राजनीति
मुस्लिम प्रतिनिधित्व: इतिहास से लेकर वर्तमान तक, विष के बीजों की फसल कड़वी होती है
अमित - 23rd November 2020

बिहार चुनाव परिणामों में उभरकर सामने आए एक ट्रेंड को समझने के लिए हम इतिहास-वर्तमान-इतिहास-वर्तमान की रणनीति अपनाते हैं। भारत में मुसलमानों की ‘ऐतिहासिक भूमिका’ को देखते हुए अंग्रेज़ी हुकूमत ने उनके तुष्टीकरण की नीति अपनाई थी।

मुसलमानों के लिए जब पृथक निर्वाचक मंडल (भारतीय परिषद अधिनियम-1909) की व्यवस्था की गई तो उस समय की बेहद सीमित रही कांग्रेस के नेताओं ने इसका विरोध किया था लेकिन किसी ने उनके विरोध पर ध्यान नहीं दिया। समय के साथ, बाद में कांग्रेस का आकार बढ़ा तो 1916 के लखनऊ पैक्ट में इसे स्वीकार कर लिया।

1909 में विरोध कर रहे कांग्रेस के वे नेता दूरदर्शी थे। लेकिन शायद तत्कालीन वायसराय मिंटो (4th Earl of Minto) जितना दूरदर्शी कोई नहीं था। अपने सहयोगी और भारत सचिव जॉन मार्ले से वायसराय मिंटो ने तभी कह दिया था कि ‘पृथक निर्वाचन के रूप में हम विष के ऐसे घातक बीज बो रहे हैं, जिसकी फसल बड़ी कड़वी होगी।’ ऐसा ही हुआ। क्योंकि मुसलमानों को एक बार जो विशेष अवसर दिया जा चुका था, वह बढ़ते-बढ़ते अलग देश की मांग और निर्माण के साथ खत्म हुआ।

इतिहास के इस छोटे से अध्याय को यहीं रोकते हुए अब हम बिहार चुनाव का रुख करते हैं। बिंदुवार-

  • एआईएमआईएम (ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन), जिसका अर्थ है आल इंडिया काउंसिल फॉर यूनिटी ऑफ मुस्लिम, ने इस बार बिहार चुनाव में 20 उम्मीदवार उतारे थे।
  • 16 उम्मीदवार मुस्लिम बाहुल्य सीमांचल में थे। यहाँ मुस्लिम आबादी एक-तिहाई (1/3) के आसपास है।
  • कहने को तो एआईएमआईएम ने 5 अन्य दलों से गंठबंधन किया था, जिसमें एससी/एसटी वर्ग की भी हिस्सेदारी थी लेकिन लाभ सिर्फ इन्हें ही मिलना था, और मिला भी।
  • 16 सीटों में 5 में जीत दर्ज की। सभी उम्मीदवार मुस्लिम हैं। अब इन सीटों पर गौर कीजिए।
    — दो सीटों (अमौर और कचधमान) पर 50% (इनमें से एक पर 55%+) से अधिक मत मिले।
    — इन दोनों सीटों पर दूसरे और तीसरे स्थान पर भी मुस्लिम उम्मीदवार ही रहे।
    — सभी पाँच सीटों पर मतदाताओं के सामने महागठबंधन के मुस्लिम उम्मीदवारों का विकल्प था।
    — बैसी विधानसभा सीट पर तो राजद के तेजस्वी यादव ने घोषणा की थी कि अगर उनके उम्मीदवार हाजी अब्दुस सुहान जीतते हैं तो कैबिनेट मंत्री बनाए जाएँगे। इसके बावजूद मतदाताओं ने एआईएमआईएम को चुना।
    — जकीहाट से एआईएमआईएम उम्मीदवार ने राजद के उम्मीदवार को हराया जो उनके भाई हैं।

आज का निष्कर्ष निकालने से पहले थोड़ा रुकते हैं और रियर मिरर यानी इतिहास के आइने में इसे झांककर देखते हैं। यानी फिर से इतिहास।

1935- भारत शासन अधिनियम के तहत 1937 में प्रांतीय विधानमंडलों के लिए हुए चुनावों में मुस्लिम लीग को पूरे भारत में पृथक निर्वाचन मंडल की आरक्षित 482 सीटों में सिर्फ 109 सीटों पर सफलता हाथ लगी। देखने में यह आँकड़ा बहुत छोटा दिखाई देता है और लगता है कि मुसलमानों ने सांप्रदायिक मुस्लिम लीग को नकार दिया था और कांग्रेस को ही चुना था।

