राजनीति
सोनिया गांधी के इर्द-गिर्द मिथक खड़ा करने वाले एक मीडिया हाउस की केस स्टडी
सुहास - 5th May 2020

आशुचित्र- यह देखते हुए कि भारतीय मुख्यधारा की मीडिया ने राजनीति में सोनिया गांधी के मिथक को एक संत के रूप में कैसे गढ़ा है, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि आज जब उनकी आलोचना की जाती है, तो वही लोग इसे पचा नहीं पाते हैं।

 यहाँ मिथक और उसका निर्माण करने वाले हैं।

प्राचीन काल से कई लोगों के बारे में मिथक हैं। असाधारण व्यक्तित्व और प्रतिभा के धनी लोगों से बातचीत और मेलजोल के आधार पर कुछ लोग उनकी खूबियों और शक्तियों को दुनिया के सामने लाए। देखा गया है कि इतिहास के कई प्रसिद्ध लोगों के इर्द-गिर्द इसी प्रकार किस्से-कहानियाँ बनती रही हैं। इसे ऑर्गेनिक या प्राकृतिक और स्वाभाविक मिथक निर्माण करना कहते हैं।

लेकिन सार्वजनिक मीडिया के उभार के साथ ही एक और प्रकार की मिथक गढ़ने की विधि सामने आई, जो प्राकृतिक नहीं होती, बल्कि प्रायोजित होती है। बड़े मीडिया हाउस खुद इस प्रकार के मिथक बनाने में शामिल रहे हैं।

अगर सोनिया गांधी का नाम एक नकारात्मक तौर पर लिया जाता है, तो मीडिया और राजनीतिक हलकों में कुछ लोगों के पेट में दर्द क्यों होने लगता है, वे परेशान क्यों हो उठते हैं?

क्योंकि उनकी यह धारणा है कि ‘सेंट सोनिया’ को छुआ नहीं जा सकता।

भारत मेंसेंट सोनियाकी यही कहानी है, जो बताती है कि कैसे किसी की छवि गढ़ी गई।

हम इसे इंडिया टुडे  पत्रिका के कवर पृष्ठ के माध्यम से देखेंगे। क्योंकि इंडिया टुडे  को 2000 के दशक की शुरुआत से, सोनिया गांधी के आसपास इस प्रकार के प्रभामंडल को पैदा करने के रूप में देखा जा सकता है।

उदाहरण के लिए, इंडिया टुडे  के दिसंबर 2002 के कवर पृष्ठ को देखें, जिसमें ‘द न्यू मिसेज़ जी’ के आगमन की घोषणा की गई है।

 

उन्हें उनकी सास के बराबर दिखाया गया।

इंडिया टुडे  का यह कवर पृष्ठ महत्त्वपूर्ण क्यों था? इस समय तक, लुटियन दिल्ली के पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) में कांग्रेस और उसके लोग, दोनों इसे लेकर सुनिश्चित थे कि उन्हें हर मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर हमला करना होगा, लेकिन वाजपेयी के विकल्प के रूप में किसे प्रचारित करना है, इसके बारे में वे निश्चित नहीं थे।

एक दशक तक सोनिया गांधी के शासन को देखने के बाद, कम लोग ही विश्वास कर सकते हैं कि एक समय ऐसा था जब वे पार्टी पर पूरी पकड़ को लेकर निश्चित नहीं थीं। ऐसे में इंडिया टुडे  एक शुरुआती प्रस्तावक बन गया और उनकी छवि को गढ़ने का काम किया।

इंडिया टुडे  की यह घोषणा एक तरह से दिल्ली में सत्ता के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए संकेत की तरह थी। इसके बाद यही पारिस्थितिकी तंत्र अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को हटाने के लिए सोनिया गांधी के साथ आ गया।

ऐसा नहीं है कि इंडिया टुडे  के कवरों पर केवल कांग्रेस के बारे में अच्छी खबर थी।

हालाँकि, जब कांग्रेस के अनुकूल कोई खबर नहीं थी, तब भी सोनिया गांधी को लेकर कोई व्यक्तिगत हमला नहीं किया गया।

यह सर्वविदित है कि 2003-04 के आसपास बहुत कम लोग यह सोचते थे कि हवा कांग्रेस के पक्ष में बह रही है। यहाँ तक कि इंडिया टुडे  भी विभिन्न राज्यों में कांग्रेस के सिकुड़ने की संभावनाओं को महसूस कर रहा था।

यहाँ तक कि इंडिया टुडे  के कवर पृष्ठ पर सोनिया गांधी ‘हनी आई श्रंक द कांग्रेस!’ शीर्षक के साथ हाथ लहराती हुई दिखीं।

