राजनीति
विपक्षियों ने ईवीएम पर फिर से प्रश्न उठाया है इसलिए फिर से उत्तर देना आवश्यक है

आशुचित्र-

  • चुनाव आयोग पर विपक्ष के द्वारा हमला करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर लांछन लगाने के बराबर है और यह किसी भी पार्टी को बदनाम करने के सामान नहीं है।
  • चुनाव आयोग को मामले का संज्ञान लेना चाहिए और अपराधियों पर जुर्माना लगाने पर विचार करना चाहिए।

आगामी आम चुनावों से पहले माहौल गर्म हो रहा है। नरेंद्र मोदी सरकार पर हमला करने के लिए विपक्ष का पसंदीदा विषय फिर से सिर उठा चुका है। लंदन में एक हैकाथॉन और प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद जिसमें कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल भी मौजूद थेइलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) के विषय पर बहस छिड़ गई है।

इस घटना में सैयद शुजा नाम के एक ईवीएमविशेषज्ञने दावा किया कि 2014 के चुनावों के साथसाथ 2017 के उत्तर प्रदेश और गुजरात विधानसभा चुनावों में भी ईवीएम में हेरफेर की गई थी, जबकि हाल ही में छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में संपन्न हुए चुनावों में उन्होंने दूसरा रास्ता अपनाया जिस वजह से छेड़छाड़ नहीं की गई। उन्होंने बीड के पूर्व सांसद गोपीनाथ मुंडे और पत्रकार गौरी

लंकेश के हत्या के बारे में आरोप लगाते हुए कहा कि इस  सच्चाई को छुपाने हेतु उन दोनों की हत्या करवाई गई थी।

जबकि भारत के चुनाव आयोग ने दावों का खंडन करते हुए एक बयान जारी किया, और कानूनी कार्रवाई करने के बारे में सोचा। मगर विपक्ष एक कदम और आगे बढ़ गया। राहुल गांधी के नेतृत्व में कई विपक्षी नेता ईवीएम के मुद्दे पर एक संयुक्त रणनीति पर चर्चा करने के लिएसेव डेमोक्रेसीके बैनर तले आए। राहुल गांधी ने ईवीएम की प्रभावकारिता पर फिर से सवाल उठाने के लिए इस मंच का प्रयोग किया और चुनाव आयोग से पेपर बैलट वापस करने की मांग की।

विपक्षी एकता ने ईवीएम पर संदेह बढ़ाते हुए कुछ सवालों को मुख्यधारा में ले लिया है, जिन्हें संदिग्ध माना जा सकता है। लेकिन यह फिर से पूछा जाना चाहिए, “क्या ईवीएम को हैक किया जा सकता है?”

ईवीएम की परिभाषा के अनुसार उसे  ‘हैकनहीं किया जा सकता है, और इसका तात्पर्य अनधिकृत पहुंच से है।

ईवीएम की आवश्यकता क्यों है?

चुनाव प्रक्रिया को सुगम और तेज़ बनाने के लिए चुनाव आयोग ने ईवीएम की शुरुआत की। एजेंसी के डेटा से पता चलता है कि 18 से 19 साल के आयु वर्ग के 2.6 लोगों ने 2019 के चुनावों के लिए पहले ही पंजीकरण करवा लिया है। इस तरह के एक विशाल निर्वाचक वर्ग के साथ, पेपर मतपत्र एक प्रमुख तार्किक सिरदर्द होगा।

ईवीएम से पहले, पेपर बैलट सिस्टम में कई तरह की समस्याएं थीं। इनमें मतपत्र भराई के मामले भी शामिल थे, जहां गलत तरीके से चिह्नित मतपत्रों को गलत तरीके से चिह्नित किया जाता था या स्याही से स्प्रे करके बॉक्स में डाला जाता था, जिससे उनकी अस्वीकृति हो जाती थी। इसमें प्रत्येक मुड़े हुए कागज को खोलने और फिर वोटों की गिनती करने और फिर उन्हें फिर से जोड़ने का काम किया जाता था। जाहिर है, ऐसी स्थितियों में ईवीएम एक जीवन रक्षक है।

