भारती / राजनीति
मुंबई को महाराष्ट्र से अलग नहीं बल्कि शिवसेना के चंगुल से मुक्त करने की आवश्यकता

जिस गति से बृहन् मुंबई महानगर निगम (बीएमसी) ने अभिनेत्री कंगना रनौत के पाली हिल स्थित कार्यालय में कथित रूप से “अवैध” निर्माण को तोड़ा है, उससे फासीवादी कार्यकुशलता की गंध आती है। दो दिनों के भीतर ही नोटिस देने, परिसर का सर्वेक्षण करने और बॉम्बे उच्च न्यायालय के आदेश से पहले बुलडोज़र चलाने का काम भी हो गया।

न्यायालय ने भी माना कि बीएमसी की कार्रवाई में कुटिल उद्देश्य का रंग दिखता है, वहीं दूसरी ओर शिव सेना ने कहा कि मुंबई को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) कहकर रनौत मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करना चाहती हैं।

सत्ताधारी सरकार की दो सहायक पार्टियाँ स्वतंत्रता के बाद 10 वर्षों को छोड़कर हमेशा सत्ता में रही हैं, किसी ने भी कभी यह नहीं कहा कि मुंबई को राज्य से अलग करने की आवश्यकता है। दशकों से मुंबई पर शिवसेना का ही शासन रहा है और यह (ठाणे समेत) पार्टी की राजनीतिक शक्ति का गढ़ है।

शिवसेना ने भाजपा के साथ दो बार गठबंधन में सरकार बनाई, एक बार 1990 के दशक में और दूसरी बार देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में 2014 से 2019 तक और तब भी मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने का विचार नहीं उठा। ऐसे में यह कहना कि कंगना रनौत भाजपा के साथ मिलकर अलगाव का षड्यंत्र कर रही हैं, एक कुतर्क है।

वास्तविक समस्या यह है कि मुंबई को कभी भी नागरिक कल्याण के उद्देश्य से नहीं चलाया गया और शहर में जीवन की गुणवत्ता गिरने का एक प्रमुख कारण है शिवसेना। भारत की सबसे बड़ी झुग्गी-बस्तियाँ (धारावी आदि) यहाँ हैं और सार्वजनिक परिवहन का खस्ता हाल है।

यदि शिवसेना वास्तव में मुंबई से प्यार करती है तो वह कम से कम मुंबई को रहने की एक बेहतर जगह बना सकती थी, विशेषकर तब जब ग्रामीण राजनीतिक स्वार्थ इसके मार्ग में बाधा नहीं बन रहे थे। ध्यान देने वाली बात यह है कि शिवसेना के पास ठाणे के विधायक एकनाथ शिंदे के माध्यम से शहरी विकास मंत्रालय भी है।

सीधे शब्दों में समझा जाए तो मुंबई जहाँ शिवसेना का वर्चस्व हमेशा से था, वह आज और अधिक है। एक ही पार्टी शहर और राज्य के स्तर पर इसका शासन कर रही है। कंगना रनौत के कार्यालय पर कार्रवाई को लेकर जब शिवसेना की आलोचना हुई तो पार्टी के प्रवक्ता ने पल्ला झाड़ते हुए कहा कि बीएमसी की योजनाओं की उन्हें जानकारी नहीं है।

लेकिन वास्तविकता यह है कि बीएमसी की शक्ति नगर आयुक्त से जुड़ी हुई है, न कि निर्वाचित महापौर से। ऐसे में जब शिवसेना के पास शहरी मंत्रालय है तो संभव नहीं है कि रनौत के कार्यालय को तोड़ने का निर्णय शिवसेना की जानकारी या उकसावे के बिना आया हो। अब दो निष्कर्ष निकलते हैं-

पहला, रनौत के कार्यालय पर जो कार्रवाई हुई उसकी सीधी ज़िम्मेदार शिवसेना है क्योंकि बीएमसी और शहरी विकास मंत्रालय, दोनों पार्टी के पास हैं। मुंबई में हर जगह अवैध निर्माण है और अगर रनौत के कार्यालय में भी सच में अवैध निर्माण था तो उसकी ज़िम्मेदार भी शिवसेना ही है। जब तक रनौत ने सरकार की आलोचना नहीं की थी, तब तक उन्हें इस अवैध निर्माण की चिंता नहीं थी।

दूसरा, शिवसेना की सड़क-छाप राजनीति अब मुख्यधारा में आ गई है और मुंबई के लिए या शिवसेना द्वारा नियंत्रित अन्य शहरों के लिए यह सही नहीं है।

हमें मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की आवश्यकता नहीं है, परंतु आवश्यकता है कि बीएमसी और इसके निर्वाचित अधिकारियों को अधिक शक्तियाँ दी जाएँ। दुर्भाग्यवश, शिवसेना इतनी दूर की सोच नहीं रखती कि वह समझ पाए कि निचले स्तर तक शक्तियाँ देने का लाभ मुंबई और ठाणे, जिन दो शहरों पर वह शासन करती है, को ही होगा।

मैं फिर से कहता हूँ- मंबई को महाराष्ट्र से अलग होने की आवश्यकता नहीं है, इसे आवश्यकता है शिवसेना के मलिन हाथों से मुक्त होने की।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।