राजनीति
केवल एनआरसी और नागरिकता विधेयक नहीं बल्कि भारतीय धर्मों के लिए स्वायत्त क्षेत्र भी

भारत का सभ्यतागत कर्तव्य है कि यह आधुनिक भारत के भूभाग में जन्मे सभी धर्मों, उप-सभ्यताओं और जनजातीय तंत्रों की रक्षा करे। मोटे तौर पर कहा जाए तो हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन और अनेक जनजातीय धर्मों की रक्षा करे।

लेकिन एक बात ध्यान में रखनी होगी कि भारत में रह रहे गैर-भारतीय (इस लेख में इंडिक शब्द के लिए भारतीय शब्द का प्रयोग होगा) धर्मों के अल्पसंख्यकों के संविधान के अनुसार समानाधिकारों का हनन न हो। हालाँकि इसमें गैर-भारतीय धर्मों के अवैध प्रवासियों को समानाधिकार देने की बात नहीं हो रही है। वे सहायता के लिए विश्व के अन्य मुस्लिम या ईसाई बहुल देशों में आश्रय पा सकते हैं।

यदि सभी भारतीय लोगों के सभ्यतागत अधिकारों और स्वातंत्र्य के लिए सभी राज्यों में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) लाना पड़े, तो यह ही सही। यदि इसके लिए हमें पड़ोसी देशों में प्रताड़ित हिंदुओं व अन्य भारतीय धर्मों के अल्पसंख्यकों को विशेष शरणार्थी दर्जा और पूर्ण नागरिक अधिकार देने हों तो इससे पीछे नहीं हटना चाहिए।

इसलिए नागरिक संशोधन विधेयक, 2016 (सीएबी) आवश्यक है। अनुच्छेद 370 को हटाने की अल्प प्रेरणा पंडितों, बौद्धों, दलितों, डोगरा, सिखों और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के शरणार्थियों (जो विभाजन के समय सीमा पार से आए थे) के अधिकारों की रक्षा भी थी।

लेकिन इन सब में एक बात से हम चूक रहे हैं- जब आज के भारत को हिंदुओं व भारतीय धर्मों के अंतिम शरण के रूप में देखा जाएगा तो न सिर्फ पाकिस्तान और बांग्लादेश को बल्कि कश्मीर घाटी समेत भारत के मुस्लिम व ईसाई बहुल राज्यों में इन धर्मों के साथ दुर्व्यवहार को प्रोत्साहन मिलेगा।

भेदभाव करने की प्रवृत्ति बढ़ेगी या धार्मिक आधार पर नरसंहार को बढ़ावा मिल सकता है ताकि वे काफिर जो एक ईश्वर में विश्वास नहीं करते हैं, वे कहीं और प्रवास करें। यह एक विकृत प्रोत्साहन है और एनआरसी, सीएबी और अनुच्छेद 370 के लाभों के साथ भी भारत इसे सह नहीं सकता है।

भारत और उनके हित जिन्हें इस्लामी अपने क्षेत्रों से भगाना चाहते हैं सिर्फ एक-तरफा धारा से ही प्राप्त नहीं किए जा सकते। बल्कि हमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और कश्मीर घाटी में भी शासकीय नीति के तहत हिंदुओं के लिए उसी भूभाग में रहते हुए एक पृथक क्षेत्र की मांग करनी चाहिए जिससे वे उसी राज्य या देश में स्वत्व अधिकार के साथ रह सकें।

हिंदू शरणार्थियों की समस्या केवल पश्चिम बंगाल या असम या अन्य राज्यों से नहीं सुलझाई जा सकती है। जो धार्मिक आधार पर ये अत्याचार कर रहे हैं, उन्हें इसका प्रोत्साहन नहीं मिलना चाहिए। उन्हें ये दिखना चाहिए कि लोगों को बाहर निकालने का मूल्य उन्हें ही चुकाना पड़ेगा।

यह मूल्य भारत को स्थापित करना है। शुरुआत में पाकिस्तान, बांग्लादेश और जम्मू-कश्मीर के नेताओं के समक्ष और फिर एक नीति के तहत जो स्पष्ट हो। इससे क्या होगा।

पहला, कश्मीर से शुरू करते हैं जहाँ घाटी में पंडितों के लिए एक परिक्षेत्र यह सुनिश्चित करेगा कि उनके जन्म और संस्कृति की भूमि पर उनका स्वत्व अधिकार हो।

इस परिक्षेत्र को रक्षित किया जा सकता है और जब कश्मीरी कट्टरवाद व अलगाववाद समाप्त हो जाएगा तब उन्हें मुस्लिम पड़ोसियों के बीच अपने वास्तविक घरों में जाने दिया जाएगा। सुरक्षित पंडित कॉलोनी यह संदेश भेजेगी कि भारत इसके लोगों को आतंक से बचाकर उनका जीवन और स्वतंत्रता सुनिश्चित कर सकता है।

यह एक नया कथात्मक (नैरेटिव) भी सृजित करेगा कि कश्मीर सिर्फ मुस्लिमों का नहीं है। घाटी के बीच में एक पंडित कॉलोनी कश्मीरियों को याद दिलाएगी कि कश्मीर वास्तविकता में क्या है। वे अब यह ढोंग नहीं कर पाएँगे कि कश्मीरियत और इस्लामियत एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।

दूसरा, यह मुश्किल कार्य है क्योंकि इसमें पाकिस्तान और बांग्लादेश को उनके देश में हिंदुओं (सिख, बौद्ध आदि) के लिए स्वायत्त क्षेत्र बनाने के लिए कहना है जिसमें केंद्र सरकार केवल रक्षा, आंतरिक सुरक्षा, वृहद आर्थिक नीति, व्यापार, मुद्रा और संचार शासित कर सकेगी।

यदि इन दोनों देशों में एक सुरक्षित परिक्षेत्र बनाया जा पाएगा तो ये इस्लामियों को खुले में आने पर विवश करेगा जो अब तक शारीरिक धमकी, धर्मांतरण के लिए दबाव और महिलाओं के अपहरण से चुपचाप यह कार्य कर रहे थे। पर्याप्त संख्या में ईसाई होने के चलते पाकिस्तान में ईसाई बहुल कॉलोनियाँ भी बनाई जा सकती हैं।

यह भारत में हिंदु शरणार्थियों के आने या पड़ोसी देशों में उनपर अत्याचार को भले ही न रोक पाए लेकिन यह कम से कम यह संदेश देगा कि भारत उनके कट्टरवाद और हिंदू-विरोधी प्रयासों को सुगम नहीं होने देगा।

अपने पड़ोसियों के कट्टरवाद का सामने करने में हमने रक्षात्मक पद्धति अपनाई है। अब समय आ गया है कि यह परिवर्तित हो। अभी के लिए हम धार्मिक आधार पर इन अत्याचारों का उत्तर सैन्य या अन्य माध्यमों से दे सकते हैं जैसे पाकिस्तान में विद्रोहों को भारत का समर्थन।