हालाँकि उनके ऊपर ‘हीरो ऑफ़ हेट्रेड’ और ‘मास्टर डिवाइडर’ जैसे व्यक्तिगत हमले नहीं किए गए, जिस प्रकार हाल के वर्षों में नरेंद्र मोदी पर किए जाते रहे हैं।

मई 2004 में जब चुनाव परिणाम आए, तो इंडिया टुडे  के कवर पृष्ठ पर सोनिया गांधी की मुस्कुराती हुई फोटो थी और शीर्षक था ‘सोनिया शाइनिंग अटल सनसेट’।

लेकिन वास्तव में ‘प्रोजेक्ट सेंट सोनिया मई महीने के अंत में शुरू हो गया, जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ कवर पृष्ठ पर मुखर और आत्मविश्वासी सोनिया गांधी नज़र आईं।

इस फोटो में सोनिया गांधी कैमरे में कुछ बोलती हुई दिख रही थीं, जबकि मनमोहन सिंह बेसुध और खोए हुए दिख रहे थे। इस कवर पृष्ठ का शीर्षक था– सोनियाज़ पीएम – जो यह दिखाता था कि सिंह को किसने नियुक्त किया है और पदक्रम क्या है।

यह याद रखना महत्त्वतपूर्ण है, क्योंकि जैसा कि हम भविष्य में देखते हैं, जब भी इंडिया टुडे  के नकारात्मक कवर पृष्ठ दिखाई दिए, तो उनमें अक्सर मनमोहन सिंह की फोटो होती थी। हालाँकि, इंडिया टुडे  ने खुद यह स्पष्ट किया है कि शो यानि सरकार कौन चलाता है।

 

इंडिया टुडे  ने जून 2004 की कवर स्टोरी में देशवासियों के सामने भारत के नए विशिष्ट व्यक्तियों का परिचय कराया और इसका शीर्षक था ‘द न्यू वीआईपीज़’।

ये लोग कौन हैं?

इंडिया टुडे  ने इन लोगों के बारे में बताने के लिए नए शब्द– सोनियाइट्स – को गढ़ा।

इस प्रकार सोनिया गांधी को पहले से ही बेतरतीब राजनीति से किसी न किसी तरह से ऊपर रखा गया है। उन्हें एक नई विचारधारा– सोनियाइज़्म – के प्रणेता के रूप में दिखाया गया। 

सरकार का सिर्फ एक महीना हुआ था और इंडिया टुडे  के अनुसार ‘सोनियाइट्स’ सरकार और इतिहास दोनों को बदल रहे थे!

 

हालाँकि, साल के अंत में, जब यूपीए सरकार के सबसे अच्छे और सबसे खराब मंत्रियों की रैंकिंग की गई, जाहिर तौर पर इसमें नकारात्मक बात थी तो इंडिया टुडे  ने कवर पृष्ठ पर शीर्षक दिया- ‘मनमोहन्स मिनिस्टर्स, द बेस्ट एंड द वर्स्ट’!

ऐसा कैसे हो सकता है सोनिया के पीएम, लेकिन मनमोहन के मंत्री?

अब जनवरी 2005 के कवर पृष्ठ पर नज़र डालते हैं, यह आपको क्या बताना चाहता है? इस पर ‘प्रोजेक्ट सेंट सोनिया’ हर तरफ लिखा गया था।

 इसके बाद, इंडिया टुडे  आपको बताता है कि कुछ बातों को अपने दिमाग में कैसे रखें, जब चीजें सोनिया गांधी के हिसाब से नहीं जा रही हों।

”क्या सोनिया गांधी सेंटहुड (संतत्व) आभामंडल को खो रही हैं?, ”इंडिया टुडे पूछता है।

यह ऐसा है जैसे कोई आपसे पूछे किक्या आपने अपनी पत्नी को पीटना बंद कर दिया है?”

अगर आप हाँ कहते हैं, तो इसका मतलब है कि आप इस बात से सहमत हैं कि उनके पास सेंटहुड का आभामंडल था। अगर आप नहीं कहते हैं तो आपको ये जान लेना चाहिए कि उनका वो आभामंडल अभी भी बरकरार है। किसी भी तरह से सेंटहुड की पुष्टि की जाती है।

इसे भी देखें कि इंडिया टुडे  ने किस प्रकार लिखा है, ’गोवा और झारखंड में राज्यपालों के कार्यालय के माध्यम से लोकप्रिय जनादेश की तोड़फोड़’ हुई लेकिन यह नहीं बताया गया कि यह तोड़फोड़ उनके (सोनिया) इशारे पर हुई है।

कोई व्यक्ति अगर यह पढ़े तो उसके लिए यह समझना गलत नहीं होगा कि कि ये तोड़फोड़ उनकी पार्टी के खिलाफ थी।

 

 यहाँ तक कि जब वे (इंडिया टुडे) यूपीए के ज़माने में पार्टी और सरकार के बीच खींचतान को दिखा रहे थे, तब वे किसे स्थापित कर रहे थे और किसके रुतबे को कम कर रहे थे?

