राजनीति
मतुआ समुदाय के लिए 70 वर्ष पुराने भूले-बिसरे अध्यायों की पुनरावृत्ति हो रही बंगाल में

हम भारत की राजनीति में तो बहुत रुचि लेते हैं लेकिन यहाँ कि सामाजिक जटिलताओं की अनदेखी करते हैं। परिणाम– हम सत्य की तह तक नहीं पहुँच पाते। जब आप एक लोकहितकारी सरकार की कल्पना करते हैं तब आप यह भूल जाते हैं कि यहाँ का सामाजिक ढाँचा लोकतंत्र के सभी अवयवों पर बहुत भारी पड़ता है।

आपको लगता है कि सुशासन अकेला ही सबसे निपटने में समर्थ है?
नहीं। यह एक आदर्श बुद्धिविलासी दृष्टिकोण भर है।

आप सहमत नहीं हैं?
होना भी नहीं चाहिए!

हम विगत 70 वर्षों में यही सोचने के लिए अभ्यस्त किए गए हैं कि यहाँ की मौलिकता, यहाँ का सामाजिक ढाँचा, यहाँ का ज्ञान और संस्कृति अनावश्यक है। हमारे लिए आयातित संस्कृतियों की सामाजिक स्वीकृति ही एक मात्र प्राथमिकता बना दी गई थी।

उससे भी अधिक हमें यह भी समझाया गया है कि शक्तिशाली समूहों द्वारा अभिकल्पित आदर्शों पर चलने वाले ही विकासोन्मुखी, बुद्धिजीवी होते हैं और बाकी सब अधोगामी। परिणाम स्वरूप भारत के अधिकांश राजनीतिक दलों ने एक दो शक्तिशाली सांप्रदायिक समूहों पर अपनी समस्त ऊर्जा लुटा दी और भारत के पारंपरिक सामाजिक ढाँचे की भरपूर अनदेखी की।

आइए। सत्य को दूसरे कोण से भी देखने का श्रम करें।

भारत की राजनीति को यहाँ की जटिल सामाजिक बनावट से हटकर समझने की चेष्टा कीजिए! आपको कोरा कागज़ ही मिलेगा।

अकेले सुशासन के आदर्शों पर तौल कर देखिए। क्या मिलेगा? एक असफल राजा और असंतुष्ट प्रजा! भारत के किसी भी क्षेत्र या प्रांत की सामाजिक बनावट की जटिलता उस क्षेत्र की राजनीतिक जटिलता के समानुपाती होती है।

चलिए। भारत में राजनीतिक रूप से अति सक्रिय एक राज्य को देखते हैं। स्वतंत्रता पूर्व और पश्चात का बंगाल। यानी विभाजन पूर्व और पश्चात का बंगाल।

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि स्थानीय सामाजिक परिस्थितियों के कारण यह राज्य राजनीतिक शास्त्र के अध्ययन के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

वैसे मैं यह भी कह सकता हूँ कि आज़ादी से पहले के इस अविभाजित क्षेत्र में स्थित एक जिले ने भारत के राजनीतिक और भौगोलिक मानचित्र पर सबसे गहरी छाप छोड़ी है। और कारण रहे, विशुद्ध सामाजिक।

यह जिला है बारिसाल जिला। पूर्व का वेनिस। यह अब बांग्लादेश में है। यहीं जन्म हुआ था भारत विभाजन के महानायक जोगेंद्र नाथ मंडल का। विशेष तौर पर पूर्वी पाकिस्तान के जन्म की कुंडली इन्होंने ही लिखी, मुस्लिम लीग के सहयोग से। नामाशूद्र परिवार में जन्म हुआ था इनका।

मुझे नहीं पता कि राजनीति के विशेषज्ञों, विश्लेषकों, विचारकों और विद्यार्थियों ने मंडल के संबंध में कितना अध्ययन किया है लेकिन जो सबसे महत्त्वपूर्ण बात है, वह यह है कि यह उनके तत्कालीन कदमों का ही परिणाम है कि आज भी सिर्फ बंगाल ही नहीं, समस्त भारत की राजनीति प्रत्यक्ष, परोक्ष रूप से इनसे प्रभावित है।

इसके लिए आपको ‘थ्योरी ऑफ़ इवॉल्यूशन’ का स्मरण करना होगा। ‘बटरफ्लाई इफेक्ट’ समझना आवश्यक होगा। खैर, यह सब छोड़िए।

अभी बंगाल में 2.5 करोड़ आबादी वाले मतुआ समुदाय की चर्चा करते हैं। इन दिनों इनकी चर्चा इसलिए चल रही है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा की 294 सीटों में से 70 सीटों पर इस समुदाय का सीधा प्रभाव है।

