राजनीति
महागठबंधन या महा-बंधन: एक नजरिया

2019 के लोक सभा चुनाव की सरगर्मी अब शुरू हो चुकी है। हर कोई अपने दोस्त संजोने और दुश्मनों को दोस्त बनाने में लग चुका है। और सच्चाई यही है कि चुनाव आते आते राजनीतिक गलियारों में बहुत से नए दोस्त बनाये जायेंगे। 2019 का चुनाव ज्यादा रोमांचक इसलिए है क्यूंकि इस बार चुनाव मोदी बनाम कोई भी है। और ऐसे में महागठबंधन की कवायदें तेज हो गयी हैं। मेरे हिसाब से कांग्रेस के साथ या कांग्रेस के बिना क्षेत्रीय पार्टियों का ऐसा कोई भी समझौता केवल एक महा-बंधन है न कि महागठबंधन। ऐसा कहने के पीछे मेरे कई तर्क हैं –

पहला –

विपक्षी पार्टियां आत्ममंथन करने के बजाए और अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊँचा रखने के बजाए उन्हें ऐसे नए सहयोगियों के साथ काम करने को कह रही हैं जो जीवन भर उनकी विचारधारा के विरुद्ध लड़ते रहे हैं। उदाहरण के तौर पर कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, जम्मू कश्मीर को देखा जा सकता है।

सपा और बसपा गठबंधन का चेहरा कौन होगा इसका जवाब किसी के पास नहीं है और जैसे ही किसी भी पार्टी ने इसका जवाब दिया तो गठबंधन की संभावनाएं समाप्त हो जाएँगी। अखिलेश यादव एक लोकप्रिय नेता हैं लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि राजनीतिक मामलों में उनके खेमे में बहुत से दिग्गज है जिनकी राय उन्हें लेनी चाहिए। अखिलेश युवाओं के लिए एक आकर्षक चेहरा हैं जिस पर वे अपना दांव खेल सकते हैं और साथ ही उत्तर प्रदेश की हवाओं में परिवर्तन की सुगबुगाहट है। ऐसे में मुलायम सिंह के मजबूत संगठन को आत्ममंथन की आवश्यकता है और अपने बुद्धिजीवी वर्ग को आगे रख के चुनाव लड़ने के बारे में सोचना चाहिए न कि मायावती या कांग्रेस के साथ बंधन में बंध के अपनी पार्टी के अन्दर ही असमंजस और संदेह की स्थिति पैदा करनी चाहिए जिससे उन्हें कोई फायदा तो नहीं पर नुकसान जरूर पहुंचेगा।

दूसरा –

सीटों का बंटवारा – दूसरा सबसे दिलचस्प मुद्दा है कि इस तथाकथित गठबंधन में जिसकी परिकल्पना के सपने सजाये जा रहे हैं अगर बन भी गया तो सीटों का बंटवारा किस तरह होगा

उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश में जहाँ सपा, बसपा और कांग्रेस साथ आने का विचार बना रहे हैं वहां कुल 80 लोक सभा सीटें हैं और किसी भी हालत में कांग्रेस की वर्तमान हालत को देखते हुए 2-5 सीटों से ज्यादा कांग्रेस को मिलती नहीं दिखती। ऐसे में कांग्रेस जोकि एक राष्ट्रीय पार्टी है इस प्रस्ताव को नहीं मानेगी। वहीं दूसरी ओर सपा और बसपा आपस में इस टकराव से ग्रसित रहेंगे की किसको ज्यादा सीटें मिल जाएँ। कोई भी 50 से कम सीटों पर मान जाये इसकी उम्मीद कम ही है। ऐसे में इस महागठबंधन को महा-बंधन कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

तीसरा –

मोदी और अमित शाह की कूटनीति– इस बात में कोई दो राय नहीं कि समय समय पर अमित शाह और नरेन्द्र मोदी की जोड़ी ने यह दर्शाया है कि चुनाव में किस तरह से विपक्ष की रणनीति को ध्वस्त किया जा सकता है। फिर चाहे वह उत्तर प्रदेश का चुनाव हो, गुजरात हो या फिर गोवा। सत्ता में आने के लिए साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपनाने वाली भाजपा अच्छे से समझ रही है कि विपक्ष की मंशा क्या है और इसके लिए चुनाव से पहले आप बहुत सी योजनाओं और लुभावने तोहफों की बरसात देखेंगे। हो सकता है राम मंदिर का मुद्दा फिर से गरमा जाये और ध्रुवीकरण की राजनीति उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों को अपनी चपेट में लेले। ऐसे में किसी भी महागठबंधन की जीत और मुश्किल हो जाती है। भाजपा अपने उन्हीं सहयोगियों, से जिनको  उसने चार साल कुछ नहीं समझा अब दुबारा अपने नजदीक लाने का प्रयास कर रही है। भाजपा भी यह समझ चुकी है कि अगर उत्तर भारत में 2014 में मिली सीटों ने ही उसकी राह आसान की थी और यदि इस महागठबंधन की कल्पना साकार होती है तो किसी भी सूरत में नरेन्द्र मोदी की पुनः प्रधानमंत्री बनने की राह आसान नहीं होगी। इसलिए महागठबंधन के सारे प्रयासों को रोकने के लिए भाजपा पूरा प्रयास करेगी।

चौथा और आखिरी –

भाजपा के लिए एक तरफ पार्टियों का विद्रोह, वहीं दूसरी ओर जनता का समर्थन – समय समय पर हो रहे सर्वेक्षणों और विश्लेषणों में ये बात निकल कर आ रही है कि अभी भी बतौर नेता और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर नरेन्द्र मोदी सबसे लोकप्रिय नेता हैं और जनता उन्ही के पक्ष में खड़ी दिख रही है। ऐसे में टूटते-बनते महागठबंधन पर जनता कितना भरोसा दिखाएगी यह तो वक़्त ही बताएगा लेकिन फ़िलहाल के माहौल में आप कई दोस्तों को बिछड़ते और कई दुश्मनों को गले लगते देखेंगे।

फिलहाल जनता को आराम से न्यूज़ चैनल लगा कर चुनावी सरगर्मी का आनंद लेना चाहिए और लोक सभा चुनाव में अपने विवेक और सूझबूझ से अपने मत का इस्तेमाल करना चाहिए।