जैसा कि पहले बताया गया है, ईवीएम में दो इकाइयां होती हैं। एक बैलेट यूनिट और एक कंट्रोल यूनिट। वोट डालने के बाद कंट्रोल यूनिट वोटों को संग्रहीत करता है और  बूथ अधिकारियों  को बैलेट यूनिट चालू करने की अनुमति देता है जब कोई मतदाता अपना वोट डालने जाता है। बैलेट यूनिट वह इकाई  होती है जहां मतदाता अपनी पसंद के उम्मीदवार को चुनने के लिए बटन दबाता है। एक बार एक वोट डालने के बाद, यह स्वचालित रूप से अगले मतदाता के आने तक खुद को निष्क्रिय कर देता है और प्रभारी अधिकारी इसे वापस चालू कर देता है। दोनों उपकरण 5-मीटर लंबी केबल द्वारा जुड़े हुए हैं। पूरा उपकरण एक छह वोल्ट की क्षारीय बैटरी पर चलता है, इस प्रकार यह बिना बिजली के भी कहीं भी उपयोग करने योग्य है। यह 3,840 मतों को संग्रहीत कर सकता है, जो कि मतदान केंद्र पर मतदाताओं की संख्या से दोगुने से अधिक है। खराबी के मामले में, 10 बूथों को कवर करने वाला एक निर्वाचन अधिकारी अतिरिक्त ईवीएम उपलब्ध करवाता है।

भारत द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले प्रत्यक्ष रिकॉर्डिंग मशीनों  के द्वारा मतदान, अन्य देशों के साथसाथ ब्राज़ील में भी मौजूद है। अन्य देश जैसे संयुक्त राज्य अमेरिका और बेल्जियम भी इलेक्ट्रॉनिक मतदान का उपयोग करते हैं।

ईवीएम के खिलाफ गुस्सा क्यों?

खबरों के मुताबिक, बैलट पेपर के दौर में चुनावी धोखाधड़ी और गड़बड़ी आमतौर पर तीन राज्योंपश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश में बताई गई थी। इन तीन राज्यों में तब लोकसभा की संयुक्त 181 सीटें थीं, और अब 162 सीटें हैं, जो  कि अभी भी एक बड़ा आंकड़ा है। इसके साथ ही, कई राज्यों में नक्सली हिंसा और पार्टियों द्वारा बूथ कैप्चरिंग करने जैसे  जटिल मामले भी सामने आये थे।

ईवीएम के खिलाफ सामान्य आरोप यह है कि इनसे छेड़छाड़ की जाती है ताकि पार्टियों को जीतने  में मदद मिल सके। यह एक अजीब सा आरोप है कि 2014 के चुनावों के दौरान, भारतीय जनता पार्टी एक दशक तक केंद्र में सत्ता से बाहर रही और केवल चार राज्यों में सत्ता में रही और दो जगहों पर वह कनिष्ठ साझेदार थी। इसके अलावा, अगर ईवीएम में वास्तव में छेड़छाड़ की गई थी, तो पार्टी ने बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सहित महत्वपूर्ण चुनावों में सीटें क्यों गवाई? एक ऐसी पार्टी जो कथित तौर पर सत्ता में रहना चाहती है, इतनी अधिक जनसंख्या वाले राज्यों में सीटें क्यों गंवाएगी?

ईवीएम कितने विश्वसनीय हैं?

ईवीएम के दुरुपयोग को रोकने के लिए भौतिक और कानूनी रूप से  उपाय किये गए हैं।

सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उपकरण का स्रोत कोड एक गैररिप्रोग्रामेबल या एक बार प्रोग्रामेबल (ओटीपी) माइक्रोचिप पर संग्रहीत होता है। निर्माण के समय, माइक्रोकंट्रोलर की रीडओनली मेमोरी को उम्मीदवारों के क्रम और उनके संबंधित बटन के साथ क्रमादेशित किया जाता है। यह डेटा उच्च वोल्टेज का उपयोग करके उपकरण पर स्थायी रूप से आंतरिक लिंक (फ़्यूज़ और एंटी-फ़्यूज़ के रूप में जाना जाता है) को बनाने या नष्ट करने के लिए इस्तेमाल किया  जाता है, जिसे उलटा नहीं किया जा सकता। इस प्रकार, डेटा को स्थायी रूप से प्रोग्राम किया जाता है और इसे बदलना शारीरिक रूप से असंभव है। चूंकि मनुष्यों की तरह इलेक्ट्रॉनिक्स बेतरतीब ढंग से व्यवहार नहीं करते हैं, इसलिए ईवीएम के लिए बेतरतीब ढंग से वोट ट्रांसफर करना असंभव है।

