राजनीति
चुनाव से दो सप्ताह पूर्व बसपा कैडर में असंतोष पार्टी के लिए खतरा

आशुचित्र- बाहरियों को टिकट दिए जाने पर पूरे उत्तर प्रदेश बसपा में असंतोष है।

2014 लोकसभा चुनावों में एक भी सीट जीतने में असफल होने के बाद और 2017 विधान सभा चुनावों में मात्र 19 सीटों की जीत के साथ बहुजन समाज पार्टी (बसपा) आगाममी लोकसभा चुनावों में अपनी लाज बचाने का प्रयास कर रही है। समाजवादी पार्टी (सपा) से गठबंधन होने और सीट बँटवारे में बढ़त हासिल करने के बावजूद पार्टी की परेशानियाँ कम होती नहीं दिख रही हैं।

कई चुनावी क्षेत्रों में यह गठबंधन ही संकट बन गया है। कई क्षेत्रों में जहाँ गठबंधन के बाद चुनावी क्षेत्र सपा के अधीन आ गया है, वहाँ बसपा प्रभारियों के बागी तेवर देखने के मिल रहे हैं।

मंझवा से तीन बार विधायक रह चुके रमेश बींद, जो मिर्ज़ापुर लोकसभा सीट के लिए कार्य कर रहे थे, ने तब पार्टी छोड़ दी जब यह सीट बँटवारे में सपा के पास चली गई। बसपा की हाथरस की इकाई भी कमज़ोर पड़ गई है क्योंकि सपा के पास सीट जाने के बाद यहाँ से दर्जनों वरिष्ठ कार्यकर्ता*ओं ने पार्टी छोड़ दी। मनोज सोनी, जिन्हें हाथरस से बसपा टिकट का वादा किया गया था, को आगरा भेज दिया गया है जिससे पार्टी की आगरा इकाई में भी असंतोष व्याप्त हो गया।

पूर्व बसपा लोकसभा प्रत्याशी और लंबे समय से वफादार अधिवक्ता कुंवरचंद को मनोज सोनी, जो कि एक बाहरी की तरह देखे जाते हैं, के मनोनीत किए जाने पर विरोध करने पर पार्टी से निकाल दिया गया। इसके अलावा दो अन्य वरिष्ठ कार्यकर्ताओं देवेंद्र चिल्ली और डॉ भारतेंदु अरुण को भी पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए निष्कासित कर दिया गया। ज़ोनल समन्वयक बनाए जाने के 24 घंटों के भीतर ही डॉ अरुण को निष्कासित कर दिया गया। सोनी को उम्मीदवार बनाए जाने का विरोध शहर में पोस्टर लगाकर किया गया।

बाहरियों को टिकट दिए जाने पर पूरे उत्तर प्रदेश बसपा में असंतोष है। फतेहपुर सीकरी के चुनावी क्षेत्र में बाहरी राजवीर सिंह को टिकट दिए जाने पर तीन पूर्व बसपा विधायक भगवान सिंह कुशवाह, धरमपाल सिंह और सूरजपाल सिंह कांग्रेस में सम्मिलित हो गए। राजवीर सिंह दिल्ली आधारित मार्बल के व्यापारी हैं जो इससे पूर्व पार्टी में किसी पद पर नहीं थे।

पैसे वालों को टिकट दिए जाने से भी पार्टी में असंतोष है। सहारनपुर से मांस के निर्यातक फज़लूर रहमान और मेरठ से हाजी याकूब को टिकट दिए जाने से भी स्थानीय बसपा नाराज़ है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को खुली चुनौती देते हुए स्थानीय बसपा नेताओं ने प्रेस सम्मेलन बुलाकर कहा कि याकूब कांग्रेस का आदमी था और उसे टिकट देना दलितों को बसपा को वोट देने से हतोत्साहित करेगा।

पिछलो दो माहों में बहुत लोगों ने बसपा को छोड़ दिया है। समाचार पत्र पूर्व विधायक, मंत्री और सांसदों के परित्याग की खबरों से भरे पड़े हैं। पार्टी की आगरा, अलीगढ़, मेरठ, हाथरस, संत कबीर नगर और रूड़की इकाइयों से सर्वाधिक लोगों ने पार्टी छोड़ी है।

