राजनीति
उमर अब्दुल्ला के ‘प्रधानमंत्री’ कहे जाने पर मोदी को नहीं होना चाहिए चिंतित

प्रधानमंत्री उमर अब्दुल्ला को अकारण ही तवज्जो दे रहे हैं जो उन्हें नहीं मिलना चाहिए। उत्तर कश्मीर की एक राजनीतिक रैली में अब्दुल्ला के बयान, कि उनकी पार्टी 1953 के परिदृश्य में फिर लौटना चाहती है जहाँ कश्मीर का अपना प्रधानमंत्री (वज़ीर-ए-आलम) और राष्ट्रपति (सद्र-ए-रियासत) था, पर प्रतिक्रिया देकर प्रधानमंत्री ने इसे अभियान की चर्चा का हिस्सा बना दिया है।

सिकंदराबाद में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा, “उनका (उमर) का कहना है कि वे समय के चक्र को घुमारप 1953 पर ले जाएँगे और भारत में दो प्रधानमंत्री होंगे, कश्मीर का प्रधानमंत्री अलग होगा।” उन्होंने कांग्रेस पार्टी को अपने राजनीतिक सहयोगी के दावे का खंडन करने की चुनौती दी।

हालाँकि, प्रधानमंत्री इस मुद्दे को उठाने के लिए स्वतंत्र हैं यदि वह उनकी राजनीति के अनुकूल है लेकिन उन्हें उमर अब्दुल्ला पर विशेष  ध्यान देने की जरूरत नहीं है जो अपनी अलगाववादी राजनीति को चमकाने में लगे हुए हैं। इसके दो कारण हैं।

पहला, उमर अब्दुल्ला द्वारा दिए गए भाषण की तारीख और उनके द्वारा किए गए दावों पर ध्यान देना चाहिए। तारीख 1 अप्रैल है। यह चुनावी झुनझुने के अलावा कुछ नहीं है।

दूसरा, और यह महत्त्वपूर्ण है- प्रधानमंत्री कह देने से मुख्यमंत्री की शक्तियाँ नहीं बदल जाएँगी। दिल्ली के ‘महापौर’ अरविंद केजरीवाल की शक्तियाँ देश की राजधानी दिल्ली वाले राज्य के मुख्यमंत्री होने से अलग नहीं हो जाती हैं और उन्हें भी मुख्यमंत्री ही कहा जाता है। पद बढ़ाना सिर्फ प्रतिष्ठा बढ़ाता है, वैधानिक शक्तियाँ नहीं।

अगर मोदी और अब्दुल्ला राजनेता होने की बजाए कॉर्पोरेट क्षेत्र में होते तो यह समझते कि पद बढ़ाना प्रायः उन परिस्थितियों के लिए होता है, जहाँ प्रतिभा को उसकी प्रतिष्ठा दी जानी हो लेकिन पद बढ़ोतरी ही सभी महत्वाकांक्षाओं का अंत नहीं है। ऊँचा उड़ने वालों को बड़े पद देकर उनके कम वेतन या कमतर पद की खानापूर्ति की जाती है।

उदाहरण के तौर पर कई विदेशी बैंकों में किसी भी आईआईएम से उच्च गुणवत्ता वाली भर्ती में अकसर उपाध्यक्ष का पद दिया जाता है। वहीं उस बैंक के राष्ट्रीय प्रमुख को भी उपाध्यक्ष ही कहा जाता है। हमें संदेह होना चाहिए कि एक उपाध्यक्ष जो राष्ट्रीय प्रमुख भी है की शक्तियाँ उससे अधिक होगी जो उपाध्यक्ष क्रेडिट कार्ड के वितरण या नए उत्पाद बनाने पर कार्य कर रहा हो।

इस बेतुके पैमाने पर किसी चपरासी को भी सीईओ कहा जा सकता है जिसका अर्थ होगा चीफ एरांड ऑफिसर (मुख्य संदेशवाहक कार्यकारी)।

सरदार पटेल सबसे ज्यादा रियासतों को भारतीय संघ में विलय करने में सक्षम हुए और उन्होंने पुराने शासकों को अपने खिताबों और राजसी धन को बनाए रखने की अनुमति दी। इसके बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को इन्हें खत्म करने में आनंद की अनुभूति हुई जबकि इसमें वास्तविक शक्तियाँ निहित नहीं थीं, बल्कि मात्र कुछ पैसे और एक गौरवशाली उपाधि थी।

तो उमर अब्दुल्ला खुद को प्रधानमंत्री कहने के लायक हो सकते हैं अगर अगले विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी सत्ता में आती है और इससे कोई परहेज़ नहीं करना चाहिए यदि वे उनके राज्य को एक सामान्य राज्य, न कि विशेष राज्य की तरह भारतीय संघ में विलय करने के लिए तैयार हो जाते हैं तो। ऐसे में उन्हें प्रधानमंत्री की उपाधि दे सकते हैं यदि वे जिहादी तत्वों पर नकेल कसकर, धर्मनिरपेक्ष भारत का पूर्ण भागीदार बनने के लिए अपने राज्य को सामान्य स्थिति में लाएँ।

कर्नाटक अपना राज्य ध्वज चाहता है और अधिकांश राज्य चाहते हैं कि उनकी क्षेत्रीय भाषाओं को राष्ट्रीय भाषाओं के रूप में मान्यता दी जाए। अगर मांग अलगाव की बजाय पहचान की है, वास्तविक शक्ति की बजाय उपाधि की है तो केंद्र को चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।

सभी मुख्यमंत्रियों को प्रधानमंत्री का नाम देकर राष्ट्र को छोड़ा नुकसान होगा। लेकिन अंतर यह हो जाएगा कि देश का प्रधानमंत्री प्रमुख प्रधानमंत्री होगा।

मोदी या देश के किसी भी प्रधानमंत्री को उपाधि ऊपर उठाने से डरना नहीं चाहिए। लोगों को संतुष्ट करने के लिए कुछ उपाधियाँ देना भी सही है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।