राजनीति
सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय दर्शाता है कि कैसे अनुच्छेद 30 का दुरुपयोग हो रहा है

2005 और 2006 में वाई एस राजशेखर रेड्डी के नेतृत्व में आंध्र प्रदेश सरकार ने राज्य के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में बीएड पाठ्यक्रमों के लिए केंद्रीय प्रवेश परीक्षा (सीईटी) में कुछ सुधार के लिए आदेश जारी किए। इसमें सहायता प्राप्त व गैर-सहायता अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए भी कुछ निर्देश थे।

जब कुछ अल्पसंख्यक संस्थानों ने इसे न्यायालय में चुनौती दी तो यह मिशनरी उत्साह रखने के लिए कुप्रसिद्ध रेड्डी के लिए भी आश्चर्यजनक था क्योंकि यह बदलाव अल्पसंख्यक संस्थानों को लाभ पहुँचाने वाले थे। सरकारी आदेशों का सार प्रस्तुत है-

  1. 2004 में राज्य सरकार ने अल्पसंख्यक समुदायों की 85 प्रतिशत सीटों तक अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने की अनुमति दी थी। 2005 के आदेश ने कहा कि 85 प्रतिशत आरक्षण के तहत प्रवेश लेने वालों को अल्पसंख्यक दर्जा सिद्ध करने के लिए उच्च शिक्षा या स्थानांतरण प्रमाण-पत्र देना होगा।
  2. सरकार ने अल्पसंख्यक संस्थानों में केंद्रीकृत काउंसलिंग को अनिवार्य कर दिया।
  3. जहाँ 85 प्रतिशत सीटों को भरने के लिए पर्याप्त अल्पसंख्यक आवेदक नहीं होंगे वहाँ सीईटी द्वारा गैर-अल्पसंख्यक आवेदकों को प्रवेश दिया जा सकेगा। इसका दायित्व सीईटी काउंसलिंग प्रक्रिया के प्रभारी का होगा।

अल्पसंख्यक संस्थानों ने इन आदेशों के विरुद्ध याचिका लिखी और आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय का द्वारा खटखटाया जहाँ एक जज की पीठ ने इन याचिकाओं को खारिज कर राज्य सरकार के पक्ष में निर्णय सुनाया।

अपील करने पर मामले की सुनवाई जी सिंघवी और जी सीतापति की पीठ ने की जिसका निर्णय भी राज्य सरकार के पक्ष में ही गया। फिर यह मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा जहाँ न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा और संजीव खन्ना ने 25 सितंबर को निर्णय सुनाते हुए सरकारी आदेशों को संवैधानिकता बरकरार रखी।

पहला, अल्पसंख्यक संस्थाओं ने तर्क दिया था कि अल्पसंख्यक दर्जे की पुष्टि करने के लिए कक्षा 12वीं के प्रमाण-पत्र की मांग करना संविधान के अनुच्छेद 25 के विरुद्ध है जो कि उन्हें अपने धर्म का पालन और प्रचार-प्रसार करने की अनुमति देता है।

सरकार ने तर्क दिया कि ऐसा नियम इसलिए लाया गया क्योंकि दूसरे समुदाय के लोग स्थानीय चर्चों से बाप्टिज़्म सर्टिफिकेट ले रहे थे और 85 प्रतिशत आरक्षण के तहत प्रवेश पाने के लिए उसका दुरुपयोग कर रहे थे।

दूसरा, अल्पसंख्यक संस्थानों ने तर्क दिया कि सीईटी प्रभारी द्वारा गैर-अल्पसंख्यकों को सीट आवंटित करना अनुच्छेद 30(1) के तहत अपने संस्थानों को संचालित करने के उनके अधिकार के विरुद्ध है।

अनुच्छेद 25 के लिए दिया गया तर्क जाली है। डाटा दर्शाते हैं कि अल्पलंख्यक आरक्षण के तहत प्रवेश लेने वाले अधिकांश लोग चर्चों से ही धर्मांतरण का प्रमाण-पत्र प्राप्त कर रहे थे। यह दबाव यह लोभ में लोगों का धर्मांतरण करना हुआ जो कि धार्मिक स्वतंत्रता के विरुद्ध है।

दूसरे समुदाय के लोगों के विरुद्ध अल्पसंख्यक संस्थानों का कड़ा रुख दर्शाता है कि वे अपने समुदाय में लोगों को जोड़ने के लिए तो आतुर हैं लेकिन अपने संस्थान को बेहतर तरीके से चलाकर अपने समुदाय की सेवा करने के लिए नहीं, जबकि अनुच्छेद 30 का यही उद्देश्य था।

जहाँ आंध्र प्रदेश सरकार प्रामाणिक छात्रों को प्रवेश देने के लिए यह नियम लाई होगी, वहीं ये संस्थान लोगों के धर्मांतरण में अधिक इच्छुक थे। उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय दोनों ने ही राज्य सरकार के पक्ष में निर्णय सुनाकर सही किया क्योंकि वे कम गलत विकल्प हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा-

