राजनीति
‘एक देश एक चुनाव’ की आवश्यकता क्यों, विरोधियों और समर्थकों के क्या हैं तर्क

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और हर कुछ महीनों में किसी न किसी राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के विधान सभा, विधान परिषद, स्थानीय निकाय के चुनाव होते रहते हैं। बंगाल के विधान सभा चुनाव संपन्न ही हुए थे कि पंजाब और उत्तर प्रदेश के लिए तैयारियाँ ज़ोर पकड़ने लगी हैं।

भारतीय लोकतंत्र में अब इस बात को महसूस किया जा रहा है कि निरंतर चलने वाले इन चुनावों के कारण अपार मात्रा में धन एवं शक्ति का व्यय होता है। केंद्रीय इकाइयों यथा चुनाव आयोग, सुरक्षा बल, शिक्षा विभाग से जुड़े कर्मचारी आदि के कार्य भार में अतिरिक्त वृद्धि होने से वे अपनी कार्यक्षमता का पूर्ण प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं।

हाल ही में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने संसद के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित कर ‘एक देश एक चुनाव’ की व्यवस्था को लागू करने का आह्वान किया। वे देश का विकास तेज़ करने और लोगों को इससे लाभान्वित करने के लिए ऐसा ज़रूरी मानते हैं।

वैसे तो लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने को लेकर लंबे समय से बहस हो रही है लेकिन माननीय राष्ट्रपति द्वारा बात रखने पर अब इस पर चर्चा ने ज़ोर पकड़ लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसे समर्थन दिया है। हालाँकि, पंचायत और नगरपालिकाओं के चुनावों को इसमें शामिल करने की बात नहीं है।

इस मामले पर चुनाव आयोग, नीति आयोग, विधि आयोग और संविधान समीक्षा आयोग बातचीत कर चुके हैं। हालाँकि कुछ ही राजनीतिक पार्टियाँ इसके पक्ष में हैं। अधिकांश राजनीतिक दलों ने इसका विरोध किया है। जब तक इस पर सहमति नहीं बनती, इसे धरातल पर उतारना कठिन होगा।

एक देश एक चुनाव के पक्ष में दिए जाने वाले तर्क

देश में एक साथ चुनाव कराने की वकालत करते हुए संसद की एक समिति ने कहा कि ऐसा होने से सरकारी खजाने पर बोझ कम पड़ेगा, राजनीतिक दलों का खर्च भी कम होगा, वहीं इस निर्णय से देश में मानव संसाधनों का अधिकतम उपयोग किया जा सकेगा।

कई लोगों का मानना है कि सभी चुनाव एक साथ कराए जाने की मांग अगर पूरी होती है तो इससे समय की भी बचत होगी। कानून एवं न्याय और कार्मिक मंत्रालयों पर विभाग संबंधी स्थाई समिति ने कानून मंत्रालय के लिए अनुदान की मांगों पर अपनी रिपोर्ट में कहा-

‘समिति का मानना है कि एक साथ चुनाव होने से बार-बार चुनावों को लेकर मतदाता में पैदा हुई उदासीनता कम की जा सकेगी, वहीं आम जनता को, खासतौर पर मतदाताओं को देश की चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित भी किया जा सकेगा।’

समिति ने कहा कि उसकी राय है कि एक देश, एक चुनाव’ या एक साथ सभी चुनाव कराने का विचार देश के लिए नया नहीं है क्योंकि 1952, 1957 और 1962 में पहले के तीन लोकसभा चुनाव के समय चुनाव एक साथ ही हुए थे।

रिपोर्ट में कहा गया, ‘इसके मद्देनज़र एक साथ चुनाव कराने के लिहाज से स्थानीय निकायों, विधान सभाओं और लोकसभा के लिए निश्चित कार्यकाल के लिए संविधान के कुछ प्रावधानों को संशोधित किया जा सकता है।’

एक देश एक चुनाव के विरोध में दिए जाने वाले तर्क

संविधान में लोकसभा और विधान सभा चुनावों को लेकर पाँच साल की अवधि तय है लेकिन एक साथ चुनाव कराने को लेकर कोई निश्चित प्रावधान का उल्लेख नहीं है। इसी आधार पर यह तर्क दिया जा रहा है कि एक साथ चुनाव मूल भावना के विरुद्ध है।

एक देश एक चुनाव स्वयं में महंगी प्रक्रिया है। विधि आयोग की मानें तो 4,500 करोड़ रुपये के नए ईवीएम 2019 में ही खरीदने पड़ते अगर एक साथ चुनाव होते। 2024 में एक साथ चुनाव कराने के लिए 1751.17 करोड़ रुपये सिर्फ ईवीएम पर खर्च करने पड़ेंगे।

इसके अलावा लोकसभा और विधान सभाओं का चुनाव एक साथ कराने पर कुछ विधान सभाओं के के कार्यकाल को बढ़ाया या घटाया जाएगा, इससे राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित होगी।

एक साथ चुनाव होने पर ज्यादा संभावना है कि राष्ट्रीय मुद्दों के सामने क्षेत्रीय मुद्दे छोटे हो जाएँ या इसका उलटा हो जाए। राष्ट्रीय पार्टियों का क्षेत्र विस्तृत होता जाएगा और क्षेत्रीय पार्टियों का दायरा इससे कम होगा।

स्वीडन में पिछले साल सितंबर में आम चुनाव, काउंटी और नगर निगम के चुनाव एक साथ कराए गए थे। इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, जर्मनी, स्पेन, हंगरी, स्लोवेनिया, अल्बानिया, पोलैंड, बेल्जियम भी एक बार चुनाव कराने की परंपरा है। राष्ट्रहित में इसपर व्यापक चर्चा कर आम सहमति से इसे लागू करना नि:संदेह नए भारत के निर्माण में मील का पत्थर साबित होगा।