राजनीति
क्यों हैदराबाद रहा है ओवैसी का गढ़

हैदराबाद में चुनावों से पूर्व ही परिणाम स्पष्ट है। “ओवैसीच जीतेगा”, यह सामान्य अवधारणा है।

आठ लोकसभा चुनावों से ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) हैदराबाद के संसदीय क्षेत्र से जीतती आ रही है, नौ बार अगर आप 1984 के चुनाव को भी गिनते हैं तो जहाँ असदुद्दीन ओवैसी के पिता ने निर्दलीय के रूप में यह सीट जीती थी। ओवैसी को अपने पिता से यह सीट विरासत में मिली और वे चौथी बार इसे जीतने की तैयारी में हैं।

संसदीय क्षेत्र स्वयं में ही लाभप्रद है

70 के दशक के अंत में और 80 की दशक की शुरुआत में इस क्षेत्र का ध्रुवीकरण हुआ और रिपोर्ट के अनुसार 1978 से 1985 के मध्य 14 सांप्रदायिक घटनाएँ हुईं जिसमें 150 से अधिक लोगों की जान गई। 1984 में 3,481 मतों के अंतर से दर्ज की गई जीत में पुराने शहर का विशेष योगदान था, वहीं विकाराबाद, तंदुर और चेवेल्ला ने जीत के अंतर को कम किया।

2008 में हैदराबाद संसदीय क्षेत्र के परिसीमन किए जाने से ये क्षेत्र अलग संसदीय क्षेत्र में चले गए और एआईएमआईएम के प्रभुत्व वाला क्षेत्र बचा रह गया। इसके बाद पार्टी ने बड़े अंतर से जीत दर्ज की। मतदाता सूची में 65 प्रतिशत मुस्लिमों के नाम और दोनों ओवैसी भाइयों की मुस्लिम मसीहा के समान छवि ने उनकी जीत सुनिश्चित कर दी।

संभ्रांति को बनाए रखा गया

इसके अलावा ओवैसी मुस्लिमों को अपने पत्र में बनाए रखने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। उन्हें कथित शत्रु भाजपा, मोदी सरकार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विरुद्ध जोड़े रखते हैं। पीड़ित होने के भाव वाले कथात्मक (नैरेटिव) ने राज्य और उपरोक्त सभी संस्थाओं में उनके विश्वास में सेंध लगा दी। रोष और उन्माद उनमें निहित कर दिया गया और प्रायः उन्हें समय आने पर तैयार रहने और विरोध करने के लिए भी कहा जाता है।

इन सबके अलावा उनके मन में यह बात बैठा दी गई है कि वे लोग केवल उनकी पार्टी के कारण ही सुरक्षित हैं और जनता उनकी गिरफ्त में आ गई। उनका वर्तमान उद्देश्य है ‘गौरव को वापस पाना’- अत्याचार के विरुद्ध और बेहतर जीवन के लिए एकजुट होकर लड़ने का मुस्लिमों को आह्वान, जिससे वे वंचित रहे हैं, यह उन्हें छू जाता है, उनके जुनून को बरकरार रखता है और घृणा की चिंगारी को भी सुलगाए रखता है। इससे भी महत्त्वपूर्ण यह कि ये लोगों को उनसे और एक दूसरे से किसी उद्देश्य के कारण जोड़े रखता है।

विकास पर विश्वास न करें

पुराने शहर में लोग सोचते हैं कि वे सुरक्षित और शांतिपूर्ण रूप से सिर्फ इसलिए रह पा रहे हैं क्योंकि एआईएमआईएम है और वे इससे अधिक और कुछ नहीं सोचते। जब उनसे लगभग अमानवीय परिस्थितियों, जहाँ पानी-बिजली का अभाव, बुरी सीनिटेशन सुविधा व खराब सड़कें हैं, में रहने के विषय में पूछा जाता है तो वे इसके प्रति उदासीन हैं।

नए हैदराबाद के क्षेत्रों से और इस क्षेत्र में अंतर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। यह शहर एक क्रियाशील शहर के रूप में सूर्खियों में बना रहता है, जीवन यापन की गुणवत्ता, व्यापार करने में सहायक, डिजिटल गवर्नेन्स आदि पैमानों पर अव्वल रहता है।

असदुद्दीन के चुनाव अभियान में गंदी गलियों में लोगों को पानी, बिजली और बेहतर नाली प्रबंधन के लिए मांग करते देखा जा सकता है। इसके उत्तर में वे समय आधारित सुधार का वादा करते हैं लेकिन यह सिर्फ चुनावों के आसपास ही होता है।

इस निम्न स्तर के विकास के साथ जहाँ आधारभूत आवश्यकताओं की भी पूर्ति नहीं की जाती है, यह विडंबना भी है और पहेली भी कि तेलंगाना के सभी सांसदों में से ओवैसी सांसदों के स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीलैड्स) के फंड का सर्वाधिक लाभ (129 प्रतिशत) उठाते हैं।

निस्संदेह हर कार्य के विवरण के बिना एक मोटे तौर पर दी गई जानकारी से बहुत कम पता लग सकता है। केंद्रीय सूचना आयुक्त (सीआईसी) ने पिछले वर्ष एमपीलैड्स की कानूनी संरचना की मांग की थी जिससे सांसदों को ज़िम्मेदार और जवाबदेह बनाया जा सके।

दोनों भाइयों के मेल-जोल पर प्रश्न नहीं किया जा सकता- दोनों भाई हैदराबाद में अपने ‘विकास कार्य’ का प्रचार कर रहे हैं। अचानक से हर परियोजना, हर प्रगति रिपोर्ट की जानकारी समाचार पत्रों में देखी जा सकती है। कथित तौर पर ओवैसी मीडिया के प्रति उदार और कृपापूर्ण हैं।

