राजनीति
मसूद अज़हर पर प्रतिबंध- भारत की कूटनीतिक विजय

संयुक्त राष्ट्र की 1267 अल कायदा प्रतिबंध समिति द्वारा जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मौलाना मसूद अज़हर के विरुद्ध प्रतिबंध लगा उन्हें अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी की श्रेणी में डालना भारतीय कूटनीति की बड़ी उपलब्धि है। विदित हो कि भारत ने 10 वर्ष पहले मसूद अज़हर पर प्रतिबंध लगवाने का प्रयास प्रारंभ किया था परंतु चीन द्वारा बाधा के तौर पर डाली गयी ‘तकनीकी रोक़’ के कारण इसमें विफलता मिलती रही।

पुलवामा के आतंकी हमले के उपरान्त अमरीका, फ्रांस और ब्रिटेन का प्रत्यक्ष रूप से भारत के समर्थन में आने के कारण चीन का इस मसौदे का विरोध कमज़ोर पड़ने लगा था। प्रतिबंध के बाद आयी चीनी प्रतिक्रिया भी बड़े सधे शब्दों में व्यक्त की गई है। चीनी विदेश मंत्रालय प्रवक्ता गेंग शुआंग के अनुसार चीन का मसूद अज़हर पर प्रतिबंध पर रुख बदलने का कारण यह था कि मसौदे के समर्थक देशों ने “1267 समिति के समक्ष लिस्टिंग प्रस्ताव को संशोधित कर पुनः प्रस्तुत किया”। चीनी वक्तव्यों को पढ़ते समय उसके निहितार्थ खोजना आवश्यक होता है।

गेंग शुआंग द्वारा जारी वक्तव्य यह दर्शाता है कि मसूद अज़हर को अब तक प्रदान किए गए समर्थन को औचित्य प्रदान करने के लिए चीन को कोई एक बहाना चाहिए था। यथार्थ यह है कि जैश-ए-मोहम्मद द्वारा पुलवामा हमले की ज़िम्मेदारी लेने के पश्चात चीन पर आतंकवाद समर्थक होने का आरोप लगने लगा था। पाकिस्तान के माध्यम से लश्कर-ए-तैयबा और जैश जैसे संगठनों को समर्थन दे भारत को कश्मीर और आतंकवाद में उलझाए रखने की नीति अब चीन को घटते लाभ और बढ़ती हानिकारक साबित होने लगी थी। वैसे तो चीन का अपने सहयोगी राष्ट्रों से संबंधों के इतिहास को देखें तो चाहे वह पाकिस्तान और उसके ज़रिये उत्तर कोरिया को अवैध परमाणु तकनीक और शस्त्र प्रदान करना हो या अब तक चले 1267 प्रकरण में मसूद अज़हर को सुरक्षा प्रदान करना, चीन ने हमेशा ‘शत्रु का शत्रु मित्र’ नीति को बिना किसी नैतिक दबाव अपनाया था। पाकिस्तान से हाथ मिला कर उसने भारत को उलझाए रखा तो उत्तर कोरिया से दक्षिण कोरिया, जापान और अमरीका पर दबाव बनाया।

बदलता रुख या मजबूरी

तो ऐसा क्या हुआ की चीन ने अचानक अपना रुख बदल दिया? क्या यह बदलाव स्थाई रहेगा अथवा कूटनीति के चीनी सिद्धांतों की तरह स्वार्थ होने के बाद यह भी ‘पुनः मूषिको भव’ सिद्ध होगा?

मसूद अज़हर के प्रतिबन्ध पर चीनी दृष्टिकोण में बदलाव के कई कारण माने जा सकते हैं। सबसे पहला विश्व में आतंकवाद के विरुद्ध बनता परिवेश। इस्लामिक स्टेट द्वारा कोलम्बो में हुए विस्फोटों की जिम्मेदारी  लेने के बाद यह माहौल और तीक्ष्ण हुआ है। सीरिया और इराक में पराजय के बावजूद इस्लामिक स्टेट एक ऐसा सार्वभौमिक संगठन सिद्ध हो रहा है जिसकी पैशाचिक सोच कई देशों में अपना प्रभाव लेती दिख रही है। अफ़ग़ानिस्तान में भी इस्लामिक स्टेट जड़ लेता दिख रहा है। चीन इस बात से चिंतित है की अफ़ग़ानिस्तान से भौगोलिक सानिध्य के कारण अपने अस्थिर शिनजियांग प्रान्त से इस सोच को दूर रखना उनके लिए आवश्यक है। इस्लामिक स्टेट पहले ही शिनजियांग प्रान्त में मुसलमानों पर हो रहे चीनी अत्याचारों पर चीन को अपने हमले की परिधि में लेने की चेतावनी दे चुका है।

