दो साल पहले टेकनपुर में गृह मंत्रालय के तत्वाधान में भी पुलिस महानिदेशकों की बैठक में फ्रंट पर प्रतिबंध लगाने को लेकर विस्तृत चर्चा हुई थी। पिछले दिनों हुई हिंसा में पीएफआई की प्रमुख भूमिका के मद्देनजर देखना होगा कि केंद्र कितनी जल्दी फ्रंट पर कार्यवाही करता है।

विकास सारस्वत उद्यमी और लेखक हैं जो @VikasSaraswat के माध्यम से ट्वीट करते हैं।