राजनीति
मोदी तेल अविनियमन पर दोहरा रहे हैं वाजपेयी की गलती, तेल की कीमतें गिराने से नहीं चलेगा काम
मोदी तेल अविनियमन पर दोहरा रहे हैं वाजपेयी की गलती

प्रसंग
  • तेल की कीमतों से अविनियमन हटाने से वाजपेई सरकार को स्वयं को बचाने में मदद नहीं मिली थी; यह 2019 में मोदी की संभावनाओं को बल देने या नवंबर और दिसंबर के आगामी विधानसभा चुनावों में कोई मदद नहीं करेगा।
  • मोदी सरकार द्वारा जनता को लुभाने के लिए चुना गया यह रास्ता भाजपा के लिए 2019 की संभावनाओं के लिए अनुकूल नहीं होगा।

क्या नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन – 2 (एनडीए -2), अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए -1 द्वारा तेल के क्षेत्र में की गयी गलतियों को दोहरा रहा है?

पिछले शुक्रवार (5 अक्टूबर) को पेट्रोल और डीजल करों में तीव्र कटौती की घोषणा की गई थी, जिसमें केंद्रीय उत्पाद शुल्क 1.50 रुपये प्रति लीटर कम किया गया था, तेल विपणन कंपनियों को 1 रुपए की कटौती के लिए कहा गया था और भाजपा शासित राज्य अपने करों में इतनी ही कटौती प्रदान कर रहे हैं, इस प्रकार अस्थायी रूप से ही सही, लेकिन कीमतें 5 रुपये प्रति लीटर तक कम हो गयीं हैं।

इस वास्तविकता के अलावा कि यदि तेल की कीमतें और बढ़ती हैं (जिसकी सम्भावना है) तो यह कटौती शीघ्र ही बेअसर हो सकती है, कटौती की यह नीति सैद्धांतिक रूप से अनुपयुक्त है और मोदी सरकार द्वारा अपनाई जाने वाली सबसे विवेकपूर्ण नीतियों में से एक: पेट्रो-ईंधन की कीमतों का अविनियमन, से एक कदम पीछे हटने का इशारा करती है।

वाजपेयी सरकार ने वर्ष 2003-04 में ईंधन की कीमतों के पूर्ण अविनियमन की घोषणा की थी, लेकिन चुनाव से कुछ महीने पहले इस निर्णय को “अस्थायी रूप से” वापस ले लिया गया था। कोई भी समझ सकता है कि मोदी द्वारा अविनिमयन को वापस लेना भी अस्थाई है, लेकिन अक्टूबर 2018 से मई 2019 तक, जब चुनाव का मौसम समाप्त हो जाएगा, आठ महीनों के लिए इसे “अस्थाई” नहीं माना जा सकता है। अगर लोकसभा चुनावों में किसी लचर गठबंधन की सरकार बनती है तो यह समझना बहुत आसान है कि अगली सरकार दरें बढ़ाने या मूल्य अविनिमयन की वर्तमान स्थिति को सुधारने में हिचकिचाएगी।

मोदी सरकार की कठिन परिस्थितियों के साथ सहानुभूति व्यक्त की जा सकती है क्योंकि कीमतों में कटौती करने के लिए राजनीतिक दबाव बढ़ रहा था, विधानसभा चुनाव सर पर हैं और यह भी स्वीकार्य है कि कीमतों में कटौती करने की राजनीतिक आवश्यकता हो सकती है।

लेकिन राजनीतिक रूप से सुविधाजनक मूल्य कटौती करने के सही और गलत तरीके भी हैं। उत्पाद शुल्क में कटौती और कुछ समय के लिए राजस्व में गिरावट, शायद ठीक है, हालाँकि यह इस बात पर निर्भर करता है कि अगले कुछ महीनों में तेल की कीमतें कैसी रहती हैं। लेकिन तेल विपणन कंपनियों को लागत साझा करने के लिए मजबूर करना अनुचित है। यह न केवल उनके वित्तीय आंकड़ों में अनिश्चितता लाता है बल्कि अविनियमन के विचार से स्पष्ट इनकार भी करता है।

