राजनीति
2019 चुनाव: सपा-बसपा गठबंधन में मायावती का वर्चस्व, अखिलेश को हो सकती है हानि

आशुचित्र-

  • सपा-बसपा के गठबंधन पर गौर करने से पता चलता है कि सबकुछ ठीक नहीं है।
  • जहाँ अखिलेश यादव को 2019 में मायावती की आवश्यकता है, वहीं मायावती को आने वाले कई सालों में उनकी आवश्यकता है।

समाजवादी पार्टी (सपा) के संस्थापक मुलायम सिंह आजकल पार्टी के प्रतिकूल बयान देते नज़र आ रहे हैं। लोकसभा में उन्होंने कहा था कि वे नरेंद्र मोदी को पुनः प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। जहाँ पिछले सप्ताह मायावती-अखिलेश ने 38:37:3 के अनुपात में सीट विभाजन की घोषणा की, वहीं मुलायम कहते नज़र आए कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) आगे है।

कोई मुलायम सिंह के अवलोकन को यह कहकर नकार सकता है कि राजनीति में खुद को सक्रिय रखने के लिए वे इस प्रकार की बयानबाज़ी कर रहे हैं। लेकिन एक चतुर पुराना खिलाड़ी मात्र अपने बेटे और सपा प्रमुख से द्वेष उत्पन्न करने के लिए ऐसा नहीं कहेगा। कम से कम उन्हें किसी बात का भय तो है ही जिसके कारण वे खुलकर कुछ नहीं कह रहे हैं। सपा-बसपा के गठबंधन पर गौर करने से हमें कुछ संकेत मिलते हैं।

पहला, यह गठबंधन समान सेतर पर नहीं है, भले ही मायावती 38 और अखिलेश 37 सीट पर लड़ रहे हों। एक सीट का अंतर ही दर्शाता है कि कौन श्रेष्ठतर है, भले ही कम अंतर से।

दूसरा, यह भी स्पष्ट है कि मायावती नेतृत्व कर रही हैं। कांग्रेस को अलग रखने का निर्णय मायावती की सोच से ही उपजा, न कि अखिलेश यादव की। एक ऐसे व्यक्ति के लिए कांग्रेस को छोड़ना कठिन है जिसने 2017 में विधान सभा चुनाव में राहुल गांधी से अच्छी साठ-गाँठ की थी। मायवती की प्रथमिकताएँ स्पष्ट हैं- उनकी पूर्वोन्नति और दलित मत जो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को उभरने से बाधित करेंगे। यह तब तक नहीं हो सकता जब तक कांग्रेस को राज्य में छोटा न किया जाए। अखिलेश यादव को कांग्रेस को छोटा करने की कोई आवश्यकता नहीं है लेकिन वे मायावती की मांग के आगे विवश हैं क्योंकि 2019 में उन्हें मायावती की आवश्यकता है। एक बुरे सौदे से वे श्रेष्ठ प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं।

तीसरा, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश में सीटों पर सपा-बसपा का गठबंधन दर्शाता है कि मायावती ही नीति निर्धारक हैं। दोनों राज्यों में बसपा की थोड़ी साख है लेकिन सपा मात्र एक खिलाड़ी है। यदि सपा और बसपा कुछ मत जीतने में सफल होते हैं तो इसकी कीमत कांग्रेस के मतों में कटौती होगी। यह फिर से अखिलेश से अधिक मायावती के लिए बेहतर होगा।

चौथा, मई 2019 के बाद और मार्च 2022 (उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव) के नज़ारे को देखें। यदि भाजपा किसी तरह से लोकसभा में चूक जाती है तो प्रधानमंत्री बनने के लिए मायावती अखिलेश के सहयोग की मांग करेंगी और वे अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा कहकर वे ऐसा करने के लिए विवश हैं। उन्हेंने कहा ता कि यदि अगला प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश से बनेगा तो उन्हें प्रसन्नता होगी। हालाँकि इस सतरंगी गठबंधन में कुछ अन्य क्षेत्रीय पार्टियाँ भी इसके लिए सहमत हो सकती हैं। न कांग्रेस और न भाजपा इसके लिए तैयार होंगे क्योंकि वे जानते हैं कि मायावती से निपटना कठिन है। एक बार प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें हटाना मुश्किल होगा क्योंकि इसे दलित-विरोधी कदम की तरह देखा जाएगा। एक गठबंधन सरकार में कमज़ोर नेताओं को ही उच्च पद मिलता है (1996 में देवेगौड़ा और 1997 में आईके गुजराल)। इसलिए यदि किसी दलित को ही प्रधानमंत्री बनाना हो, तब भी कांग्रेस मायावती की जगह किसी और को चुनेगी, विशेषकर उनके द्वारा कांग्रेस से किए गए दुर्वयवहार के बाद।