लेकिन ये गलत है। दरअसल, मुस्लिम मतदातों ने क्षेत्रीय मुस्लिम दलों को चुना था और कांग्रेस को और भी बुरी तरह नकार दिया था। उदाहरण के लिए मुस्लिम लीग को जहाँ 25 प्रतिशत के आसपास सीटों पर जीत मिली थी, वहीं कांग्रेस को सिर्फ 6 प्रतिशत से संतोष करना पड़ा था। लेकिन आने वाले चुनावों में मुस्लिम लीग सफलता के नए पैमाने बनाती गई। जो वोट अभी तक कांग्रेस के छिटककर क्षेत्रीय दलों को मिलते थे, अब सीधे-सीधे मुस्लिम लीग को मिलने लगे।

ध्यान रखिए, पश्चिमी शिक्षा पाए मुस्लिम लीग के नेता हिंदू महासभा का विरोध नहीं कर रहे थे, वे पंडित नेहरू, मौलाना आज़ाद, सुभाष बाबू, सरदार पटेल और महात्मा गांधी की कांग्रेस का विरोध कर रहे थे। जिन्ना किसी मदरसे में पढ़ा कोई कठमुल्ला या मौलाना नहीं थे, उन्होंने भी इंग्लैंड से बैरिस्टरी की पढ़ाई की थी।
मुस्लिमों के प्रतिनिधित्व की यह कहानी रक्तरंजित इतिहास है। उन्होंने मज़हब के लिए देश को बांट दिया।

अंत में निष्कर्ष की ओर बढ़ने से पहले ओवैसी का ऐलान देखिए, हैदराबाद, महाराष्ट्र और बिहार के बाद अब बंगाल और फिर उत्तर प्रदेश में भी चुनाव लड़ा जाएगा।

इतिहास से सीख, भविष्य का डर लिये वर्तमान का निष्कर्ष:

  • मुस्लिमों का पहला लक्ष्य भाजपा को हराना है (स्वतंत्रता से पहले यह लक्ष्य कांग्रेस पर था)। यहाँ संविधान याद आता है (स्वतंत्रता से पहले अंग्रेज़ी हुकूमत उन्हें न्याय और बराबरी देने वाली लगती थी)। इस पहले चरण में भाजपा के सामने कांग्रेस होगी तो सबसे पहले सेक्युलरिज़्म याद आएगी।
  • अगर कांग्रेस के अलावा (बेहतर) मुस्लिम तुष्टीकरण करने वाला कोई और विकल्प होगा तो ऊपर वाली स्थिति से दो कदम आगे जाकर, कांग्रेस को सॉफ्ट हिंदुत्व का समर्थक बताकर क्षेत्रीय दलों को वोट दिया जाएगा, जो सीधे तौर पर मुसलमान वोटों की वकालत करते हैं। जैसे उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बिहार में राजद आदि।
  • अगर सपा/राजद जैसा विकल्प होंगे तो अगले चरण इन्हें एआईएमआईएम का विकल्प चाहिए।
  • इनके उभार से एक पार्टी के समर्थक खुश हो सकते हैं कि इससे हिंदुओं को ‘संभावित खतरे’ का बोध होगा और उनका वोट बिखरने के बजाय एकजुट होगा। लेकिन ध्यान रखिए, ये देश के हित की बात है।

खैर… मतलब साफ है। भाजपा हराओ>संविधान-सेक्युलरिज्म की आड़ लो>और तुष्टिकरण वाली पार्टियाँ चुनो>सीधे मुस्लिम पार्टियाँ चुनो> (अब आगे) इतिहास का आइना देखिए और याद रखिए Objects in mirror are closer than they appear.

नोट: इंग्लैंड में पढ़े आधुनिक बैरिस्टर-कम-राजनेता को मॉडर्न, प्रौग्रेसिव, जर्नलिस्ट और इन्टेलेक्चुअल्स ‘सेक्युलर’ नेता मानते हैं। मुस्लिम यूनिटी की बात करने वाले ओवैसी पर ये लहालोट हुए रहते हैं।