दूसरा सुरक्षा तंत्र यह है कि प्रत्येक ईवीएम को उम्मीदवार या उम्मीदवार के प्रतिनिधि की उपस्थिति में जांचा जाता है कि यह काम कर रहा है या नहीं। उम्मीदवार या उनके प्रतिनिधि द्वारा उनके कामकाज से संतुष्ट होने के बाद ही चुनाव प्रक्रिया में सील और तैनात किया जाता है। मतदान के वास्तविक दिन तक प्रक्रिया को कई स्तरों पर दोहराया जाता है।

तीसरा सुरक्षा तंत्र मतदाता  सत्यापित पेपर ऑडिट ट्रेल की शुरूआत है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसे अनिवार्य किया गया है। वीवीपीएटी में ईवीएम से जुड़ी एक तीसरी इकाई शामिल है जो उम्मीदवार के नाम, उनकी पार्टी और प्रतीक को कागज की एक पर्ची पर प्रिंट करती है, इसे मतदाता को प्रदर्शित करती है (जबकि डिवाइस के अंदर अभी भी) और फिर साइट से बाहर हो जाती है। यह मतदाताओं के लिए दोहरे जाँच तंत्र के रूप में कार्य करता है ताकि उन्हें यह ध्यान रहे कि वे किसके लिए मतदान कर रहे हैं।

अंतिम बिंदु चुनाव ही है। 2017 में यह व्यापक रूप से बताया गया कि हैकर्स का एक समूह नेवादा के लास वेगास में आयोजित एक वार्षिक हैकर्स सम्मेलन डेफकॉन में लगभग 90 मिनट में ईवीएम में कमजोरियों को रिपोर्ट करने में कामयाब रहा। मगर यह एक आदर्श स्थिति में ही संभव है। राज्य और केंद्रीय पुलिस अधिकारियों, चुनाव अधिकारियों, मतदाताओं और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ चुनावों के दौरान वास्तविक समय में ईवीएम को हैक करना असंभव है। पिछले आम चुनाव के दौरान कुल 927,553 मतदान केंद्रों के साथ, ईवीएम को हैक करना तार्किक रूप से असंभव है।

चुनाव आयोग का क्या कार्य होना चाहिए?

ईवीएम की सुरक्षा और विश्वसनीयता के बारे में मतदाताओं को आश्वस्त करने के लिए ईसीआई को तार्किक रूप से कई अभियान चलाने चाहिए, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में जहां विपक्ष के दावों से मतदाताओं पर प्रभाव पड़े।

हैदराबाद स्थित इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ईसीआईएल) जो बेंगलुरु स्थित भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) के साथ मिलकर ईवीएम का निर्माण करता है, ने उन सभी दावों का खंडन किया है, जो सैयद शुजा ने नियोजित किए थे। ईसीआईएल ने शुजा के दावों का भी खंडन किया कि उसने 2014 में इस्तेमाल किए गए ईवीएम को बनाया था। ईसीआई ने इसके बाद दिल्ली पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई।

हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि ईसीआई एक संवैधानिक निकाय है न कि एक राजनीतिक इकाई। ईसीआई पर विपक्ष के हमले देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर लांछन लगाने के समान है और भारतीय जनता पार्टी पर उसके कथित कुशासन पर हमला करने के समान नहीं है।

ईसीआई को मामले का संज्ञान लेना चाहिए और इस प्रक्रिया पर हमला करने वालों पर जुर्माना लगाना चाहिए।

श्रीकांत सार्वजनिक परिवहन, नगरीय प्रबंधन और यातायात इंफ्रास्ट्रक्चर में रुचि रखते हैं।