पाकिस्तान में पनप रहे आतंकी संगठन अपने संरक्षक पाकिस्तानी डीप स्टेट के निर्देश पर अपना ध्यान भारत और अफ़ग़ानिस्तान पर केंद्रित करते रहे हैं। यह एक क्रूर विडम्बना कही जा सकती है की अपने को ‘इस्लाम का किला’ कहने वाले पाकिस्तान और जिहाद की आड़ में भारत के ‘काफिरों’ को अपना निशाना बनाने वाले लश्कर और जैश जैसे आतंकी संगठन शिनजियांग में मुसलमानों पर हो रहे अमानवीय अत्याचारों पर चुप्पी साधे रहते हैं। प्रधानमंत्री इमरान खान का वक्तव्य जिसमे उन्होंने शिनजियांग में मानवाधिकार उल्लंघन के विषय में अनभिज्ञता दिखाई थे पाकिस्तान पर चीनी प्रभाव के कारण था। पाकिस्तान के इतने मुखर समर्थन के बावजूद यदि चीन मसूद अज़हर मसले पर अपना मत बदलता है तो यह स्पष्ट है कि वह वैश्विक स्तर पर आतंकवाद के साथ खड़ा नहीं दिखना चाहता ख़ास कर तब जब वह स्वयं अपने देश में आतंकवाद से संघर्ष की आड़ में शिनजियांग में खुले आम मानवाधिकार उल्लंघन कर रहा है।

फिनांशल एक्शन टेकेन फाॅर्स (एफ.ए.टी.एफ) द्वारा पाकिस्तान पर पड़ते निरंतर दबाव ने भी चीन को मसूद अज़हर मसले में प्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान का साथ छोड़ने पर मज़बूर किया। आतंकियों को खुली आर्थिक छूट पर लगाम लगाने के लिए एफ.ए.टी.एफ ने पाकिस्तान को पहले से अपनी ग्रे सूची में डाल रखा है। एफ.ए.टी.एफ की अगली बैठक जून महीने में पाकिस्तान द्वारा आतंकियों को आर्थिक सहयोग में रोक की समीक्षा करने वाला है। पुलवामा के बाद पाकिस्तान विदेश मंत्री के मसूद अज़हर के पाकिस्तान में उपस्थिति के बयान और बढ़ते आतंकी प्रभाव के कारण यह संभावना प्रबल थी की एफएटीएफ पाकिस्तान को काली सूची में डाल देगा। काली सूची में डाल जाने से पाकिस्तान की लचर अर्थव्यवस्था विदेशी निवेश की अनुपलब्धता में पूरी तरह ध्वस्त होने की कगार पर पहुँच जाती। इस काली सूची का असर अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के पाकिस्तान द्वारा मांगे गए ऋण पर भी अवश्यम्भावी रूप से पड़ता और वहां भी उसे निराशा हाथ लगती।

विदित हो कि पाकिस्तानी जीडीपी में वर्ष 2019 में 2.9 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी अपेक्षित है जो कि उस जैसे जनसंख्या वाले देश के लिए नगण्य है। पाकिस्तान के लिए चीन पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर के रास्ते आने वाला निवेश आर्थिक आशा की किरण है। परंतु एफएटीएफ की काली सूची और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा ऋण को नकारे जाने के बाद चीन को अपने निवेश के सापेक्ष आर्थिक लाभ की सम्भावना अत्यंत दुर्बल हो जाती। ऐसी परिस्थिति में चीन ने मसूद अज़हर को प्रतिबंधित करने पर तकनीकी रोक हटा एक तीर से दो शिकार कर लिए। पहला, पाकिस्तान मसूद अज़हर के विरुद्ध कुछ औपचारिक कार्यवाही कर एफएटीएफ की काली सूची में जाने से बचने का प्रयास करेगा।  दूसरा चीन अपने को आतंकवाद से विपरीत खड़ा दिखायेगा। कूटनीति में एक मोहरा बलि दे बाजी जीतने का प्रयास इससे बेहतर उदहारण नहीं मिलेगा। रही बात भारत को दबाव में लेने की तो मसूद जैसे मज़हबी मोहरा खड़ा करना पाकिस्तानी डीप स्टेट के लिए बड़ा काम नहीं होता।