मोदी सरकार की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियों में से एक है वित्तीय स्पष्टता और तेल कंपनियों के वित्तीय स्वास्थ्य को कायम रखना। अब दोनों खतरे में हैं।

अविनियमन का मतलब है कि सरकार मूल्य निर्धारण में हस्तक्षेप नहीं करती है; यह करों या सब्सिडी जिसमें भी चाहे उठापटक कर सकती है, लेकिन मूल्य निर्धारण में नहीं, जो कि निर्माता का विशेषाधिकार बना रहना चाहिए। यही बात कुकिंग गैस और केरोसिन पर भी लागू होती है। कीमतों को लागत के साथ कम या ज्यादा किया जाना चाहिए और यदि सरकार चाहे तो उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए सब्सिडी को बढ़ा या घटा सकती है। यह उपयुक्त तो नहीं है लेकिन कम से कम यह बाजार गतिशीलता में हस्तक्षेप तो नहीं करता है।

काफी लंबे समय से, विशेष रूप से एनडीए सरकार के तहत, हम बाजारों को चलाने में अपना समय बर्बाद करते रहे हैं। यूपीए ने अपने विधायी और अन्य तरीकों से ईंधन, भोजन और भूमि बाजारों का सत्यानाश कर दिया था। मोदी सरकार ने एक चुनावी वर्ष में बाजार मूल्य निर्धारण के साथ छेड़छाड़ करके कुछ ऐसा ही प्रलोभन दिया है।

एनडीए के लिए यह भरोसा करना भी मूर्खतापूर्ण है कि 5 रुपये की कटौती नतीजे के दिन शर्मिंदगी से बचाएगी। मतदाता इतने बेवकूफ नहीं हैं जो यह न समझ पाएं कि चुनाव से पहले ईंधन करों में जो कटौती की गई है वह 11 दिसंबर को चुनाव के नतीजे सामने आने के चंद मिनटों बाद ही वापस ले ली जाएगी।

अपने कार्यकाल के आखिरी साल में यूपीए-2 खाद्य सुरक्षा एवं भूमि अधिग्रहण बिल लेकर आई और आंध्र प्रदेश को विभाजित कर दिया, इस उम्मीद में कि इससे उसको 2014 में सत्ता में रहने में मदद मिलेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इससे एनडीए को भी एहसास होगा कि आखिरी समय में दिए गए प्रलोभनों पर मतदाता हमेशा सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं देते हैं।

दरअसल, मतदाता शायद प्रलोभन से ज्यादा ईमानदारी को पसंद करते हैं। अगर कुछ कटौतियों की पेशकश करते हुए प्रधानमंत्री ने यह कह दिया होता कि वह ईंधन की उच्च कीमतों पर देशवासियों के दर्द को समझते हैं और करों में कटौती हमेशा के लिए जारी नहीं रह सकती है। ऐसा कहकर उन्हें बाद में होने वाली संभावित मूल्य वृद्धि के लिए मतदाताओं को तैयार कर देना चाहिए था।

नोटबंदी होने पर मतदाताओं ने मोदी का समर्थन किया था क्योंकि उन्होंने जनता के सामने यह बात रखी थी कि वह उचित और सही निर्णय लेंगे भले ही उन्हें राजनीतिक विरोध का सामना करना पड़े। उन्होंने यह दर्द सहन किया और उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड में बहुमत के साथ सत्ता भाजपा के हाथों में सौंप दी।

मोदी सरकार द्वारा जनता को लुभाने के लिए चुना गया यह रास्ता भाजपा के लिए 2019 की संभावनाओं के लिए अनुकूल नहीं होगा। तेल की कीमतों से अविनियमन हटाने से वाजपेई सरकार को स्वयं को बचाने में मदद नहीं मिली थी; यह 2019 में मोदी की संभावनाओं को बल देने या नवंबर और दिसंबर के आगामी विधानसभा चुनावों में कोई मदद नहीं करेगा।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।