राजनीति
महागठबंधन- भव्य संधि या कांग्रेस की पिछले द्वार से प्रवेश के लिए भव्य योजना?
आईना - 7th January 2019
आशुचित्र- 
  • राष्ट्र को लेकर महागठबंधन का क्या दृष्टिकोण है?
  • भाजपा के विरोध के अलावा और क्या चीज़ है जो इन्हें बांधे रखती है?
“2019 जनता बनाम गठबंधन होगा”
इस बयान के साथ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव के लिए बिगुल बजा दिया है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि जनता के सामने सिर्फ दो विकल्प हैं। पाँच साल के काम के बाद एक सुधारवादी और भविष्य के लिए एक ठोस योजना वाली सरकार या अवसरवादियों का एक असंतुष्ट समूह जो किसी ठोस दृष्टि या सामान्य विचारधारा के बिना जीवित है और एकजुट है।
एक लोकतांत्रिक राष्ट्र जो हर तरह से विविध है, वहाँ राष्ट्र को लेकर सबकी विभिन्न विचारधाराएँ और दृष्टिकोण होना स्वाभाविक है। यह केवल भारत में ही संभव है कि इस तरह की विविधता के साथ हम न केवल शांति बनाए रखते हैं बल्कि इस पर गर्व भी करते हैं। वैविध्यपूर्ण समाज हमारी राजनीति में भी परिलक्षित है जहाँ दो बड़े राष्ट्रीय दलों के साथ छोटे लेकिन महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय दल मौजूद हैं।
इसलिए केंद्र में गठबंधन सरकार का पूरी तरह से अराजक होने की संभावना कम है यदि यह दो शर्तों को पूरा करती है। पहली यह कि सभी दलों का एक स्पष्ट दृष्टिकोण और उनमें आम वैचारिक सहमति हो, कम से कम अधिकांश सदस्यों की।
दूसरा, विभिन्न क्षेत्रीय मुद्दों के बावजूद राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखा जाए और इससे किसी प्रकार का समझौता न हो।
राष्ट्रीय स्तर पर किसी गठबंधन को जीवित रखने के लिए ये दो शर्तें आवश्यक हैं और अगर ये दो शर्तें पूरी नहीं होतीं तो गठबंधन का टूटना तय है जैसा कि भारत ने 1990 के दशक में देखा था।
वाजपेयी सरकार ने उपरोक्त दोनों मानदंडों को अपनाया और भारत ने वर्षों में अपनी पहली स्थिर गठबंधन सरकार देखी। उनके शासन के दौरान पोखरण परीक्षण, भारत की दूरसंचार नीति तैयार करना और स्वर्णिम चतुर्भुज रोड परियोजना सहित कई बड़े फैसलों को आगे बढ़ाया गया।
इसके बाद यूपीए का दौर था। भले ही सरकार सहयोगी दलों के हमले से बच गई, जब वामपंथी दलों ने अमरीकी परमाणु समझौते के विरोध में समर्थन वापस ले लिया था लेकिन पूरी कार्यावधि में घोटालों और नीतिगत पक्षाघात के कारण विवादों में घिरी रही। उस दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था में 5.6 प्रतिशत की दर से राजकोषीय घाटा बना रहा और महंगाई दर दोहरे अंक में चल रही थी।
2014 के परिणाम जिसमें भाजपा को एक शानदार बहुमत मिली ने यह स्पष्ट किया कि आम आदमी अवसरवादी और क्षेत्रीय लोगों की एक भ्रष्टाचार-ग्रस्त मंडली से हताश हो चुका था। वह देश की पतवार एक मज़बूत नेता के हाथ में चाहता था जो विभिन्न हित की ओर केंद्रित समूहों द्वारा दी गई फिरौतियों से दिग्भ्रमित न होता हो। नरेंद्र मोदी का ‘इंडिया फर्स्ट ’चुनावी नारा जनता के बीच गूंजता रहा। ‘सबका साथ, सबका विकास’ पर उनके ध्यान ने “मेरे लिए इसमें क्या है” के सामूहिक स्वार्थ वाले आलाप पर एक विराम लगाया। यह ऐसा था जैसे लोग पूछ रहे हों कि “राष्ट्र के लिए सबसे अच्छा क्या है?”