लोकतंत्र पर विश्वास न करें

यदि एक तरफ संभ्पांति फैलाकर अपना दबदबा बरकरार रखा जा रहा है तो दूसरी ओर बूथों पर नियंत्रण भी है। उनके क्षेत्र में होराफेरी प्रचलित है, जहाँ पोलिंग एजेंट दिन के एक समय बाद बूथ को अपने नियंत्रण में ले लेते हैं।

कम मतदान उनकी सहायता करता है। हैदराबाद में लोग एआईएमआईएम की सुनिश्चित जीत को अपना चुके हैं। अवश्य ही प्रत्यक्ष रूप से ओवैसी भाई लोगों का मतदान के लिए आह्वान करते हैं।

इसके अलावा रिपोर्ट के अनुसार एआईएमआईएम ने हैदराबाद में आधार कार्ड से मतदाता पहचान पत्र को लिंक कराने का भी विरोध किया था। मतदाता सूची तैयार करने वाले अधिकारियों से साँठ-गाँठ करके पार्टी फर्जी मतदाताओं को सम्मिलित करवा लेती है जो बंद घरों में, गुमनाम पतों में और काली जमीन पर होते हैं।

एख शिक्षित और संभ्रांत मुस्लिम के रूप में करते हैं आकर्षित

जो भाग सबसे खतरनाक है, वह असदुद्दीन का शांत और परिष्कृत बाह्य रूप है जिसके भीतर उनका कुटिल एजेंडा छुपा हुआ है। जहाँ उनके भाई अकबरुद्दीन को हंगामा करने वाले के रूप में देखा जाता है, वहीं असदुद्दीन अपनी वाकशैली और व्यवहार के कारण उचित सोच वाले सैम्य और नम्र व्यक्ति लगते हैं। सोने पर सुहागा है उनकी शिक्षा जो एक पिछड़े समुदाय में उनके प्रशंसकों की संख्या बढ़ाने में सहायता करती है।

और भले ही लोग उनके छोटे भाई को उतना नहीं मानते हों लेकिन ओवैसी के आकर्षण के आगे वे इसपर प्रश्न नहीं कर पाते हैं कि ओवैसी उनके भाई के भाषणों के प्रति खेद व्यक्त क्यों नहीं करते हैं और वे साथ क्यों हैं और क्या उनका एजेंडा एक ही है? असदुद्दीन की फैन फॉलोइंग बढ़ती रहती है।

आगे का दुर्गम मार्ग

“हैदराबाद की संसद सीट अत्याचार, भेदभाव और शोषण के विरुद्ध एक आवाज़ है।”, 30 मार्च को असदुद्दीन द्वारा एक ट्वीट में कहा गया और इसके साथ एक वीडियो था जिसमें उनके भाई लोगों को मतदान के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे। पहला, क्या यह एक लोकसभा सांसद को वोट मांगने के लिए योग्य बनाता है- यह कथन हिंदुओं के कल्याण और हितों को परे रखता है।

लेकिन उससे भी अधिक यह कि इन भाइयों ने कुछ समय से जिस धारणा पर चलाना शुरू किया है, वह इस पंक्ति में झलकती है- मुस्लिमों से और आगे इस पार्टी के आकर्षण को लेकर जाना। एक “संयुक्त संस्कृति” जैसा कि वे कहते हैं जिसमें दलित, आदिवासी, आदि सम्मिलित हैं।

और आगे बढ़ते हुए हाल ही में एक टीवी चैनल के साक्षात्कार में उन्होंने कहा, “हैदराबाद के संसद की सीट संघ के अत्याचार को रोकने का इंस्ट्रुमेंट है। यह सीट असदुद्दीन ओवैसी की नहीं बल्कि भारत के उन 30 करोड़ लोगों की है जो नरेंद्र मोदी की फासीवादी विचारधारा का विरोध करते हैं।”

इस रणनीति से विभिन्न सबसेटों के लोगों को जोड़ा जा सकता है जो उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में देखते हैं जो पिछड़े हुए भारतीयों का कल्याण करने की क्षमता रखता है- “वे अपने साथ न सिर्फ मुस्लिमों को लेकर चल रहे हैं, बल्कि दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों को भी।”

हैदराबाद में राजनीति पर नज़र रखने वाले एक व्यक्ति चेतावनी देते हैं- “वे मौदूदी के पथ पर चल रहे हैं। मोदूदी ने भारतीय समाज के सीमावर्ती वर्गों के लिए एक युनाइटेड फ्रंट प्रस्तावित किया था जिससे इस्लाम की जीत हो सके।”

मौदूदी एक सामाजिक-राजनीतिक दार्शनिक थे जिन्हों जमात-ए-इस्लामी की शुरुआत की थी ताकि अंग्रेज़ी शासन के बाद भारत को इस्लामी राज्य बनाया जा सके। वे मानते थे कि ये मुस्लिमों की सभी सामाजिक और आर्थिक परेशानियों का हल है (विकिपीडिया)। उनकी कार्यशैली नेताओं पर शिक्षा और प्रचार (प्रोपागेंडा) से फतह करने की थी। क्या आपको कोई समानता दिखी?

“यह संयुक्त संस्कृति घातक है और बढ़ रही है जिसे रोकना कठिन होगा क्योंकि यह हमारे भेदों का उपयोग कर रही है।”, यह राय है हैदराबाद आधारित शोधकर्ता व लेखक की।