उन घटनाओं के दृश्य और उनका सार आपको क्या बताता है?

 

2006 का कवर ओटावियो क्वात्रोची को छल और प्रपंच करके बगैर किसी जाँच पड़ताल के दोषमुक्त ठहराने और उसे देश से भगाने पर आधारित है। ऐसा किसके इशारे पर किया जा सकता था ?

2006 के शक्तिशाली लोगों के समूह में ऐसा करने वाला वह कौन व्यक्ति हो सकता था, जो क्वात्रोची के काफी करीब था? इस कवर स्टोरी में हमें इसका कोई संकेत नहीं मिलता है। 

 

ठीक दो महीने बाद ही, साल 2006 के अप्रैल में विपक्ष ने लाभ के पद के मामले को लेकर सोनिया गांधी को घेर लिया था। स्पष्ट रूप से, गलत होने के कारण उन्हें सांसद का पद त्यागना पड़ा था।

हालाँकि, इंडिया टुडे  ने एक बार फिर सोनिया गांधी की संत वाली छवि दिखाते हुए अपने कवर पृष्ठ का शीर्षक रखा ‘मार्टियर स्ट्रोक’

अब जल्दी से चुनाव के पूर्व वर्ष 2008 के मार्च की ओर बढ़ते हैं। इस अंक के कवर पृष्ठ पर लिखा था किअब हमारे लिए वोट करें (नाऊ वोट फॉर अस”।  हम सब जानते हैं कि एक तस्वीर हजार शब्दों पर भारी पड़ती है। 

 

उसी वर्ष, यानी 2008 के एक दूसरे अंक का कवर पृष्ठ देखिए। इसमें आप देख सकते हैं कि कौन निर्देश दे रहा है? इस तस्वीर को देखने के बाद क्या कोई संदेह है?    

और यह 2009 के अप्रैल का कवर पृष्ठ है, जो आपको वह सब कुछ बता रहा है, जो बताया जाना है।

यहाँ तक, सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था, क्योंकि यूपीए जीत के ट्रैक पर थी। लेकिन जैसे वर्ष 2010 आया, यूपीए के लिए बुरी खबर आनी शुरू हो गई।    

तो आप अपेक्षा कर रहे होंगे कि यूपीए की अध्यक्षा, जो कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कठपुतली की चालक कहीं जाती हैं, पर आरोप लगाए जाएँगे। क्या ऐसा हुआ?  

इंडिया टुडे  के अनुसार यूपीए का मतलब अंडर परफॉर्मिंग अलायंस था, सही है, लेकिन उस गठबंधन के शीर्ष पर कौन था? निश्चित रूप से यूपीए अध्यक्षा।      

लेकिन, 2010 के मई अंक के कवर पृष्ठ पर इस शीर्षक के साथ कौन दिखे? मनमोहन सिंह।    

क्यों , क्योंकि, याद रखिए, संत सोनिया को सिर्फ अच्छी बातों के लिए श्रेय दिया जा सकता है, लेकिन जब सरकार गलत कर रही हो, तो उन्हें ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। क्योंकि वे राजनीति की गंदी दुनिया से ऊपर हैं, वे एक ‘शहीद’ हैं, एक ‘संत’ हैं। 

साल 2010 में जो दो सबसे बड़ी खबरें आई, वे थी सीडब्ल्यूजी घोटाला और 2जी घोटाला। उस समय इंडिया टुडे  के अंकों पर इन घोटालों को लेकर सोनिया गांधी तो दूर कांग्रेस तक का उल्लेख नहीं किया गया था। 

 

उसी साल, जब खुद को कांग्रेस में अलग-थलग कर दिए जाने से नाराज़ जगनमोहन रेड्डी सोनिया गांधी के विरुद्ध बिगुल फूँक रहे थे, तब इंडिया टुडे  ने दोनों के मध्य के समीकरण को लेकर एक कवर स्टोरी की थी। 

वर्षों तक जब आंध्र प्रदेश में वाईएस राजशेखर रेड्डी प्रभावी थे तब जगन की प्रगति ने पत्रिका का ध्यान आकर्षित नहीं किया, लेकिन जैसे ही उन्होंने सोनिया गांधी से पंगा लेना शुरू किया वैसे ही पत्रिका की उनमें रुचि जगी। 

