राजनीति / संस्कृति
‘मंदिर बनाओ’ से पहले ‘मंदिर बचाओ’- इस वक्त सबरीमाला राम मंदिर से अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों है?
सबरीमाला और ‘संवैधानिक नैतिकता’ के साथ वास्तविक समस्याएं
आशुचित्र- अमित शाह को पहले संकल्प-पूर्ति की परीक्षा पार करना होगी। पहले मंदिर बचाओ, फिर मंदिर बनाओ। भाजपा के लिए दक्षिण के द्वार खुल जाएँगे अगर वह इस संघर्ष में सफल होती है।

स्पष्ट रूप से सर्वोच्च न्यायालय अयोध्या के राम मंदिर के लिए भारतीय जनता पार्टी की समय-सारिणी के अनुसार तो नहीं चल रही है क्योंकि सुनवाई जनवरी तक स्थगित कर दी गई है। अगर भाजपा यह सोच रही थी कि 2019 चुनावों के पहले वह मंदिर बनाने में सफल होगी, तो वह भ्रम में थी। सर्वोच्च न्यायालय से अपेक्षा करना कि वह इस विवादास्पद मामले पर चुनाव के पहले फैसला सुनाएगा, भाजपा की विश्वसनीयता के लिए खतरा है। अगर निर्णय मंदिर के पक्ष में गया तो इसपर बहुसंख्यकों का समर्थन करने का आरोप लगेगा और अगर निर्णय दूसरे पक्ष में हुआ तो इसे हिंदुओं का आक्रोश झेलना पड़ेगा। एक समझौतापूर्ण निर्णय किसी को संतुष्ट नहीं कर पाएगा और इसके बाद कई समीक्ष याचिकाएँ दर्ज होंगी।

भाजपा असल में गलत मंदिर ध्यान केंद्रित कर रही है, इसकी प्राथमिकता राम मंदिर नहीं होनी चाहिए क्योंकि इसमें वक्त लगेगा, इसे सबरीमाला को प्राथमिकता देनी चाहिए। अगले चुनावों के लिए इसका नारा मंदिर बनाओ नहीं बल्कि मंदिर बचाओ होना चाहिए।

जो मंदिर कई सालों से अस्तित्व में नहीं था, उसपर ध्यान देना भाजपा की मूर्खता है बल्कि दक्षिण में कई मंदिर हैं जो राज्य के हस्तक्षेप के कारण अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। अगर इस मंदिर को सेक्युलर लुटेरों से बचा लिया गया तो अन्य मंदिर जो राज्यतंत्र के नियंत्रण में हैं, उन्हें निकट-भविष्य में इससे मुक्त होने की उम्मीद मिलेगी।

सबरीमाला पर अपनी मुद्रा से और अयोध्या मुद्दे पर जहाँ इसके पास शब्दों के अलावा कुछ नहीं है, भाजपा किसी को मूर्ख नहीं बना सकती। तीन दिन पहले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह जब कन्नूर में पार्टी कार्यालय के उद्घाटन के लिए गए थे, तब उन्होंने कहा था कि यदि पिनाराई विजयन सरकार अयप्पा भक्तों को प्रताड़ित करेगी तो भाजपा राज्य में सरकार गिराने से पीछे नहीं हटेगी। उन्होंने यह भी कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा निर्णय दिया ही क्यों जो कार्यान्वित नहीं हो सकता और अनुच्छेद 14 के एक मौलिक अधिकार के लिए अनुच्छेद 25 और 26 (धार्मिक परंपराओं का अधिकार) के अधिकारों का हनन कैसे कर सकता है।

हालाँकि, कोई तरीका नहीं है जिससे शाह केरला सरकार गिरा सकें। और विजयन ने शाह पर सवाल उठाया है कि वे राज्य सरकार को धमकी दे रहे थे या सर्वोच्च न्यायालय को। वे शस्त्र-बल और राजनीतिक गलत सूचनाओं का प्रसार कर प्रदर्शनकारियों को हराना चाहते हैं। एक तरीका यह है कि वे सबरीमाला प्रदर्शन को भाजपा या संघ के कार्यकर्ताओं की साज़िश बताकर इसे छोटा सिद्ध करना चाहते हैं। और दूसरा यह दुष्प्रचार करके कि आज सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति नहीं है, कल दूसरी जातियों की भी मनाही हो सकती है, जिससे इस प्रदर्शन को दलितों का समर्थन न मिले।

अगर भाजपा सच में अपने राजनीतिक, सामजिक और नैतिक संकल्पों की पूर्ति करना चाहती है तो उसे इस दुष्प्रचार से भी लड़ना होगा। इसे सर्वोच्च न्यायालय में इस लड़ाई को जीतना होगा, इससे पहले कि विजयन पने अनुसार सबरीमाला में परिवर्तन करे- 10 से 50 वर्ष की महिलाओं को मंदिर में भेजकर और 17 नवंबर के मंदिर खुलने से पहले हज़ारों भक्तों को जेल में बंद करके।

रिपोर्ट के अनुसार 3,345 से अधिक श्रद्धालुओं को गिरफ्तार कर लिया गया था और विजयन सरकार द्वारा पूरे प्रदेश में उनके विरुद्ध कुल 517 केस दर्ज किए हैं। यह किसी राज्य सरकार द्वारा भक्तों के प्रदर्शन को दमन करने का सबसे निर्दयी प्रयास है। यही है केरला की धार्मिक स्वतंत्रता। इस प्रकार का प्रयास केवल स्वामी अयप्पा के भक्तों को उत्पीड़ित करने, विशेशकर कि हिंदुओं के विरुद्ध हि किया जाता है।

अगर शाह सच में विजयन के विरुद्ध कुछ करना चाहते हैं तो केंद्र सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के सितंबर के सबरीमाला निर्णय पर रोक लगाने की याचिका के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। इसे केरला सरकार के लिए भी निर्देश जारी करवाने होंगे कि वह भक्तों को मुक्त करे। केरला उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को चेतावनी दी थी लेकिन विजयन तब तक नहीं सुनेंगे जब तक यह निर्देश सर्वोच्च न्यायालय से नहीं आते। आखिरकार वह यह कह सकते हैं कि वे वही कर रहे हैं जो सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है।

शाह और भाजपा को लोग उनके बयानों के आधार पर नहीं आँकेंगे परंतु सबरीमाला की संस्कृति पर समानता के नाम पर हो रहे बर्बर हस्तक्षेप से बचाने के लिए किए गए कानूनी प्रयासों पर उनका निर्णय करेंगे।

अयोध्या पर बात करना अजीब है क्योंकि सालों तक वह मंदिर नहीं बनेगा और कुछ नास्तिकों व भक्तों के बीच की मौखिक नोक-झोंकों के अलावा उससे कुछ नहीं मिलेगा।

भक्तों द्वारा नास्तिक महिलाओं का प्रवेश रोके जाने पर कम्युनिस्ट पार्टी बदला लेगी और इस बार पूरी तैयारी में रहेगी कि जब वह महिलाओं को अंदर ले जाए तो उन्हें रोकने के लिए कोई भक्त वहाँ उपस्थित न हो।

शाह को पहले अपने संकल्प-पूर्ति की परीक्षा देनी होगी। पहले मंदिर बचाओ, फिर मंदिर बनाओ। अगर भाजपा यह संघर्ष जीतने में सफल हुई तो दक्षिण के द्वार इसके लिए खुल जाएँगे।