राजनीति
ममता बनर्जी ने बहुत गलत मिसाल रखी है जिसपर चर्चा आवश्यक है

आशुचित्र- इसके अलावा अब यह लगभग तय है कि राहुल गांधी की कांग्रेस क्षेत्रीय नेताओं और दलों से मेल-मिलाप बढ़ाकर एक मज़बूत विपक्ष के निर्माण में जुटी हुई है।

सर्वोच्च न्यायलय द्वारा कोलकाता के पुलिस आयुक्त को केंद्रीय जाँच ब्यूरो के समक्ष प्रस्तुत होने का आदेश दिए जाने के बाद, ममता बनर्जी बनाम केंद्र में दोनों पक्षों द्वारा जीत का दावा किए जाने के साथ खत्म हो गया है। हालाँकि इस प्रकरण के सबसे दिलचस्प घटनाक्रम मुख्य घटना के किनारों के आसपास हो रहे हैं और यह लेख उन महत्त्वपूर्ण घटनाओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहता है।

कांग्रेस पार्टी, जिसके वरिष्ठ नेताओं ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी सहित, ने चिटफंड घोटाले को लेकर 2016 में विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान ममता बनर्जी पर मुखर हमला किया था, वे अब पूरी तरह से यू-टर्न ले चुके हैं और राहुल गांधी ने ममता बनर्जी को अपनी पार्टी का आश्वासन एवं समर्थन देने के लिए फ़ोन भी किया था।

साथ ही यह कहना भी ठीक होगा कि कांग्रेस और राहुल गांधी ने 2019 के अभियान में ममता बनर्जी के लिए दूसरी भूमिका निभाने का फैसला कर लिया  है। दरबारी पत्रकारों को छोड़कर कांग्रेस की विधानसभा की जीत किसी को भी प्रभावित करने में विफल रही और कांग्रेस ने अपनी सोच बदल ली है। वह 2019 के चुनाव से केवल भाजपा को बाहर रखना चाहती है। अब तक, कांग्रेस ने सपा और बसपा को उत्तर प्रदेश सौंप दिया है जबकि उन्हें इस महागठबंधन में शामिल होने का मौका नहीं दिया गया और बिहार में भी राष्ट्रीय जनता दल की तुलना में कम सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए सहमत होने का हवाला दिया है और ममता बनर्जी को समर्थन देने के बाद, राहुल गांधी ने 2019 में प्रधानमंत्री बनने की आकांक्षाओं को समाप्त करने का संकेत दिया। उनकी बहन प्रियंका गांधी का राजनीति में आना उनके अपनी पार्टी द्वारा उनके प्रदर्शन पर अविश्वास प्रस्ताव के रूप में देखा जा रहा है और राहुल गांधी राजनैतिक रूप से निर्बल साबित हो रहे हैं।

हालाँकि, इस घटना की सबसे चिंताजनक प्रवृत्ति ममता बनर्जी द्वारा सीबीआई अधिकारियों को गिरफ्तार करने के साथ-साथ भाजपा नेताओं के दौरे के लिए लगातार बाधाएँ पैदा करने के लिए राज्य की कानून व्यवस्था का अभूतपूर्व उपयोग है। जबकि कई भाजपा समर्थक इसे ममता की धमकी के संकेत के रूप में देखते हैं और ममता बनर्जी का सत्ता का खुल्लमखुल्ला इस्तेमाल और लोकतंत्र को बचाने के लिए धरने में शामिल होने वाले वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का उनके प्रति समर्पण का भाव भारतीय लोकतंत्र के लिए गंभीर निहितार्थ हैं।

इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि गैर-ज़िम्मेदार क्षेत्रीय दलों द्वारा बढ़ाए जा रहे दबदबे भी देशव्यापी रचनात्मक विपक्ष का निर्माण करने में कांग्रेस की विफलता का संकेत है जो भाजपा ने सत्ता से बाहर रहने के दौरान अच्छी तरह से करने की कोशिश की। शीर्ष पद के लिए राहुल गांधी की व्यक्तिगत आकांक्षाएँ मोदी के खिलाफ उनकी व्यक्तिगत दुश्मनी और वंशवाद के लिए कांग्रेस पार्टी की अंधश्रद्धा ने “मोदी हटाओ” को पार्टी के लिए अव्वल दर्जे का लक्ष्य बनाया। जबकि सत्ता वापस लेना उनका अधिक तार्किक लक्ष्य होता जो कि एक राजनीतिक पार्टी का धर्म है।

बदले में इसका मतलब था कि पार्टी प्रत्येक राज्य में कैडरों के निर्माण के बजाय, कम से कम प्रतिरोध का रास्ता तलाश रही है, अर्थात् अपना समर्थन उन्हें दे रही है जो उस राज्य में भाजपा के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी हैं। ऐसा करने से, कांग्रेस ने न केवल अपने राज्य के कैडरों को नीचे गिराया है और भाजपा को उन राज्यों में नंबर दो के स्थान पर जाने की अनुमति दी जहाँ पारंपरिक रूप से वे मजबूत नहीं थे, बल्कि पार्टी ने ममता बनर्जी जैसे अहंकारी क्षेत्रीय नेताओं को भी अपनी राजनीतिक शक्ति का दुरूपयोग करने की अनुमति दी है जो कि एक दिन हमारे राष्ट्र को खतरे में डाल सकती है।