इंडिया टुडे  की स्टोरी में सोनिया गांधी को पीड़िता बताते हुए कहा गया कि जगन के चैनल ने उनपर अपमानजनक हमला किया। इसका निहित अर्थ था कि सोनिया गांधी पर हमला करने के कारण उनके साथ जो हो रहा है वे उसके योग्य हैं।   

2011 में  इंडिया टुडे  का एक दुर्लभ अंक सामने आया, जिसकी कवर स्टोरी नकारात्मक थी और उसमें सोनिया गांधी भी थीं।

कांग्रेस पर संकट के बादल ही इतने घने और लंबे थे कि इंडिया टुडे  का भी उससे किनारा करना मुश्किल हो गया। लेकिन याद रहे इंडिया टुडे  में जब कभी कोई नकारात्मक स्टोरी होती है तो उसमें सोनिया गांधी अकेली नहीं होती हैं, वह हमेशा मनमोहन सिंह या फिर किसी और के साथ होती हैं। यह एक स्थापित तथ्य है कि सोनिया गांधी के इशारे के बगैर सरकार में एक पत्ता तक नहीं हिलता है, इसके बावजूद उनपर कभी हमला नहीं किया गया। 

हालाँकि, अक्टूबर 2011 तक सोनिया गांधी को बीमार बताकर उन्हें पीड़िता के रूप में चित्रित करके, सभी प्रकार की नकारात्मकताओं से बाहर निकाला गया। शीर्षक था- ‘कितनी बीमार हैं मिसेज़ गांधी?’। आखिरकार अगर वह इतनी बीमार हैं तो फिर वे दो अंकों की मुद्रास्फीति और बड़े घोटालों के लिए ज़िम्मदार नहीं हो सकतीं, क्या हो सकतीं हैं?  

वर्ष 2012 में, सोनिया गांधी को फिर एक पीड़िता के रूप में दर्शाया गया है जो  मुलायम सिंह यादव और ममता बनर्जी जैसे राजनेताओं के चंगुल में फँस गई। फिर से एक लाचार पीड़िता, उससे ज्यादा कुछ नहीं।   

  

उसी साल, इंडिया टुडे  कहता है कि देश में यूपीए हार रहा है। वह यह भी कहता है कि कोयला घोटाला के साथ रॉब्रट वाड्रा केअनरियल इस्टेटकी रिपोर्ट यूपीए पर एक काला धब्बा है।    

लेकिन आप इंडिया टुडे  के कवर पृष्ठ पर नज़र डालिए…  यूपीए की अध्यक्षा कौन हैं? जब कोयला घोटाला हुआ था, तब सरकार में नंबर एक कौन था? आप कभी नहीं जान पाएँगे।   

शुक्र है कि वह यह उल्लेख करना नहीं भूलते कि रॉबर्ट वाड्रा किसके दामाद हैं।  

अप्रैल 2014 में निकट भविष्य स्पष्ट है। लेकिन असफल और हारने वाला कौन है? मनमोहन सिंह।

लेकिन क्या इंडिया टुडे  ने उन्हें सोनिया गांधी का प्रधानमंत्री नहीं कहा था? तो जब तक चीज़ें ठीक थीं तभी तक वे सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री थेलेकिन जब चीजें बिगड़ने लगीं, तब वे अकेले जिम्मेदार ठहराए गए। ऐसा इसलिए किया गया ताकि सोनिया गांधी की छवि को बचाया जा सके, चाहे इसके लिए कुछ भी करना पड़े। 

 

लेकिन 2015 में, हार के बावजूद इंडिया टुडे  पूरी दृढ़ता से सोनिया गांधी के लिए खड़ा रहा। सोनिया गांधी को छोड़कर हार की जिम्मेदारी  सब में बाँट दी गई, ताकि ‘प्रोजेक्ट सेंट सोनिया’ जारी रहे।

“मां का मिशन : राहुल गांधी के सक्रिय न दिखने पर सोनिया गांधी ने आगे बढ़कर कांग्रेस की कमान अपने हाथ में लेने का निर्णय किया है। क्या उनका नेतृत्व डूबते हुए जहाज़ रूपी कांग्रेस को बचा पाएगा?”, सार में कहा गया।   

मां के मिशनका उपयोग हृदय स्पर्श करने के लिए था और यह भी दिखाया गया कि वे एक ‘योद्धाहैं। जब कांग्रेस के लोग इस शो को नहीं चला सकते हैं तो अंतिम आस ‘सेंट सोनिया’ होती हैं। 