जैसा विपक्ष का महागठबंधन आकार ले रहा है ऊपर लिखित व्यवस्था का विश्लेषण करने की आवश्यकता है। आम चुनावों में पाँच महीने से भी कम वक्त बचा है और सबसे अधिक विपरीत विपक्षी दलों ने मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को हराने के लिए एक साथ हाथ मिला लिया है।
हालाँकि, मोदी को हराने के तात्कालिक अल्पकालिक लक्ष्य के अलावा किसी को भी स्पष्ट रूप से महागठबंधन के घटक दलों के बीच किसी अन्य वैचारिक आधार या समानता के लक्षण नहीं दिख रहे हैं। इस मोड़ पर हाथ मिलाना भारतीय राजनीति में खुद को जीवित रखने का एक तरीका है।
पिछले साढ़े चार साल के भीतर देश का पूरा राजनीतिक परिदृश्य बदल गया है। करीब 70 साल से कांग्रेस को सत्ता के स्वाभाविक अधिकार वाली पार्टी माना जाता था। नेहरू-गांधी उपनाम के साथ जन्म लेने वालों को देश के सर्वोच्च कार्यालयों में एक डिफॉल्ट विकल्प में रूप में देखा जाता था। पहली बार एक गांधी की किस्मत में उदासी दिख रही है क्योंकि उसके अपने ही महागठबंधन के साथी उसे प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने को तैयार नहीं हैं।
हाल ही में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के प्रमुख स्टालिन ने राहुल गांधी को भारत के प्रधानमंत्री के रूप में देखने के लिए अपनी पार्टी की तरफ से घोषणा की थी। हालाँकि इस प्रस्ताव को राहुल गांधी के नेतृत्व पर विश्वास की कमी दिखाते हुए कांग्रेस के अन्य सहयोगियों से थोड़ा ही समर्थन मिला। एकजुटता का मुखौटा पहन कर कई व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ आकार ले रही हैं जो एक अनुकूल संभावना पैदा होने पर बिखर जाएगी। एक ज्ञात, प्रदर्शनकारी, पारदर्शी और विश्वसनीय नेता के खिलाफ पूरे विपक्ष का एक साथ खड़ा होना, ऐसा परिदृश्य देश के लिए बड़ा जोखिम है।
दूसरा सवाल यह पूछे जाने की ज़रूरत है कि ये क्षेत्रीय ताकतें जो एक साथ आ रही हैं क्या राष्ट्र के बारे में पहले सोचने के लिए अपनी क्षेत्रीय प्राथमिकताओं को पीछे छोड़ सकेंगी? या फिर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने वाली ताकतें क्या पहले राष्ट्र के बारे में सोचने के लिए अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को अलग करने में सक्षम हो सकेंगी? जीएसटी, राफेल, कृषि ऋण माफी और सर्जिकल स्ट्राइक के मुद्दों पर विपक्षी खेमे से आने वाले असंगत शोर संदेह पैदा करता है। राष्ट्रीय महत्त्व के मामलों में कांग्रेस के नेतृत्व वाली इन पार्टियों ने मोदी को नीचे लाने के प्रयास में राष्ट्र की प्रतिष्ठा दाँव पर लगाने से परहेज़ नहीं किया है।
इन नेताओं की व्यक्तिगत विश्वसनीयता ही सवालों के घेरे में है। वास्तव में कांग्रेस के दो सर्वोच्च नेता सोनिया और राहुल गांधी दोनों ही हज़ारों करोड़ रुपए के मामले में जमानत पर बाहर हैं। अगस्ता वेस्टलैंड के बिचौलिए क्रिस्चियन मिशेल के कथित तौर पर पोल खोलने और प्रमुख घोटालों में उनका व्यक्तिगत दोषी होना भाजपा के लिए एक मज़बूत चुनावी बिंदु है।
इसके अलावा नरेंद्र मोदी की मिट्टी के बेटे होने और साफ-सुथरी छवि के साथ तुलना करना दोनों विकल्पों के बीच तुलना को और भी आसान कर देता है।
अपने पहले परीक्षण में ही महागठबंधन अपने अस्तित्व में आने का कारण मतदाता को समझाने में विफल रहा है। तेलंगाना में केसीआर को प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापस आए और महागठबंधन को अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा। अब यह महागठबंधन पर है कि वह कैसे मतदाताओं को समझाएगा कि उनके पास देश के लिए एक भव्य वैकल्पिक दृष्टि है जो कृषि ऋण माफी जैसा प्रलोभन के अलावा वह राष्ट्रीय महत्व के दीर्घकालिक मुद्दों को हल करने की मोदी के जैसी श्रमता रखता है। अन्यथा यह कांग्रेस पार्टी के लिए पिछले दरवाज़े से अंदर आने की तरकीब से ज़्यादा कुछ नहीं है जो समय-समय पर लोगों द्वारा खारिज कर दी गई है।