इस समुदाय के दम पर ही मंडल भारत के 70 लाख हिंदुओं के साथ पाकिस्तान में जा बसे थे और वहाँ के पहले विधि और श्रम मंत्री बने थे। चर्चा यह भी होनी चाहिए कि आज़ादी मिलते ही इस समुदाय पर पाकिस्तान में बर्बरता की हदें पार की गईं और ये लोग निर्दयता से कुचले गए।

जिन्ना-मंडल की यह दुर्भीसंधी बुरी तरह असफल हुई थी। इसकी नींव में था दो समुदायों का सांस्कृतिक विभेद। इसकी जड़ में था दो समुदायों का पृथक सामाजिक लक्ष्य।

एक तरफ थी सामाजिक सुरक्षा, सरकारी संरक्षण और विकास की आकांक्षा। दूसरी ओर थी सदियों पुरानी वही एक सांप्रदायिक बीमारी यानी– “द मास्टर रेस सिंड्रॉम” अर्थात् आधिपत्य स्थापित करने की आकांक्षी।

खुद मंडल, दो साल बाद ही बचे-खुचे हिंदू नामाशूद्रों अर्थात मतुआ समुदाय के लोगों के साथ जान बचाकर भारत लौट आए थे। जो बचे वे नर्क की यातनाएँ भुगतते रहे।

ये मतुआ समुदाय सन् 1860 में संगठित हुआ, वर्ण व्यवस्था के विरुद्ध। हरिचंद ठाकुर नाम था मतुआ समुदाय के युग प्रवर्तक का जिनके बारे में यह मान्यता है कि वे भगवान विष्णु अथवा भगवान कृष्ण के अवतार थे। वे झारखंड वाले बिरसा मुंडा की तरह भगवान की तरह पूज्य हैं।

आज़ादी से पूर्व भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में भारत के सांप्रदायिक विभाजन की प्रयोगशाला बनाई गई थी। अंग्रेज़ी हुकूमत ने सामाजिक असमानता को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। अंग्रेज़ों ने भारत के सामाजिक विभाजन के अनगिनत प्रयोग किए थे।

अत्यधिक विनम्र, सहिष्णु और धर्मपरायण नामाशूद्र अथवा मतुआ समुदाय के लोग श्रमसाध्य कार्य कर जीवन यापन करते थे। वे 1940 के दशक में मुस्लिम लीग के धर्मपरिवर्तन अभियान के सबसे आसान शिकार थे।

यद्यपि हरिचंद ठाकुर की पौत्र वधु बीनापाणि देवी या बड़ी माँ ने 19वीं सदी के शुरुआती दौर में मतुआ समुदाय को पुनः संगठित करने हेतु बहुत उल्लेखनीय कार्य किए, बहुत संघर्ष किए।

जिन्ना ने अगस्त 1946 में डाइरेक्ट ऐक्शन की घोषणा की जिसका सबसे अधिक नुकसान इस समुदाय को ही उठाना पड़ा था। बहुत दरिंदगी हुई थी इनके साथ जो एक बहुत दर्दनाक अध्याय है। इन दुष्कर्मों की विस्तृत जानकारी श्री जोगेंद्र नाथ मंडल ने स्वयं अपने हाथों से लिख कर दी है। (विस्तार से जानने के लघु पुस्तिका द बरीड चैप्टर्स 1 का अवलोकन कीजिए।

“…जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है…।” ना जाने किन परछाइयों का पीछा करते हुए जोगेंद्र नाथ मंडल सरीखे लोकप्रिय, प्रभावशाली नेता मुस्लिम लीग के चंगुल में फँस गए थे।

ना जाने उन दिनों इंग्लैंड में पढ़ाई करने वालों को कौनसी जड़ी बूटी दी जाती थी। अच्छे भले गए थे मुहम्मद इकबाल (अल्लामा इक़बाल)। “सारे जहां से अच्छा, हिंदुस्तान हमारा” गाते हुए गए थे। जब लौटे तो गाने लगे “…पाकिस्तान हमारा”! इन्होंने ही प्रेरित किया जिन्ना को, सांप्रदायिक विभाजन के लिए।

1946 के डाइरेक्ट ऐक्शन में उसके पश्चात विभाजन के समय ढाका, गोपालगंज, सियालहट, बरिसल, हबीबगढ, नाचौले, खुलना, मालाहाट, कलशीरा, चित्तागौंग, नौआखली आदि स्थानों पर विशेष तौर पर नामाशूद्रों के साथ पाशविकता हुई। सहस्रों हत्याएँ और बलात्कर, जघन्य कृत्य हुए।

