राजनीति
राफेल सौदे को लेकर मोदी सरकार की सूचनाओं में अस्पष्टता, जिसकी वजह से चुकानी पड़ रही है कीमत
राफेल सौदा

प्रसंग
  • अभी भी एक अच्छा विकल्प यह होगा कि गोपनीयता की शपथ के साथ बड़े राजनीतिक दलों के नेताओं को बुलाया जाए और गोपनीय तरीके से राफेल सौदे के विवरणों को उनके सामने रखा जाए।
  • हो सकता है कि इससे काम न बने, लेकिन कम से कम यह तो साबित हो जायेगा कि सरकार के मन में कोई खोट नहीं है।

राफेल सौदे के बारे में कम से कम यह तो कहा ही जा सकता है कि राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार ने इस सौदे को लेकर सूचनाओं को स्पष्ट नहीं किया है। यहाँ तक कि यह भी मानते हुए कि इस सौदे में कोई मित्रवाद या धोखाधड़ी नहीं थी लेकिन ऐसा लगेगा कि सरकार कुछ छुपा रही है।

सर्वोच्च न्यायालय पहले से ही इस बात पर गौर करने की मांग कर रहा है कि सरकार ने उड़ान भरने के लिए एकदम तैयार हालत वाले 36 राफेल, एक मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए), विमानों को खरीदने का निर्णय “कैसे” लिया। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन 18 राफेल विमानों को उड़ने के लिए तैयार हालत में खरीदने और अन्य 108 विमानों को हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) में लाइसेंस के तहत बनाने के सौदे पर बातचीत कर रहा था। रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने इकोनॉमिक टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि अब 36 विमानों को खरीदा जायेगा और बाद में लाइसेंस के तहत अन्य विमानों का निर्माण किया जायेगा, जिसके लिए सरकार ने विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी प्रस्ताव मांगे हैं, लेकिन किन्तु-परन्तु के बिना सभी सवालों का जवाब देने की सरकार की जानी-समझी अनिच्छा के सन्दर्भ में यह असंतोषजनक है।

यह देखते हुए कि एनडीए का सौदा सरकार से सरकार के बीच में है, इसलिए इसमें बोफोर्स घोटाले की तरह पैसे खाने वाले किसी क्वात्रोची की सम्भावना भी नहीं है लेकिन सवाल यह है कि ऑफसेट पार्टनर (अनिल अम्बानी) को कैसे चुना गया था। पूर्व फ़्रांसिसी राष्ट्रपति फ्रैंकोइस होलैंड के कथनानुसार कि अम्बानी को उन पर थोपा गया था और अब फ़्रांसिसी मीडिया जो दावा कर रही है कि आंतरिक डसॉल्ट दस्तावेजों से पता चलता है कि सौदे को पाने के लिए ऑफसेट पार्टनर के रूप में अम्बानी को चुनना निर्णायक था, इन बातों को ध्यान में रखते हुए इस धारणा पर पुनर्विचार करना होगा कि सौदे में सब कुछ पाक-साफ है।

हालाँकि जाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट 36 राफेल विमानों की कीमत या तकनीकी निर्णय को लेकर सवाल नहीं पूछेगा लेकिन सरकार को सरकार से सरकार के बीच में हुए इस सौदे में हुई निर्णय की पूरी प्रक्रिया को एक सीलबंद लिफाफे में कोर्ट में पेश करना होगा। इसका मतलब है कि कहीं न कहीं सरकार को उन कारणों का खुलासा करना होगा जिनके करण यूपीए द्वारा लिए गए राफेल निर्णय और 2016 में फ़्रांस के साथ हुए अंतिम निर्णय में बदलाव आया। समस्या सुप्रीम कोर्ट या इसकी हस्तक्षेपी प्रवृत्ति नहीं है बल्कि सौदे के पक्ष में सरकार की तर्कसंगतता की कमी है। कीमत पर और एचएएल को साथ क्यों नहीं लिया गया, पर सवालों के जवाब सीधे-सीधे सरकार से नहीं मिले हैं बल्कि मीडिया के अलग-अलग लोगों के माध्यम से लीक हुए विवरणों और कहानियों से मिले हैं। यह एक स्पष्ट संकेत है कि सरकार एक औपचारिक बयान नहीं देना चाहती है, जिससे यह संदेह पैदा होता है कि इस सौदे में कुछ तो है जो राजनीतिक रूप से विवादास्पद है। आखिर यह है क्या?

