राजनीति
चुलि की जकड़ से बाहर निकला ओडिशा- उज्ज्वला योजना की बड़ी सफलता

आशुचित्र- एलपीजी के उपयोग से बचे समय में महिलाओं को अवसर दिलाए जा सकते हैं जिससे एलपीजी के नियमित उपयोग हेतु धन की तथा अन्य आर्थिक आवश्यकताएँ भी पूरी होंगी। सामाजिक समूह तथा स्व-सहायता समूह इसमें सहायता कर सकते हैं।

भारत के अन्य भागों की तरह ही ओडिशा भी लंबे समय से चुलि में जकड़ा हुआ था (चूल्हा जिसे उड़िया भाषा में चूलि कहा जाता है)।

राज्य की अधिकांश आबादी खाना पकाने के लिए लकड़ी तथा कोयले का उपयोग करती थी जो कि काफी प्रदूषण फैलाता था। इससे ओडिशा की महिलाएँ खराब स्वास्थ्य तथा गरीबी के चक्र में जूझती थीं।

प्रधानमंत्री उज्जवला योजना लागू होने से इस कठिन परिश्रम तथा स्वास्थ की समस्या का निदान हुआ है एवं इसकी मुख्य लाभार्थी राज्य की महिलाएँ हैं।

प्रसन्नता की बात है कि इस योजना का लाभ अर्जित करने वाले राज्यों में ओडिशा एक प्रमुख राज्य है। आज 69.2 लाख घरों में एलपीजी के कनेक्शन हैं। उनमें से 33 लाख घर उज्जवला योजना के लाभार्थी हैं।

मई 2014 में केवल 19.7 लाख घरों में ही एलपीजी कनेक्शन थे। इन चार वर्षों में एलपीजी कनेक्शन तीन गुना तक बढ़ गए हैं तथा इसका श्रेय उज्जवला योजना को जाता है जिससे अधिक कीमत में एलपीजी कनेक्शन लेने की समस्या का निदान हुआ है।

उज्जवला योजना को मई 2016 में शुरू किया गया था जिसके अंतर्गत गरीब परिवार की महिलाओं को मुफ़्त में नए एलपीजी कनेक्शन दिए गए थे। इसमें लाभार्थियों का चयन पारदर्शी तरीके से किया जाता है। जिसमें सामाजिक आर्थिक जातिगत जनगणना के आधार पर अथवा एससी-एसटी परिवार, प्रधानमंत्री आवास योजना, अंत्योदय अन्न योजना, वनवासी इत्यादि सहित अन्य सात वर्ग के परिवारों को लाभ दिया जाता है।

ओडिशा में एलपीजी इकोसिस्टम तथा स्वच्छ ईंधन को अपनाने में उज्जवला योजना सफल रही है। उल्लेखनीय है कि 2011 की जनगणना के मुताबिक ओडिशा के केवल 9.8 प्रतिशत परिवारों ने ही एलपीजी को खाना पकाने के लिए प्रमुख ईंधन बताया था।

एलपीजी के बढ़ते उपयोग तथा जमीनी स्तर की कहानियों से उम्मीद लगाई जा सकती है कि वर्ष 2021 तक ओडिशा पूर्ण रूप से ऊर्जा की कमी से मुक्त हो जाएगा।

ज़मीनी स्तर की गाथाएँ

भुवनेश्वर की सबसे बड़ी झुग्गी में रहने वाली कल्पना बेहरा, अपने पति पुरुषोत्तम के साथ रहती हैं। उज्जवला योजना का लाभ मिलने से पूर्व, मध्य 2016 के पहले तक वह मुख्य तौर पर खाना पकाने के लिए उनके पति द्वारा एकत्रित की गई लकड़ियों पर आश्रित थीं। उज्जवला योजना की इस बात को लेकर आलोचना हुई थी कि लाभार्थियों को रिफिल की सुविधा नहीं मिलती है लेकिन कल्पना ने इस बात को नकारते हुए कहा कि जून 2018 तक उन्हें आठ बार रिफिल प्रतिवर्ष मिलती रही हैं। कल्पना को शरीर में दर्द की समस्या है जो कि ठंडा पखाल खाने से और अधिक बिगड़ जाती थी (पखाल ओडिशा का व्यंजन है जो खमीरीकृत चावल तथा पानी से बनाया जाता है)।