सिर्फ ठाकुर जयवीर सिंह, चौधरी महेंद्र सिंह या मुकुल उपाध्याय जैसे उच्च वर्गों के लोगों ने ही नहीं बल्कि मायावती की खुद की जाति जाटव से कई लोगों ने पार्टी छोड़ी है जो कि बसपा के मूल समर्थक हैं। आगरा दक्षिण के पूर्व विधायक गुटियारी लाल दुबेश, हाथरस के पूर्व विधायक गेंदालाल चौधरी, महनलालगंज से दो बार सांसद रह चुकीं रीना चोधरी और कानपुर से पूर्व मंत्री सतीश पाल कुछ प्रमुख चेहरे हैं जिन्होंने पार्टी छोड़ी है।

बसपा से इतने सारे नेताओं के निरलने का एक कारण यह भी है कि मौसमी रूप से लोग इसमें जुड़ते हैं और छोड़ते हैं। मायावती खुद ऐसी संस्कृति को चलाती हैं जहाँ अचानक से नेताओं को निकाल दिया जाता है। इसके कारण ऐसा माहौल बन चुका है कि उत्तर प्रदेश के ज़्यादातर नेताओं ने बसपा से राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी।

उदाहरण के लिए सीतापुर के तीनों दावेदार- वर्तमान भाजपा सांसद और प्रत्याशी राजेश वर्मा, कांग्रेस प्रत्याशी कैसर जहां और सतीश चंदेर मिश्रा के करीबी नकुल दुबे, पूर्व में बसपा से जुड़े रह चुके हैं।

प्रत्याशियों के बार-बार बदलाव ने कैडर में भ्रम भी उत्पन्न कर दिया है। अपने क्षेत्र गौतम बुद्ध नगर में सातवी नागर चौथी प्रत्याशी हैं जिनका नाम मायावती ने घोषित किया है। बिजनोर में भी यही कहानी है जहाँ इक़बाल ठेकेदार को हटाकर रुचि वीरा को प्रभारी बनाया गया।

हास्यास्पद घटनाक्रम में इक़बाल को एक बार पुनः मनोनीत किया गया लेकिन गुज्जर प्रत्याशी मलूक नागर को पिर उनके स्थान पर ले आया गया। रुचि वीरा के समर्थन में अभियान चलाए जाने पर उन्हें आंवला से मनोनीत किया गया।

गुंडे और माफिया राजनेताओं जिनके विरुद्ध कार्रवाई किसी समय पर मायावती का चुनावी मुद्दा थी, अब वे पुनः लौट आए हैं और कैडर को हतोत्साहित कर रहे हैं। माफिया डॉन मुख्तार अंसारी की भाई अफज़ल अंसारी जो ग़ाजीपुर से चुनाव लड़ रहे हैं और सुल्तानपुर से प्रत्याशी चंद्र भद्र सिंह सोनू ने बसपा समर्थकों की त्यौरियाँ चढ़ा दी हैं।

जहाँ कुछ वर्षों पूर्व इन दोनों अंसारियों को मायावती ने पार्टी से निकाल दिया था, वहीं चंद्र भद्र पर हत्या, रंगदारी व दलितों पर अत्याचार के कई मामले दर्ज हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि शिवपाल यादव की पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी ने कमला यादव को चंद्र भद्र के विरुद्ध खड़ किया है, जिसपर उनके पति राम कुमार यादव, जो कि एक राजस्व अधिकारी थे, की हत्या का आरोप है।

अपना वर्चस्व बढ़ाए रखने के लिए मायावती ने पार्टी में नेतृत्व की दूसरी पंक्ति को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। उन्होंने किसी युवा नेता को भी तैयार नहीं किया है। बसपा के युवा चेहरा के रूप में टीवी पर आने वाले देवाशीष जररिया को भी पार्टी ने निष्कासित कर दिया है। जररिया ने नए दलित चेहरों से मायावती की असुरक्षा की भावना को उजागर किया है।

बसपा के संस्थापक सदस्य- राजबहादुर, दद्दू प्रसाद, जुगल किशोर, बाबू सिंह कुशवाह, आरके चौधरी, सोनेलाल पटेल और स्वामी प्रसाद मौर्य को अंतरिम में बसपा छोड़ना पड़ा जो कि मायावती का तानाशाही रवैया दर्शाता है।

इसलिए यह बात तो देखने योग्य होगी कि अनुबंधित प्रत्याशियों और द्वितीय कतार के नेतृत्व के अभाव में मायावती कैसे मतदाताओं को रिझा पाएँगी।