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मध्यवर्ग को झटका: आई.टी., फ़ाइनैंस और टेलीकाॅम से ख़त्म होती जाॅब्स
Working Indians

हिंदुस्तान के सबसे ज़्यादा नौकरियां पैदा करने वाले सेक्टर – साॅफ़्टवेयर सेवाओं से नौकरियों के अचानक ग़ायब होने की तुलना बेआवाज़ दुर्घटना से ही की जा सकती है। चाहे इंफ़ोसिस हो, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ हों, काॅग्निजेंट, टेक महिंद्रा या कैपजेमिनी, उत्तरी अमेरिका में माँग में आई कमी, निम्न-कुशलता वाली नौकरियों में आॅटोमेशन की बढ़ोतरी, और ज़्यादा से ज़्यादा स्थानीय भर्तियों का दबाव की वजह से पिंक स्लिप्स थमाई जा रही हैं, और भविष्य में नौकरियाँ देने की सारी योजनाओं को जड़ से ख़त्म किया जा रहा है।

बीती दस मई को टेक महिंद्रा ने सम्भावना जताई कि कम्पनी 1500 कर्मचारियों की छुट्टी कर सकती है। कुछ ही समय पहले, काॅग्निजेंट टेक्नाॅलजीज़ अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन न होने के कारण 6000 कर्मचारियों को अलविदा कहने की योजना बना रही थी। इंफ़ोसिस प्राॅजेक्ट मैनेजर और आर्किटेक्ट के स्तर की 1000 नौकरियों में कटौती कर रहा है। विप्रो 300-400 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा चुकी है और सम्भव है कि व्यापार में बढ़त न होने की स्थिति में और लोगों को भी जाना पड़े। ख़बर है कि कैपजेमिनी भी 9000 तक लोगों को नौकरी से निकाल सकती है, हालाँकि कम्पनी इतनी बड़ी संख्या को नकार रही है।

नई नौकरियाँ देने की स्थिति में पूर्व के मुक़ाबले 40 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है, क्योंकि साॅफ़्टवेयर कम्पनीज़ अपने ख़ाली बैठे कर्मचारियों से ज़्यादा से ज़्यादा काम निकालने की कोशिश में हैं।

ग़लती कहाँ हुई ? मुख्यतः तीन बिंदुओं पर ..

पहला यह है कि हाल के समय में सीधी सादी साॅफ़्टवेयर समस्याओं के मुक़ाबले एस.एम.ए.सी यानी सोशल मीडिया, मोबाइल टेक्नाॅलजी, आर्टिफ़िशल इंटेलिजेंस और क्लाउड कम्प्यूटिंग से जुड़ी समस्याओं को दुरुस्त करने और उनसे जुड़ी सेवाओं की माँग ज़्यादा बढ़ी है। जबकि भारतीय साॅफ़्टवेयर सर्विसेज़ सस्ते एंजीनियरिंग कौशल पर अपनी निर्भरता के कारण भारत से सस्ता श्रम लेकर बाहर महँगा बेचने की अपनी पुरानी रणनीति मात्र से नई नौकरियाँ देने में असमर्थ हैं। इन्हें कौशल के क्षेत्र में कहीं ऊँचे स्तर पर जाना होगा क्योंकि निम्न-कुशलता वाले काम अब आॅटोमेशन से किये जाने लगे हैं। भारत के प्रभाव वाले पुराने क्षेत्रों से निकलकर सक्षम कर्मचारियों की माँग अब एस.एम.ए.सी. के क्षेत्र में आ चुकी है। इसका अर्थ यह हुआ कि अब न केवल आई.टी. क्षेत्र में कम भर्तियाँ होंगी बल्कि इन कम भर्तियों में भी कम्पनियों का झुकाव एस.एम.ए.सी. के क्षेत्र में उच्च कौशल वाले कर्मचारियों की भर्ती पर ही होगा।

दूसरा, साॅफ़्टवेयर सेवाओं के क्षेत्र में सीनियर और जूनियर मेम्बर्स के मध्य क्षेत्र में इस समय एक उभाड़  है। जिन लोगों को दस पंद्रह साल पहले कोडिंग के कारण जाॅब मिली आज वह इन कम्पनीज़ में मिडिल मैनिजमंट सम्हाल रहे हैं। लेकिन आई.टी. कम्पनीज़ की लागत रणनीति के कारण उन्हें कम महत्त्वपूर्ण स्किल वाले अच्छे वेतन पर कार्यरत वरिष्ठ कर्मचारियों की जगह सस्ते में उपलब्ध नये कर्मचारियों को रखने का काम सौंपा गया है।  यह एक ऐसी जगह है जहाँ पर ज़्यादातर नौकरियाँ ख़त्म हो रही हैं।

तीसरा, भारत की सबसे बड़ी जाॅब मार्केट, उत्तरी अमेरिका अब अपने हितों को लेकर सुरक्षावादी दृष्टिकोण अपना रही है। साथ ही एच 1 बी वीज़ा आगे से न केवल मँहगे होंगे बल्कि इनमें न्यूनतम मज़दूरी की शर्तों की वजह से भारतीय एंजीनियर्स का सस्ते श्रम को महंगा बेचने का लाभ ख़त्म हो जायेगा। इस वजह से अमेरिका में भर्ती भी उतनी ही प्रतियोगी हो जायेगी जितनी कि भारतीय एंजीनियरिंग काॅलेजों में की जाने वाली भर्तियाँ। इंफ़ोसिस ट्रम्प के सुरक्षावादी दृष्टिकोण को पूरित करने के लिए अगले दो वर्षों में अमेरिका में लगभग दो हज़ार भर्तियाँ करने की घोषणा की है।