नया गैस कनेक्शन मिल जाने से कल्पना गर्म खाना खा पाती हैं। अब खाना पकाने में उन्हें कम समय लगता है तथा बचा हुआ समय सिलाई करने में उपयोग करती हैं। पड़ोसियों के कपड़े सिलने से प्रतिमाह 1,500 से 2,000 रुपए तक उनकी कमाई हो जाती है।

ग्रामीण अंगुल के आठमलिक में पकेई प्रधान ने अपने बेटे तथा बहू के साथ माधापुर पंचायत में एक फूड कार्ट संचालित करना आरंभ किया है। लेकिन अधिकांश चीजें उनके गाँव मुकुंदपुर में स्थित उनके छोटे से रसोईघर में ही पकाई जाती हैं। 2016 से लेकर 2018 तक एलपीजी कनेक्शन में उन्होंने 10 रिफिल करवा ली थीं तथा अब वे चुलि से हटकर पूर्ण रूप से एलपीजी पर आश्रित हो गई हैं।

जब जुलाई 2018 में हमने पकेई से बात की थी तब वह एलपीजी कनेक्शन से प्रसन्न थी किंतु सब्सिडी न मिलने के कारण चिंतित भी। उन्होंने प्रथम सिलेंडर तथा गैस स्टोव का खर्च दे दिया था अत: वे शुरुआत से ही एलपीजी सब्सिडी लेने की पात्रता रखती हैं।

जब विक्रेता ने उनका एलपीजी खाता देखा तो पाया कि सब्सिडी नियमित रूप से उनके एसबीआई बैंक के खाते में जमा हो रही है। वे पहले ओडिशा ग्राम्य बैंक की पासबुक उपयोग करती थीं लेकिन उन्होंने कनेक्शन लेने के तुरंत बाद एसबीआई में खाता खुलवा लिया था।

क्योंकि उन्होंने अपनी एसबीआई पासबुक में नियमित रूप से विवरण नहीं लिखवाया इसलिए उन्हें सब्सिडी की जानकारी नहीं थी। ऐसे लाभार्थी जो कनेक्शन तथा पहले सिलेंडर के लिए पैसा देते हैं अथवा कर्ज लेते हैं, पहली छ: रिफिल की सब्सिडी लेने की पात्रता रखते हैं।

रिफिल तथा निरंतर उपयोग

यह दो कहानियाँ बताती हैं कि किस तरह से लोग एलपीजी का उपयोग करने लगे हैं। एलपीजी ने रसोईघरों में जगह तो बना ली लेकिन चुलि अभी भी वहाँ से पूर्ण रूप से बाहर नहीं हुई है। कुछ लोग इलेक्ट्रिक हीटर का उपयोग भी करने लगे हैं। एक साल से अधिक समय से कनेक्शन वाले उपभोक्ताओं का रिफिल अभिलेख देखना उज्जवला योजना के लाभार्थियों के रिफिल प्रारूप को समझने में सहायक होगा।

मई 2016 से लेकर अप्रैल 2017 तक ओडिशा में कुल 10,43,899 पीएमयूवाय उपभोक्ता दर्ज किए गए थे। यदि हम अगस्त 2017 से लेकर जुलाई 2018 तक उनके रिफिल अभिलेख देखें तो पता चलता है कि 8,70,499 अथवा 84 प्रतिशत को रिफिल की सुविधा मिली है। योजना के प्रथम वर्ष में सबसे ज्यादा गंजाम शहर के लोगों (1,00,578) को सुविधा मिली थी इनमें से करीब 89 प्रतिशत लोगों को रिफिल भी मिली है। वहीं खुर्दा में योजना के लाभार्थियों में से 91 प्रतिशत लोगों को रिफिल मिली है।

