राजनीति
धार्मिक आधार पर प्रताड़ित लोगों के प्रति सहानुभूति में भाजपा का राजनीतिक लाभांश भी

नागरिकता संशोधन विधेयक (कैब) 2019 के नए प्रस्ताव में पूर्वोत्तर के कुछ क्षेत्रों को बाहर रखा गया है। इन क्षेत्रों में मिज़ोरम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश के इनर लाइन परमिट (आईएलपी) क्षेत्र और मणिपुर के नव-घोषित क्षेत्र शामिल हैं। यह छठी अनुसूची के क्षेत्रों को भी शामिल करता है, जिसमें मेघालय का लगभग पूरा क्षेत्र, त्रिपुरा के आधे से अधिक और असम के तीन स्वायत्त जिला परिषद शामिल हैं।

पूर्वी किनारे पर समस्या इसलिए है क्योंकि बहुत सारे आप्रवासी, हिंदू और मुसलमान, विभाजन के बाद भी अवैध रूप से सीमा पार कर गए, और ऐसा ही 1971 के लिबरेशन युद्ध के दौरान भी हुआ। पूर्व में झरझरी सीमा के कारण अवैध आव्रजन असम और बंगाल के राज्यों में जारी रहा, जिसे 1985 के असम समझौते के माध्यम से रोकने की मांग की गई थी।

पूर्वोत्तर राज्यों के अधिकांश लोगों ने सीएबी का विरोध किया, क्योंकि वे अपनी पहचान और संस्कृति को संरक्षित करना चाहते थे और किसी भी अवैध अप्रवासी को नागरिकता के अधिकार देने के खिलाफ थे, चाहे वह हिंदू हो या मुस्लिम। उन्होंने इस साल की शुरुआत में ज़ोरदार प्रदर्शन किया, जिससे सरकार को राज्यसभा में विधेयक पेश न करने मजबूर होना पड़ा।

इस नए प्रस्तावित विधेयक में, सरकार ने बहुत चालाकी से पूर्वोत्तर राज्यों में से अधिकांश को कैब के दायरे से बाहर रखा है। इसलिए अब व्यावहारिक रूप से केवल असम को नव-घोषित नागरिकों के बोझ से निपटना है। हालाँकि, असम की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं लेकिन अन्य राज्यों के समर्थन के साथ (आईएलपी के कारण) आंदोलन स्पष्ट रूप से कमज़ोर हो जाएगा।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) वर्षों से हिंदुत्ववादी राजनीति करती रही है और नागरिकता संशोधन विधेयक 2019 इसी का परिचायक है। कैब से भाजपा को पूर्वोत्तर राज्यों में झटका लगने की अटकलों के बीच पार्टी को उम्मीद है कि पश्चिम बंगाल में इस विधेयक के आने से बड़ा फायदा होगा।

इस विधेयक के माध्यम से नागरिकता प्राप्त करने वाले लोग काफी हद तक बंगाली हिंदू होंगे, जो पश्चिम बंगाल में भाजपा के प्रति सहानुभूति रखेंगे। यहाँ ध्यान दें कि विधेयक का विरोध करने वाली ममता बनर्जी मुस्लिम सहानुभूति के लिए प्रयासरत हैं इसलिए यह रुख भाजपा को विधानसभा चुनाव में हिंदुओं को अपने पक्ष में लामबंद करने में मदद करेगा।

इसके अलावा, यह पश्चिम बंगाल में एनआरसी के लिए कोलाहल को बढ़ाएगा क्योंकि इसमें “पर्याप्त” अवैध मुस्लिम अप्रवासी आबादी भी शामिल है। ऐसी परिस्थितियों और त्रिपुरा व असम जैसे राज्यों में भाजपा के चुनावी इतिहास को देखते हुए, यह पश्चिम बंगाल में भी अच्छे चुनावी लाभांश की उम्मीद बढ़ाता है। बंगाल के अलावा, कैब असम की जनसांख्यिकी को भी बदल देगा, इस प्रकार हिंदू बंगाली मतदाताओं में वृद्धि होगी, जो अधिकांश रूप से भाजपा समर्थक होंगे।

भाजपा को उम्मीद है कि इस विधेयक के आने से भाजपा को सूबे में एक करोड़ हिंदू बांग्लादेशियों का वोट मिल सकता है जो आने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा को बंगाल में कई सीटों पर जीत दिला जा सकता है। पश्चिम बंगाल सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर से भी भाजपा को उम्मीदें हैं। भाजपा को आशा है कि इस निर्णय से असम में एनआरसी के कारण भाजपा की बंगाली-विरोधी छवि बनी है, वह भी कम होगी।