सोनिया गांधी के कथित घोटालों की कहानी अगस्ता वेस्टलैंड के साथ वर्ष 2016 में सामने आई। लेकिन यह सोनिया गांधी के शामिल होने के बारे में नहीं था, बल्कि उन्हें भाजपा द्वारा निशाना बनाने के बारे में था।  

अपने इस अंक में इंडिया टुडे  कहता है कि अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले के लिए कांग्रेस अध्यक्षा को दोषी ठहराने की भाजपा की रणनीति का वह विश्लेषण कर रहा है।  

निहित अर्थ हुआ कि उनपर आरोप मढ़ा जा रहा है। यह मात्र भाजपा की एक रणनीति है। सिर्फ राजनीतिक प्रतिशोध के कारण ‘सेंट सोनिया’ को निशाना बनाया जा रहा है।   

अब मार्च 2018 में आइए। इंडिया टुडे  के कवर में सोनिया गांधी को हिलेरी क्लिंटन के साथ दिखाया गया है। देश में हुए चुनाव में महज 44 सीटों पर सिमट जाने के बावजूद सोनिया गांधी को वैश्विक नेता के रूप में दिखाया गया। 

अरुण पुरी के उस भाषण को गौर से देखिए जो इस कॉन्क्लेव में सोनिया गांधी की मौजूदगी में उन्होंने दिया था। इसमें उन्होंने सोनिया गांधी के लिए “सबसे पुरानी पार्टी का मुख्य संरक्षक”, “सर्वोच्च नेत्री”, “साहसी माता”, “उत्कृष्ट नेगोशिएटर (मध्यस्था)”, “सेवा, निस्वार्थ, त्याग की प्रतिमूर्ति” जैसे विशेषणों का उपयोग किया था।

क्या आपने ध्यान दिया कि इन सभी वर्षों में, सनसनीखेज नेशनल हेराल्ड घोटाले के बारे में कोई कवर पृष्ठ नहीं रहा, जिसमें सोनिया गांधी ‘मुख्य आरोपी’ हैं और जमानत पर बाहर हैं?

इसी तरह से मिथक गढ़ने का काम किया जाता है।

वास्तव में सोनिया गांधी के इर्द-गिर्द इस प्रभामंडल का निर्माण करने वालों में इंडिया टुडे  केवल एक सहायक था, इसके अलावा और भी थे। लेकिन इंडिया टुडे  उनका नेतृत्व करता दिख रहा था।

उदाहरण के लिए, द हूट नोट्स में सेवंती निनान ने प्रधानमंत्री पद के लिए सोनिया गांधी के कथित त्याग के मिथक बनाने की कोशिशों के बारे में लिखा है-

 

आपके पास दो सत्ता केंद्र हैं, एक सरकार और दूसरी सत्ताधारी पार्टी। यह वास्तव में आश्चर्यजनक है कि इसपर कितना कम लिखा और कहा गया है। मीडिया और प्रेस ने त्याग की कहानी को इतना अधिक दिखाया और छापा कि सभी को विश्वास हो गया कि यही पूरी कहानी है। और क्या हम सबने इसमें अपनी समझ नहीं खो दी। सोनिया गांधी की महात्मा गांधी से तुलना किया जाना कितना विचित्र है?

 

निनान ने आगे लिखा है, “उनके (सोनिया) त्याग के दिन हिंदुस्तान टाइम्स  ने “अमेज़िंग ग्रेस (अद्भुत शालीनता)” हेडलाइन के साथ उनकी एक बड़ी तस्वीर छापी थी। इसने “टर्निंग इट डाउन” नाम से एक संपादकीय भी लिखा, लगभग इसी प्रकार का संपादकीय द हिंदू  में “स्टनिंग पॉलिटिकल सैक्रिफाइस (चौंकाने वाला राजनीतिक त्याग)नाम से लिखा गया था। (दोनों 19 मई को।)

सोनिया गांधी की तुलना महात्मा गांधी से की जा रही थी, क्या आप इसकी कल्पना कर सकते हैं?

जैसा कि हमने ऊपर देखा, इस चापलूसी की शुरुआत पिछले डेढ़ दशक में सोनिया गांधी को महिमामंडित करने के कवरेज की शुरुआत थी, जिसमें उन्हें सभी राजनीति और आलोचनाओं से ऊपर एक संत बना दिया गया।

आज, जब उनकी आलोचना की जाती है, तो कोई आश्चर्य नहीं कि वही लोग इसे स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।

लेखक धर्म समझने, क्रिकेट और राजनीति में रुचि रखते हैं।