यह प्रश्न उठना वाजिब है की क्या मसूद अज़हर को प्रतिबंधित करने से भारत में आतंकवाद कमज़ोर होगा? इसका कोई सरल उत्तर नहीं है, पर यह सर्वविदित है की पाकिस्तानी डीप स्टेट के अस्तित्व में रहते ऐसा होना अत्यंत कठिन है। अमरीकी शिक्षाविद और विचारक क्रिस्टीन फेयर के अनुसार पाकिस्तानी सेना (जो की इस डीप स्टेट का सबसे प्रमुख अंग है) का अस्तित्व भारत के प्रति घृणा फैला कर ही है और उसके लिए भारत से किसी प्रकार का समझौता अपने अस्तित्व को मिटाने समान है। पाकिस्तानी सेना यह जानती है की वह भारतीय सेना से पारंपरिक युद्ध में जीत नहीं सकती है और वह इसकी भरपाई हाइब्रिड युद्ध, आतंकी गुरिल्ला युद्ध जिसका मुख्य भाग है, के जरिये करती है। चीन पाकिस्तान की इसी असुरक्षा की भावना का उपयोग कर भारत को अपनी पूर्ण आर्थिक, सामाजिक और सैन्य क्षमता को प्राप्त करने से रोकने में प्रयोग करता है।

संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध को तोड़ने का पाकिस्तान का पुराना अनुभव है। हाफिज सईद  पर 2008 से प्रतिबंध है पर वह पूर्ण स्वंत्रता से आतंकी फैक्ट्री चला रहा है। और तो और 2018 में वह पाकिस्तान में हुए चुनाव में अपनी दावेदारी प्रस्तुत कर रहा था जिसे अंततः रोका गया। उसका आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा प्रतिबंधित होने के पश्चात नाम बदल खुले रूप से जमात-उद-दवा के नाम से चैरिटी संस्था के आवरण के पीछे से आतंकवाद फैलाता है। जैश स्वयं 2002 से प्रतिबंधित है परंतु आतंकी गतिविधियों में उसका योगदान कम नहीं हुआ है। स्पष्ट है कि आतंकी जिनको पाकिस्तान नॉन स्टेट एक्टर के नाम से संबोधित करता है वह पूरी तरह से पाकिस्तानी डीप स्टेट की नीतियों पर उनके सैन्य और राजनैतिक लक्ष्य प्राप्ति के लिए कार्यरत हैं। इसलिए भारत के लिए प्रतिबंध के जरिये आतंक की समाप्ति की उम्मीद करना दिवास्वप्न है।

परंतु यह कहना अतिशयोक्ति नहीं की मसूद अज़हर पर 1267 समिति द्वारा प्रतिबंध भारत की एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक और मनोवैज्ञानिक विजय है। इस विजय का महत्त्व इसलिए बढ़ जाता है कि एक दशक और चार तकनीकी रोक के प्रयोग के बावजूद अंततः चीन को भारत के सामने घुटने टेकने पड़े। पाकिस्तान भले ही इस कूटनीतिक पराजय में यह कह कर विजय खोजे की मसौदे में से कश्मीर इत्यादि के मसलों का संदर्भ हटाने के बाद ही प्रतिबंध लगा, परंतु यह वह और उसके ‘सर्व ऋतु मित्र’ चीन यह जानते हैं कि भारत ने अपने मित्र देशों अमरीका, फ्रांस, ब्रिटेन के साथ जो रणनीति बना उन दोनों की कूटनीतिक घेरेबंदी की उसके दूरगामी कूटनीतिक परिणाम होंगे।