ओडिशा में पीएमयूवाय उपभोक्ताओं ने औसतन 2.8 रिफिल प्रतिवर्ष ली है। खुर्दा, कोरापुट, जयपुर, संबलपुर, नयागढ़, गंजाम, मलकानगिरि, कंधमाल तथा कटक में औसत से अधिक रिफिल हुई हैं। खुर्दा में औसतन 5.1 सिलेंडर प्रति उपभोक्ता की दर से रिफिल हुई है। भारत में औसतन चार सिलेंडर प्रति उपभोक्ता का दर है। ऐसे में ओडिशा के यह आँकड़ें अच्छे हैं।

एलपीजी के कम उपयोग के साथ ही ओडिशा में कम विक्रेताओं की भी समस्या रहती थी। वहीं एलपीजी विक्रेताओं की संख्या अप्रैल 2014 से अगस्त 2018 तक 367 से दोगुनी होकर 867 तक पहुँच गई है। इतने ही वक़्त में शून्य विक्रेता वाले ब्लॉकों की संख्या 182 से घटकर 19 पर पहुँच गई है।

निरंतर उपयोग हेतु सार्वजनिक जागरूकता

स्वच्छ ईंधन को अपनाने के लिए उठे कदम राज्य में विकास के कार्य हैं। एलपीजी के सुरक्षित तथा निरंतर उपयोग को बढ़ावा देने के लिए एलपीजी सुरक्षा क्लिनिक तथा एलपीजी पंचायतों का नियमित रूप से आयोजन किया जा रहा है। सुरक्षा क्लिनिक में उपभोक्ताओं के छोटे समूह (20-30) को सुरक्षित उपयोग के लिए जागरूक किया जाता है। वहीं एलपीजी पंचायत लगभग 100 उपभोक्ताओं को एक ही स्थान पर लाकर सुरक्षित, निरंतर उपयोग तथा खाना पकाने और महिला सशक्तिकरण का स्वच्छ ईंधन से संबंध बताते हुए जागरूक करती है।

अक्टूबर 2018 तक ओडिशा में लगभग 2,700 एलपीजी पंचायतों का आयोजन किया जा चुका है। यह प्रत्येक विक्रेता के साथ हर महीने आयोजित की जाती हैं। वहीं पैट्रोलियम मंत्रालय तथा तेल विपणन कंपनियों को डिलिवरी पॉइंट की संख्या में बढ़ोतरी, सेवाएँ, सुरक्षा तथा समाज को जागरूक करने के लिए कदम बढ़ाने की आवश्यकता है।

स्वच्छ ईंधन पर हुए खर्च का सर्वाधिक लाभ महिलाओं को प्राप्त होता है। अत: घरेलू बजट में इसके प्रावधान के लिए उन्हें अपनी आवाज़ उठानी चाहिए। एलपीजी पर हुआ व्यय किसी भी प्रकार न काटा जा सके तथा परिवार इसके नियमित उपयोग के लिए व्यवस्थाएँ रखें।

एलपीजी के उपयोग से बचे समय में महिलाओं को अवसर दिलाए जा सकते हैं जिससे एलपीजी के नियमित उपयोग हेतु धन की तथा अन्य आर्थिक आवश्यकताएँ भी पूरी होंगी। सामाजिक समूह तथा स्व-सहायक समूह इसमें सहायता कर सकते हैं। स्पष्ट है कि चुलि के शिकंजे से बाहर निकलने में उज्जवला योजना लोगों की सहायक रही है।

उपसंहार

केंद्र सरकार ने अब उज्जवला योजना की सुविधा एलपीजी सिलेंडर के अभाव वाले प्रत्येक गरीब घर तक पहुँचाई है। मुख्यत: यह योजना गरीबी रेखा के नीचे वाले परिवारों की महिलाओं के लिए लागू की गई थी। इसका लक्ष्य 100 प्रतिशत गरीब परिवारों को एलपीजी सिलेंडर की सुविधा दिलाना है।