इसके उपरांत भी मंडल जिन्ना पर मंत्र-मुग्ध रहे। वे नामाशूद्रों को बहुत बड़ी संख्या में पाकिस्तान के पक्ष में बनाए रखने में सफल रहे। लेकिन अपने उसी समुदाय की सुरक्षा करने में बुरी तरह असफल रहे जिसके समर्थन से पूर्वी पाकिस्तान का गठन किया गया था। दो वर्ष बाद ही भारत वापस आ गए, जान बचाकर।

1969-70 में मतुआ समुदाय के साथ, पूर्वी पाकिस्तान में (अब बांग्लादेश) जनरल टिक्का खां की फौजों ने पशुओं से भी बुरा व्यवहार किया। सिर्फ मतुआ ही नहीं, बाकी सभी हिंदू और बांग्लाभाषी मुस्लिम भी जो बहुत कम पीढ़ियों पहले ही धर्मांतरित हुए थे, पाकिस्तान के दानवी आतंक का शिकार हुए।

1971 से पहले और बाद में लाखों नामाशूद्र (मतुआ) भारत आ चुके थे। इनमें से कुछ को तो भारत की नागरिकता मिल गई थी लेकिन इनकी बहुत बड़ी संख्या पश्चिम बंगाल में दशकों से नागरिकता की बाट जोह रही है। बस। यही है वह सामाजिक सत्य, जिस सत्य से खोखले राजनीतिक आदर्श परास्त होते हैं।

सत्य यह कि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को 2011 में सत्ता में लाने के लिए इस समुदाय ने बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। सत्य यह भी कि नामाशूद्र समुदाय के साथ फिर से वही प्रयोग दोहराने की असफल कोशिश बनर्जी ने की जो जिन्ना कर चुके थे। यानी “दलित मुस्लिम भाई भाई”।

वे एक बार फिर से गिनी पिग बनने को तैयार नहीं थे किंतु सत्ता मद में आकंठ आप्लावित बनर्जी भूल गई थी कि यह समूह भी एक भरोसेमंद विकल्प की तलाश में था। सत्य यह कि मतुआ समुदाय के दम पर प्रचंड बहुमत लेने वाली टीएमसी ने इनको भी मुस्लिम तुष्टिकरण की अंधी दौड़ में कुचल दिया।

मतुआ समुदाय को सही विकल्प मिला कि नहीं, यह तो काल के गर्भ में है। लेकिन सन् 2014 के बाद से ही ठाकुर गंज की राजनीति का निर्णायक मोड़ आ चुका है।

ठाकुर परिवार के सदस्य मंजुल कृष्ण ठाकुर, शांतनु ठाकुर, सुब्रतो ठाकुर आदि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आस्था व्यक्त कर चुके थे और आज भाजपा ने इस सामाजिक शक्ति को पहचान कर राजनीति के जटिल समीकरणों का हल निकाल लिया।

नागरिकता संशोधन (सीएए) कानून ने भी इन समाजों में भविष्य की आशंकाओं को दूर कर आशा की किरण का संचार किया है। दीदी इतनी “मजबूर” नहीं होती यदि वे भारत की मूल सामाजिक बनावट को भी महत्त्व देतीं।

दीदी को मंदिर-मंदिर भटकने को विवश नहीं होना पड़ता यदि वे भी प्रारंभ से ही भारत के अन्य सभी समाजों को भी एक ही संप्रदाय की “नाजायज़ ज़िद” के नीचे नहीं दबा देती।

अब यदि बांग्लादेश में भारत के प्रधानमंत्री मतुआ समुदाय के मंदिर में साष्टांग प्रणाम करने जाते हैं तो उसका असर इधर पश्चिम बंगाल में तो होगा ही। पूरे देश में हो रहा है, और होगा।अब इसपर प्रलाप करने के अतिरिक्त अन्य कुछ भी शेष नहीं रहा।

मंडल का प्रयोग 70 वर्षों पहले ही पूरी तरह असफल हो चुका था। वही प्रयोग दोहराने के अथक प्रयास हो रहे हैं। लेकिन अब भारत अपने सामाजिक ढाँचे को मजबूत बनाने में सक्षम है। यही भारत के भविष्य की रीढ़ की हड्डी है और यही तय करेगा कि भारत की राजनीति भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक गौरव से कभी भी पृथक नहीं हो सकती।

सुभद्र पापडीवाल एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक एवं स्तंभकार हैं।