बैंकिंग में भी तकनीक़ की वजह से परिवर्तन आया है। स्मार्टफ़ोन और ई-बैंकिंग के आने के साथ ही अब बैंकों को पहले की तरह न तो बैंक शाख़ाओं की ज़रूरत रहेगी न ही इतने सारे ए.टी.एम. और क्रेडिट कार्ड्स की। उदहारण के तौर पर, कोटक महिंद्रा ने एक ऐप 811 लाॅन्च किया है, अपने आधार और पैन की मदद से आप पाँच मिनट में अपना अकाउंट खोल सकते हैं। इस ऐप में आपका डेबिट कार्ड भी रहता है और आप इसकी मदद से किसी को भी ई-पेमेंट कर सकते हैं।

टेलीकाॅम के क्षेत्र में पूरी तरह से इंटरनेट प्रोटोकाॅल आधारित कम्पनी रिलायंस जिओ के प्रवेश के साथ ही वाॅइस काॅल्स मुफ़्त हो गयी हैं, तो वहीं डेटा चार्जेज़ में लगातार कमी आ रही है। इस सबसे इंडस्ट्री की और कम्पनीज़ दृढ़ीकरण के लिए मजबूर हुई हैं, जहाँ एअरटेल ने टेलीनाॅर को ख़रीद लिया तो रिलायंस कम्यूनिकेशंस का सिस्टीमा और एअरसेल में विलीनीकरण हो गया। कम्पनियों के इस प्रकार के विलीनीकरण का मतलब हमेशा ही सर्विसेज़ का बँटवारा और विलीन कम्पनीज़ में नौकरियों की कटौती ही होता है।

लेकिन व्हाइट काॅलर जाॅब्स के लिए सबसे बड़ा ख़तरा है, आॅटोमेशन। रोबोट्स फ़ैक्ट्रीज़ तो चला ही रहे हैं, साथ ही सर्विसेज़ जैसे सामान्य काम भी रोबोट्स ने सम्हाल लिये हैं।

मिंट की रिपोर्ट के अनुसार इंटरनेशनल लेबर आॅर्गनाइज़ेशन का अध्ययन है कि एशिया में अगले 20 सालों में तेरह करोड़ सत्तर लाख नौकरियाँ रोबोट्स की वजह से ख़त्म होंगी, वहीं अमेरिका में 2020 तक आॅटोमेशन की वजह से 5 करोड़ नौकरियों के जाने की सम्भावना है। इस समय का एक संकेत यह भी है कि अडीडास ने अपनी एक कम्पनी अटलांटा, अमेरिका में बनाने का फ़ैसला किया है। जूतों के निर्माण की कम्पनियाँ तो अमेरिका और जर्मनी को उच्च लागत के कारण दशकों पहले छोड़ चुकी हैं, लेकिन अब स्टैण्डर्ड साइज़्ड शूज़ बनाने में माहिर रोबोट्स के आने के बाद, अडीडास जर्मनी और अमेरिका में रोबोट-ड्रिवेन फ़ैक्ट्रीज़ बना रही है।दूसरी तरह से देखें, तो मैनुफ़ैक्चरिंग ने विकसित देशों में वापसी की ज़रूर है, लेकिन इस बार इससे पहले की अपेक्षा और भी कम नौकरियों के सृजन की आशंका है।

दुनिया भर में पूँजी के क्षेत्र में भारी बचत से इस चलन को और भी ज़्यादा बढ़ावा मिल रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी कार्पोरेशन्स ने 2.6 खरब डाॅलर की करमुक्त रकम आॅफ़शोर ख़ातों में बचाई। गूगल और एपल जैसी कम्पनीज़ के नकद रकम के अपने ख़ज़ाने का इस्तेमाल अग्रणी तकनीक़ की मदद से बनने वाली ड्रायवरलेस कार्स और अन्य तरह के आॅटोमेशन को बनाने में कर रही हैं, जिससे आगे और नौकरियाँ कम होंगी।

कहने का अर्थ यह नहीं कि नौकरियाँ नहीं होंगी। बल्कि नौकरियाँ सिर्फ़ निम्न स्तर की हांेगी, सेल्स, सर्विसिंग और कस्टमर ट्रैकिंग के क्षेत्रों में। इस बीच, निर्माण और सर्विसेज़ कम्पनियाँ  काॅन्ट्रैक्ट पर लोगों को भर्ती कर रही हैं-ऐसी नौकरियों के लिए जिनमें न तो कोई सुरक्षा है न किसी प्रकार के कोई दीर्घकालिक लाभ।
हमारा सामना जिस मुसीबत से हो रहा है वह केवल नौकरियों में कमी की समस्या नहीं है, बल्कि समस्या यह है कि ऐसी नौकरियाँ ही ख़त्म हो रही हैं, जिस तरह की नौकरी आप अपने लिये चाहते हैं।

ऐसी स्थिति में नौकरी की गुणवत्ता को सबसे ज़्यादा नुक़सान पहुँचेगा। नई नौकरियों के बाज़़ार में उच्चतम कुशलता वाले कुछ लोग तो सर से लेकर पाँव तक पैसे में डूबे होंगे, जबकि एक बड़ी संख्या में लोगों को अनिश्चित और निकृष्ट गुणवत्ता वाली नौकरियों में ही गुज़ारा करना होगा।

नौकरियों का यह संकट दिखने में कुछ ऐसा होगा।