राजनीति
मस्जिदों से फैला सीएए के विरोध में दुष्प्रचार जिसका परिणाम हुआ पूर्वोत्तर दिल्ली के दंगे

एक सूचना का अधिकार (आरटीआई) याचिका के उत्तर में दिल्ली पुलिस ने हाल में बताया कि आठ मस्जिदों, दो मदरसों, एक दरगाह और दो मंदिरों को 24-25 फरवरी को हुए पूर्वोत्तर दिल्ली जिले के दंगों में निशाना बनाया गया। इन 13 मामलों के लिए पुलिस ने अलग-अलग एफआईआर दायर किए हैं और आरटीआई याचिका के उत्तर के समय (9 जून) तक 35 लोगों को गिरफ्तार किया था।

पुलिस ने क्षतिग्रस्त हुए 13 स्थलों का नाम बताने से मामले की संवेदनशीलता का हवाला देते हुए मना कर दिया। हालाँकि दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग द्वारा इस महीने प्रकाशित रिपोर्ट में दंगाइयों द्वारा निशाना बनाए गए ऐसे 17 स्थलों को सूचीबद्ध किया है। इनमें मस्जिद, मदरसे, कब्रिस्तान और दरगाह शामिल हैं।

चांद मस्जिद, फरूखिया मस्जिद, जन्नती मस्जिद, फातिा मस्जिद, मदीन मस्जिद, औलिया मस्जिद, तैयबा मस्जिद, अल्लाह वाली मस्जिद, मौल बख्श मस्जिद, आदि के नाम इस सूची में हैं। सांप्रदायिक दंगों में एक-दूसरे के धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया जाना नई बात नहीं है लेकिन दिल्ली दंगों में कुछ अलग था।

दंगाइयों ने मस्जिदों को निशाना क्यों बनाया इसका एक प्रमुख कारण है कि सीएए-विरोधी आग को भड़काने का काम इन मस्जिदों ने किया था जिसके परिणामस्वरूप फरवरी के अंतिम सप्ताह में पूर्वोत्तर दिल्ली में दंगे हुए। पिछले वर्ष दिसंबर में संसद द्वारा पारित नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरुद्ध प्रदर्शन करने वाले आयोजकों ने क्षेत्र की प्रमुख मस्जिदों का चतुरता से उपयोग किया।

आयोजकों ने पूर्वोत्तर दिल्ली की कुछ मस्जिदों को वास्तव में इसलिए चुना क्योंकि वहाँ बड़ी संख्या में नमाज़ी आते थे, विशेषकर प्रातः और संध्या समय में। मस्जिदों के पास तंबू लगा दिए गए। आयोजकों (मुस्लिम राजनेताओं, संगठनों, आदि) ने सीएए-विरोधी सामग्री, वक्ता और एक्टिविस्ट दिए, वहीं मस्जिदों ने आयोजकों को दिन में कई बार आने वाले दर्शक-श्रोता दिए।

ये नमाज़ी अपने निकटतम प्रदर्शन स्थल पर जाने लगे जहाँ वक्ता सीएए और केंद्र सरकार के विरुद्ध ज़हर उगलते थे। इससे सीएए के विरुद्ध गलत जानकारियाँ और दुष्प्रचार हुआ एवं पूर्वोत्तर दिल्ली में धार्मिक आधार पर लोगों का ध्रुवीकरण हुआ।

शिव विहार क्षेत्र के कई दंगा मामलों में मुख्य आरोपी सलमान का बयान नीचे संलग्न है जिसमें उसने बताया है कि कैसे फरुखिया मस्जिद के निकट सीएए-विरोधी धरना स्थल पर वक्ता लोगों को भड़काया करते थे।

इसी प्रकार नीचे एक मुस्लिम प्रत्यक्षदर्शी का बयान है जिसने पुलिस को बताया कि चांदबाग मज़ार के निकट स्थित सीएए-विरोधी धरना स्थल ने कैसे हिंसा को भड़काया।

लेकिन सिर्फ घृणा भाषणों ने ही क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न नहीं किया। इन प्रदर्शन स्थलों ने मिनी शाहीन बाग का काम किया और सुबह व शाम के पीक ट्रैफिक घंटों में नमाज़ियों की भीड़ से रास्ता बाधित कर सामान्य लोगों को असुविधाएँ पहुँचाईं।