वामपंथियों के कथात्मक आलेखन के कारण, इस मुद्दे की चर्चा मुख्य रूप से देश के संघीय ढाँचे पर केंद्रित थी और इस बात पर भी गौर किया जा रहा था कि मोदी सरकार ने राज्यों के अधिकारों का हनन नहीं कर रहा है। यदि भारत में एक कार्यशील मुख्यधारा मीडिया होता, तो इस चर्चा पर ज़रूर ध्यान केंद्रित करता कि कैसे एक मुख्यमंत्री ने अपनी शक्ति का दुरूपयोग कर केंद्र को अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करने से रोके रखा। आज के खंडित प्रवचन में ममता बनर्जी ने अपनी “शक्ति का दावा” करने के लिए प्रच्छन्न भाव से अलगाववाद का इस्तेमाल किया और जो भी व्यक्ति एक मजबूत और एकजुट राष्ट्र के रूप में भारत के भविष्य में निवेश करने का सोच रहे हैं, उन्हें इस बारे में चिंतित होना चाहिए।

जबकि तटस्थ पर्यवेक्षक टीएमसी के साथ-साथ भाजपा को इस प्रदर्शन से राजनीतिक लाभ के बारे में कुछ हद तक विभाजित कर रहे हैं मगर कोई भी इस बात पर मदद नहीं कर सकता लेकिन सोच सकता है कि वही विपक्षी दल जो ममता बनर्जी का सार्वजनिक रूप से समर्थन करने के लिए जल्दबाजी करते हैं, कम से कम उन्हें थोड़ा सोचना चाहिए था कि बनर्जी अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं के लिए इसे एक लॉन्चपैड के रूप में उपयोग न करे।

सबसे पहले ममता बनर्जी के कुछ ऑनलाइन समर्थक सोशल मीडिया पर क्षेत्रीय और भाषाई पक्षपाती हैं, और उनमें से कई ने अमित शाह और योगी आदित्यनाथ जैसे नेताओं को नीचे दिखने की कोशिश में उत्तर भारतीय लोगों को जनसांख्यिकीय के रूप में लक्षित किया है।

मुलायम सिंह यादव या मायावती जिन्हें अपनी सत्ता हासिल करने के लिए उसी जनसांख्यिकी में जाने की ज़रूरत है निश्चित रूप से चर्चा में सबसे विभाजनकारी पार्टी के साथ किसी भी तरह के संरेखण से सावधान रहेंगे। आम चुनावों के लिए शायद ही कोई समय बचा हो और किसी को भी यह सोचना चाहिए कि क्या ममता और टीएमसी ने महागठबंधन में बराबरी के हिस्सेदारी का दावा किया है।

अंत में, इस नाटक को देखने वाले कई अपेक्षाकृत तटस्थ मतदाता निश्चित रूप से पूछेंगे कि क्या वे उस देश में रहना चाहते हैं जहाँ प्रत्येक राज्य के मुख्यमंत्री के पास उस राज्य के नागरिकों के जीवन पर पूर्ण अधिकार है। ममता बनर्जी के प्रदर्शन में राज्य के अधिकारों की प्रकृति के बारे में कुछ डरावने प्रश्न मौजूद हैं। यदि पुलिस अपने राजनीतिक मालिकों के हाथों में कोड़ा थमाती है और राज्यों के पास केंद्र को हस्तक्षेप करने से रोकने की शक्ति है तो आप तब क्या करेंगे जब राज्य दुष्ट हो जाएँगे?

क्या होगा जब ममता बनर्जी जैसे कई क्षेत्रीय नेता केंद्र में गठबंधन सरकार बनाने के लिए हाथ मिलाएँगे, जिसका कोई समान एजेंडा नहीं होगा सिवाय इसके कि 20वीं शताब्दी के आरंभ में अमेरिका में माफिया की तरह एक-दूसरे के क्षेत्र में हस्तक्षेप न करने का एक मौन समझौता करेंगे? इस शक्ति सौदेबाजी के हिस्से के रूप में कल दिल्ली पुलिस को स्थानीय सरकार के तहत लाया जाता है और क्या होगा अगर वह सरकार प्रधानमंत्री को दिल्ली में उतरने से रोकने का फैसला करती है?

केंद्र द्वारा अपनी शक्ति का अंधाधुंध उपयोग करना एक वास्तविक चिंता है और राजनीतिक में अक्सर इसकी चर्चा होती है लेकिन क्षेत्रीय नेताओं का राज्यों पर दबदबा और इसके परिणामस्वरूप भारत का बाल्कनीकरण एक समान रूप से वास्तविक खतरा हैं और केंद्र एवं राज्य के सत्ता विभाजन से जुड़ी किसी भी चर्चा में इस खतरे पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए।

लेखक एक व्यवसायिक उपन्यासकार हैं।