पाँचवा, इसकी बहुत ही कम संभावना है कि 2022 में मायावती मुख्यमंत्री पद के लिए अखिलेश यादव का समर्थन करेंगी, विशेषकर तब जब वे प्रधानमंत्री नहीं होंगी। दोनों पार्टियों का यह सौदा तब ही आगे बढ़ेगा जब एक प्रधानमंत्री हो और दूसरा मुख्यमंत्री। यदि दिल्ली की कुर्सी मायावती को नहीं मिलती तो वे किसी भी सूरत में सपा की श्रेष्टता नहीं स्वीकारेंगी, विशेषकर दलित-यादव मतभेदों के मद्देनज़र। इसलिए जहाँ अखिलेश यादव को 2019 में मायावती की आवश्यकता है, वहीं मायावती को आने वाले कई सालों में उनकी आवश्यकता है।

छठा, वर्तमान में सपा-बसपा गठबंधन कारगर है क्योंकि जाति गणित साथ देता है (दलित और यादव मतों का योग) और 17 प्रतिशत मुस्लिम मत जो भाजपा को हराने के लिए कहीं और नहीं जाएगा। लेकिन यहाँ एक बिंदू है- अभी तक मुस्लिम मत सपा के साथ जुड़े हैं, न कि मायावती के। यदि सपा-बसपा का गठबंधन सफल होता है तो मुस्लिम मत सपा से बसपा की ओर चले जाएँगे, क्योंकि इसके साथ ही देश के कई भागगों में दलित-मुस्लिम गठबंधन की बात चल रही है। यदि यह मत स्थानांतरण हो गया तो इसका नुकसान 2022 में सपा को भुगतना होगा। मुस्लिम मत के लिए मुलायम सिंह को वैसा ही लग रहा होगा जैसा भाजपा को गैर-जाटव दलित मत मिलने पर बसपा को लगा होगा। मुलायम सिंह जानते हैं कि यदि समर्थन करने के लिए मुस्लिमों को कोई और पार्टी मिल गई तो सपा का अवरोहण होगा। वे बसपा के साथ मुस्लिम मतों का सीमित संबंधन ही चाहते हैं, जिस तरह बसपा नहीं चाहती की कांग्रेस या भाजपा दलित मतों के दावेदार बनें।

सातवाँ, यदि सपा को अपना मुस्लिम वोट बैंक बनाए रखना है तो बेहतर होगा कि 2019 के आगे वह इस गठबंधन के साथ न चले। यदि मुस्लिम और दलित मतों का एकत्रीकरण हो गया तो सबसे अधिक हानी सपा को ही पहुँचेगी। दीर्घावधि भविष्य के परिप्रेक्ष्य में सपा के लिए दो संभावनाएँ हैं- पहला मुस्लिम-यादव सहयोग को बनाए रखते हुए छोटी जातियों के माध्यम से सत्ता हासिल करना और दूसरा हिंदू पिछड़े वर्ग मतों का उच्च जातियों से एकत्रीकरण रोकना। वर्तमान में यादव के किसी कॉम्बो के विरुद्ध गैर-यादव पिठड़ा वर्ग मतों का एकत्रीकरण रोक रहे हैं। अपना हिंदू वोट बैंक बनाने के लिए यादवों और अन्य पिछड़ा वर्गों के बीच मतभेद का लाभ उठाने का प्रयास भाजपा करेगी (2014 में यह इसमें असफल हुई थी), जो कि उच्च जातियों के सहयोग के साथ अजेय हो जाएगा। मथुरा और काशी में भाजपा योदव मतों को विभाजित कर सकती है- मथुरा के कृष्ण मंदिर को मुस्लिम सम्राटों ने उजाड़ा था।

संभवतः मुलायम सिंह आगामी लोकसभा चुनावों से आगे के गणित को देख रहे हैं और अपनी चिंता व्यक्त कर रहे हैं। अपने पूत्र को उनका गुप्त संदेश यह है कि- यदि राजनीति में बने रहना है तो मायावती को अधिक फल मत दो।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।