दिल्ली पुलिस के आरोप-पत्र में सात मस्जिदों और सीएए-विरोधी प्रदर्शन स्थलों का उल्लेख है जहाँ सरकार के विरुद्ध शांतिपूर्ण विरोध के नाम पर कुछ लोगों ने अतिक्रमण कर लिया था।

आरोप-पत्र में लिखा गया, “प्रदर्शन के लिए अवैध रूप से क्षेत्रों पर अतिक्रमण करने और सड़कों पर जमे रहने, माइक और लाउड्स्पीकर के माध्यम से लगातार नारेबाज़ी और देर शाम तक भीड़ के एकत्रित रहने से न सिर्फ आवाजाहकों और निवासियों को परेशानी हुई बल्कि कि इन धरनों के कारण क्षेत्र में तनाव और ध्रुवीकरण का माहौल भी बना।”

पुलिस आरोप-पत्रों में निम्न सात स्थलों का उल्लेख है-

  1. मदीन मस्जिद के निकट स्थित 66 फूटा सड़क (15 जनवरी से अवैध अतिक्रमण)
  2. फरूखिया मस्जिद के निकट बृजपुरी पुलिस (17 जनवरी से)
  3. वज़ीराबाद सड़क पर चांदबाग मज़ार (17 जनवरी से)
  4. अशरफिया मस्जिद के निकट करदम पुरी पुलिया (17 जनवरी से)
  5. नूर-ए-इलाही (शीशे वाली मस्जिद), भजनपुरा (18 जनवरी से)
  6. शास्त्री पार्क में बुलंद मस्जिद (28 जनवरी से)

इनमें से कुछ मस्जिदों को, जिनके प्रति दंगाइयों के मन में रोष आया था, 24-25 फरवरी की हिंसा में निशाना बनाया गया।

भारत भर में प्रदर्शन स्थल के रूप में पहचान पाने वाला शाहीनबाग मुस्लिम बहुल क्षेत्र में उपस्थित है। यह हफ्तों तक लाखों लोगों के आवागमन में बाधा बना लेकिन इसने आसपास के हिंदू क्षेत्रों में सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न नहीं किया क्योंकि लाउडस्पीकर पर दिए जा रहे घृणा भाषणों की आवाज़ हिंदुओं तक नहीं पहुँचती थी।

पूर्वोत्तर दिल्ली अलग है। यहाँ मिश्रित जनसंख्या है जहाँ हिंदू और मुस्लिम पास-पास रहते रहैं। इसलिए हिंदुओं और उनकी संपत्ति को निशाना बनाने के प्रतिकार के रूप में भीड़ ने मस्जिदों पर हमला किया जहाँ से घृणा का ज़हर कई दिनों से घोला जा रहा था। एफआईआर और पुलिस के आरोप-पत्रों से इस बात की पुष्टि होती है।

मुस्लिम समुदाय ने अपने धार्मिक स्थलों का दुरुपयोग निहित स्वार्थों वाले राजनीतिक उद्देश्यों के लिए होने दिया जिससे वहाँ से हिंदू समुदाय, भारतीय राज्य और वर्तमान सरकार के प्रति घृणा की आवाज़े उठीं।

लेकिन इसमें सरकार के लिए भी एक सीख है- घावों को फैलने न दिया जाए। अमित शाह के निर्णयों के अनुसार केंद्र सरकार ने एक बड़ी गलती की कि सीएए-विरोधियों को अवैध रूप से शाहीनबाग सड़क पर कब्ज़ा बनाए रखने दिया गया जो कि नोएडा और दिल्ली के बीच एक महत्त्वपूर्ण संयोजक है।

कार्रवाई न होने से प्रदर्शनकारियों को मिनी शाहीनबाग खोलने का साहस आया जो चतुरता से मुस्लिम जनसंख्या के बीच मस्जिदों के निकट खोले गए। शेष इतिहास है। यदि सरकार समय पर कार्रवाई करती और शुरुआती स्तर पर ही इसे रोक देती तो पूर्वोत्तर दिल्ली को उस पीड़ा से बचाया जा सकता था जो दंगों से उसे हुई है।

अरिहंत स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं।