राजनीति
अनेक चरणों में चुनाव- राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में मोदी पहुँचा सकते हैं अलग संदेश

आशुचित्र- 

  • हर प्रदेश में अलग-अलग चरणों में चुनाव होने से अलग-अलग मतदाताओं को रिझाने वाले विरोधात्मक संदेश प्रसारित करने का लाभ मिलता है।
  • मोदी को इसमें फायदा मिलेगा क्योंकि उनका चुनावी दल उनके विरोधियों से अधिक मज़बूत है।

यह एक आम धारणा है कि कई राज्यों में अनेक चरणों में होने वाले मतदान से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को लाभ मिलेगा क्योंकि इससे नरेंद्र मोदी अपने चुनाव अभियान को अनुकूलित कर पाएँगे। वे अनेक प्रदेशों के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग समय पर हो सकते हैं और उन्हें बड़े भागों में एक राज्य को संबोधित नहीं करना होगा। वे हर राज्य के हर क्षेत्र में अपने संदेश को बारीकी से पहुँचा पाएँगे।

हालाँकि, यदि मोदी हर जगह जाकर हर जगह पर अलग-अलग बात कहेंगे तो यही लाभ उनके विरोधियों के पास भी है। उनका विपक्ष बँटा हुआ है और कुछ राज्यों तक सीमित है इसलिए हर राज्य में मोदी की उपस्थिति वहाँ के स्थानीय नेता से कम ही होगी।

हर प्रदेश में अलग-अलग चरणों में चुनाव होने से अलग-अलग मतदाताओं को रिझाने वाले विरोधात्मक संदेश प्रसारित कर सकेंगे क्योंकि एक क्षेत्र में जो कारगर है, वह दूसरे क्षेत्र में नहीं। उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में सात चरणों में मतदान होगा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, झारखंड और ओडिशा में चार चरणों में और असम व छत्तीसगढ़ में तीन चरणों में।

2009 में स्वर्गीय वाईएस राजशेखर रेड्डी ने अविभाजित आंध्र प्रदेश के द्विचरणीय चुनाव का लाभ उठाया। एक जगह उन्होंने तेलंगाना समर्थक भाषण दिया और दूसरी तरफ जहाँ तेलंगाना क्षेत्र के बाहर मतदान था, वहाँ उन्होंने अपनी राग को पूरी तरह बदल दिया। वे दोनों क्षेत्रों में विजयी हुए।

2019 में नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी इस रणनीति का उपयोग कर सकती है। उदाहरण स्वरूप- असम में बंगाली जनसंख्या वाली बरक घाटी को वे नागरिकता संशोधन अधिनियम पर अलग संदेश दे सकते हैं और इसके विपरीत ब्रह्मपुत्र घाटी में अलग। कांग्रेस भी बरक घाटी में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का विरोध कर असमी-बहुल क्षेत्रों में इसका समर्थन कर सकती है।

इसी प्रकार उत्तर प्रदेश में पार्टी को अलग-अलग जाति समुदायों को अलग-अलग वादों से रिझाना होगा, कुछ चरणों में मोदी के पास सवर्णों और गैर-यादव अन्य पिछड़ा वर्ग मतों को एकीकृत करने का अवसर होगा और उन क्षेत्रों में जहाँ महागठबंधन के कारण यादव मायावती का समर्थन करने के लिए विवश होंगे, वहाँ भाजपा यादव मत को भी रिझा सकती है।

कर्नाटक में जहाँ भाजपा मुख्य दावेदार है, वह तटवर्ती क्षेत्रों में नर्म हिंदुत्व का संदेश दे सकती है और अन्य क्षेत्रों में विकास का। लेकिन तमिल नाडु में जहाँ मोदी अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन में छोटे साझेदार हैं, वहाँ वे केवल विकास और दिल्ली से शुभचिंतक के रूप में खुद को प्रस्तुत कर सकते हैं जो राज्य के त्वरित विकास में सहायता करेगा।

एक ऐसे समय में जहाँ मीडिया राजनीति को अत्यधिक तवज्जो देती है और वॉट्सैप और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया मंचों के माध्यम से समाचार तेज़ी से फैल जाता है, ऐसे में कही गई कोई भी बात स्थानीय नहीं रह पाती है। लेकिन यह मानना अभिमानपूर्ण होगा कि वाराणसी की किसी सार्वजनिक रैली में कही गई बात का प्रभाव सोशल मीडिया पर कहीं और से प्रचारित विरोधात्मक संदेश से कम होगा।

विभिन्न मतदाता हितों के लिए विभिन्न संदेशों को बारीकी से पहुँचाना ही हर राज्य में होने वाली बहुचरणीय चुनाव प्रक्रिया का लाभ है।

लेकिन इस लाभ का लाभ विरोधी पार्टियाँ भी उठा सकती हैं। वे इस वास्तविकता में कर पाएँगी या नहीं, यह तो उस चिंतन पर निर्भर करता है जो प्रचार के लिए किया जाएगा। मोदी को इसमें यही लाभ मिलेगा क्योंकि उनका चुनावी दल उनके विरोधियों से अधिक मज़बूत है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।