इस सौदे में अनिल अम्बानी को शामिल करने पर यह समझाया जा सकता है कि सरकार नयी कंपनियों को रक्षा निर्माण में शामिल करना चाहती थी लेकिन यह तभी माना जाता जब सौदे के लिए अन्य पार्टियों पर भी विचार किया जाता और विभिन्न कारणों से उन्हें नामंज़ूर कर दिया जाता। सरकार को जवाब देने की जरूरत है कि अम्बानी का चयन क्यों हुआ और बेहतर योग्यताओं के साथ किसी और का क्यों नहीं।

होलैंड और फ़्रांसिसी मीडिया के बयानों को देखते हुए यह दावा कमजोर दिखाई देता है कि डसॉल्ट ने स्वयं अंबानी को चुना था। डसॉल्ट इस सौदे में दिलचस्पी लेने वाला भागीदार है और यह सरकार की इच्छाओं से विपरीत कोई राय दे इसकी सम्भावना बहुत कम है।

दूसरी तरफ, इसका मतलब यह नहीं है कि डसॉल्ट अम्बानी से नाखुश होगा, कि यह फिर भी ऑफसेट कंपनी डसॉल्ट रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड में 51 प्रतिशत नियंत्रण रखेगी और प्रद्योगिकी, उत्पादन और खरीद का अधिकार रखेगी। इस उद्यम में अम्बानी वरिष्ठ भागीदार नहीं बनेंगे। डसॉल्ट कंपनी के प्रभारी होने पर ऑफसेट कंपनी के विफल होने की सम्भावना नहीं है।

नरेंद्र मोदी सरकार एक अन्य कोण पर भी विचार करे कि: पश्चिमी सरकारें, सरकार से सरकार में या अन्य सौदों में अपने व्यवसायियों को शामिल करने में हिचकिचाती नहीं हैं, लेकिन हमारी सरकार व्यापार सौदों में भारतीय व्यवसायियों को लाने में अनिच्छुक दिखाई देती है। इसलिए, यदि राफेल ऑफसेट्स में अनिल अम्बानी का प्रवेश रक्षा उत्पाद में नयी कम्पनियों को लाने के लिए नरेंद्र मोदी का कदम था, तो सरकार को ऐसा बोलना चाहिए। लेकिन यह तभी बोलना पसंद करते हैं जब यह समझा सकते हैं कि उन्होंने टाटा या किसी अन्य व्यक्ति, जो पहले से ही रक्षा व्यवसाय में है, के बजाय अंबानी को कैसे चुना। यदि दूसरों को सौदे में दिलचस्पी नहीं थी तो यह अम्बानी को चुनने के सरकार के निर्णय को और भी विश्वसनीय बनाता। बेशक, जब तक कि सरकार अम्बानी के नाम को प्रकाश में कम लाना न चाहे, ताकि यूपीए की तरह मित्रवाद वाली छवि जैसा तमाशा न बने।

इसका निष्कर्ष सरल है: या तो सरकार स्पष्ट करे, या विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट इस पर कार्यवाही करें।

कुछ तो गड़बड़ है और यह बहुत तरस की बात है कि यदि राफेल राहुल गाँधी को नरेंद्र मोदी या उनके रक्षा मंत्री से ज्यादा विश्वसनीय बनाता है।

पूरे सौदे की जांच के लिए एक निष्पक्ष पूर्व न्यायाधीश को नियुक्त किया जाना एक अच्छा मार्ग होता लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के बाद यह विकल्प लगभग ख़त्म है।

अभी भी एक अच्छा विकल्प यह होगा कि गोपनीयता की शपथ के साथ बड़े राजनीतिक दलों के नेताओं को बुलाया जाए और गोपनीय तरीके से राफेल सौदे के विवरणों को उनके सामने रखा जाए।

हो सकता है कि इससे काम न बने, लेकिन कम से कम यह तो साबित हो जायेगा कि सरकार के मन में कोई खोट नहीं है।

जगन्नाथ स्वराज्य के सम्पादकीय निदेशक हैं। वह @TheJaggi पर ट्वीट करते हैं।