निज़ामाबाद के शिक्षा महाविद्यालय में 200 में से 67 छात्रों, कुरनूल के रायलसीमा शिक्षा महाविद्यालय में 136 में से 90, भोंगीर शिक्षा महाविद्यालय में 102 में से 82, ज्योति शिक्षा महाविद्यालय में 85 में से 60, कम्मम के एनीबेसेंट शिक्षा महाविद्यालय में 102 में से 91, ट्रिनिटी शिक्षा महाविद्यालय में 102 में से 85 छात्रों का प्रवेश बाप्टिज़्म सर्टिफिकेट के आधार पर हुआ था।

इनमें से अधिकांश मामलों में प्रवेश परीक्षा का आवेदन देने की तिथि के बाद अभ्यर्थियों ने स्वयं को ईसाई घोषित करने वाला सर्टिफिकेट बनवाया था।

निर्णय में आगे कहा गया कि राज्य सरकार का आदेश ‘वास्तविक अल्पसंख्यक विद्यार्थियों के हितों की रक्षा करने के लिए है ताकि उनकी सीट प्रवेश के लिए रातों-रात धर्मांतरित होने वालों को न मिले। इससे संस्थान का अल्पसंख्यक चरित्र बना रहेगा और किसी और की घुसपैठ नहीं होगी।’

गैर-अल्पसंख्यक छात्रों को प्रवेश देने का दायित्व सीईटी प्रभारी को देने के विरोध में अल्पसंख्यक संस्थानों के तर्क पर सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, ‘अल्पसंख्यकों के लिए महाविद्यालयों और सीटों की संख्या 2001 जनगणना के अनुसार उनकी जनसंख्या के अनुपात में अधिक है।’

इसलिए हर वर्ष अल्पसंख्यक संस्थानों में सीट खाली रह जाती है जो कि शैक्षणिक संस्थान के हित में नहीं है और प्रभारी का दायित्व सिर्फ यह देखने का था कि यह प्रक्रिया सही और पारदर्शी हो। पहले तर्क में वास्तविक अल्पसंख्यक छात्रों के हित को ध्यान में रखा गया और दूसरे तर्क से अल्पसंख्यक संस्थानों के हित हेतु न्यायालय ने चिंता प्रकट की।

इसकी उलझनें क्या हैं? क्या इसका अर्थ यह हुआ कि राज्य अल्पसंख्यक संस्थानों का विनियमन कर सकता है यदि यह अल्पसंख्यक छात्रों और संस्थान के हित में हो तो? किसी प्रत्यक्ष प्रमाण के अभाव में इस विषय पर तर्क-वितर्क करने के लिए बहुत कुछ है।

जब कर्नाटक सरकार ने अल्पसंख्यक संस्थानों में 75 प्रतिशत आरक्षण को अनिवार्य किया जिसका तब राज्य उच्च न्यायालय ने इस आदेश को स्थगित कर दिया। पिछले वर्ष अप्रैल में तमिल नाडु सरकार ने अल्पसंख्यक संस्थानों में न्यूनतम 50 प्रतिशत अल्पसंख्यक आरक्षण की बात की तो एक ईसाई अल्पसंख्यक संस्थान द्वारा द्वार खटखटाने पर मद्रास उच्च न्यायालय ने उसे खारिज कर दिया।

न्यायालय ने कहा कि ‘न्यूनतम 50 प्रतिशत अल्पसंख्यक आरक्षण पूरे राज्य में लागू नहीं किया जा सकता है क्योंकि ईसाई जनसंख्या राज्य की मात्र 6.1 प्रतिशत है’। मूल रूप से सरकार उच्च सीमा तय कर सकती है जैसा आंध्र प्रदेश में 85 प्रतिशत आरक्षण की तय की गई (लेकिन निचली सीमा नहीं) और अल्पसंख्यक छात्रों की कमी के बावजूद आप गैर-अल्पसंख्यक छात्रों को प्रवेश नहीं दे सकते।

वे 0 से 85 प्रतिशत तक अपनी सुविधानुसार सीट भर सकते हैं। हालाँकि जब सरकार अल्पसंख्यक संस्थानों में अल्पसंख्यक छात्रों के लिए न्यूनतम आरक्षण की बात करती है (कर्नाटक में 75 प्रतिशत और तमिल नाडु में 50 प्रतिशत) तो इसकी अनुमति नहीं है।

अंतिम बात यह है कि सरकार अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए नियम ला सकती है लेकिन न्यायालय उन्हें स्थगित कर देगा जबकि वे अल्पसंख्यक छात्रों को लाभ पहुँचाती हैं तथा संस्थानिक अधिकार के लिए तनिक भी खतरा नहीं है।

इसलिए न्यायप्रणाली से समानता की अपेक्षा करना व्यर्थ है। न्यायालय अनुच्छेद 30 को लेकर अपनी समझ में इतना आगे बढ़ गए हैं कि अब इसके मूल को पहचानना कठिन है।

अब इसके अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है कि केंद्र आगे बढ़कर इसमें संशोधन करे। यह अनुच्छेद भेदभावपूर्ण है और समाज के कुछ वर्गों के प्रति पक्षपातपूर्ण होने के नाते सांप्रदायिक भी। कोई (बेहतर) विकल्प नहीं है।

अरिहंत स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं।