राजनीति
मध्य प्रदेश की भाजपा को अपने पसीने से सींचने वाले उस्ताद की मौत

होली के दिन रामगोपाल उस्ताद याद आए। पता नहीं क्यों? उन्हें सब उस्ताद के नाम से ही जानते थे। पता नहीं क्यों? क्योंकि मैंने उनमें कभी कोई उस्तादी देखी ही नहीं थी। इसलिए कभी नहीं समझ पाया कि उन्हें लोग उस्ताद क्यों कहते थे? रामगोपाल यानी एक ऐसा शख्स जो कुछ ही महीने पहले मेरे गांव में गुमनाम मौत मर गया। जिंदगी ने उसके खाते में ऐसा कुछ नहीं दिया था, जिसकी वजह से वह मुझे याद आते। याद किसे किया जाता है? जिसके पास कुछ हो। ऊंचे ओहदे हों, बेहिसाब दौलत हो, रुतबा-रुआब हो। यह सब जितना ज्यादा होगा, उतना ही याद किए जाने लायक कुछ माना जाएगा। कोई ऐसा जो खुद टिकट कबाड़ सके, फिर जीत भी सके, जीतने के लिए हर तरह की ताकत की नुमाइश करे। जीतकर शपथ ले तो और ज्यादा ताकत का सबूत आया। फिर दूसरों को टिकट दिलवा सके या कटवा सके तो सियासत का सिद्ध पुरुष हुआ। रामगोपाल में ऐसा कुछ नहीं था। तो मुझे अचानक याद क्यों आए? वो भी होली के दिन।

  पांच फुट ऊंचे रामगोपाल हर गुरूवार को मंडी बामौरा के हाट बाजार में या आती-जाती बसों में रुपए-दो रुपए का कांच-कंघा जैसा सामान बेचा करते थे। उन्हें किसी भी सस्ती चाय की दुकान या ठेले पर चाय पीते हुए, बीड़ी फूंकते हुए देखा जा सकता था। दाढ़ी सफेद हो चुकी थी। उम्र ढल चुकी थी। अपने बचपन में मेहनत और ईमानदारी की जैसी चमक मैंने उनकी आंखों में देखी थी, वो कभी भोपाल-दिल्ली में किसी की आंखों में दिखाई नहीं दी। मैं नहीं जानता कि रुपए-दो रुपए के सामान बेचकर वे कितना कमा पाते होंगे?

 उनकी मौत की खबर के साथ ही जानकारी यह भी मिली कि उनका परिवार किसी शहर में जा बसा था। लेकिन उन्हें अपना गांव ही रास आया था। वे निपट अकेले थे। लंच-डिनर के नाम पर कचोरी-समोसा और चाय। बस। हो सकता है वह इतना ही कमा पाते हों। वे ऐसी फाकाकशी में कम से कम पिछले 15 साल से तो थे ही। समय का यह अंतराल इसलिए लिया है कि यही वह समय था जब मध्यप्रदेश में एक राजनीतिक पार्टी ने सबसे लंबे समय तक सत्ता की चमकदार पारी खेली। यह वही पार्टी थी, जिसकी नींव को मजबूत करने में मेरे गांव के रामगोपाल ने अपने जीवन की ऊर्जा और समय लगाया था। दिल खोलकर काम किया था उन्होंने। वह भी उस कठिन दौर में जब डंडा-झंडा उठाने वाले ढूंढे नहीं मिलते थे। मैं इस एक रामगोपाल को जानता था। मुमकिन है हर गांव-कस्बे में ऐसे अनगिनत गुमनाम रामगोपाल हों!

अब जरा मेरे बचपन की छवियों में कैद रामगोपाल से मिलिए। यह तब की बात है जब अस्सी के दशक में कांग्रेस की ताकतवर सरकारें हुआ करती थीं। सूबा अर्जुनसिंह और मोतीलाल वोरा जैसे नेताओं की लीडरशिप में था। बीजेपी अपनी जड़ें रोपने में लगी थी। छोटे गांव-कस्बों में उसे चुनावों में पोलिंग बूथ पर तैनात करने के लिए लोग नहीं मिलते थे। बीते 15 सालों में सत्ता के राजमार्गों पर गतिशील हुए भव्य रथ सवारों में ज्यादातर नामालूम हैसियत के ही लोग थे। मगर वे रामगोपाल जैसे नहीं थे कि अपनी उम्मीदें और उम्र एक मकसद के लिए खपाने सियासत में आए थे। वे व्यवहारिक थे। दुनियादार थे। सियासत में वसूलना उन्हें आता था। उन्हें पदों का प्रताप पता था। वे टिकट की ताकत को भांप चुके थे। रामगोपाल एक विचार के लिए जीते थे। दिन भर मेहनत करके कमाते थे। बचे समय में पार्टी के लिए काम करते थे। वह भी सबसे निचली पायदान पर। एक छोटे से गांव में।

 तब बीजेपी के बीजों से कोंपले फूट रही थीं। वे उस दौर के उन आम कार्यकर्ताओं में से थे, जिनके पास तेवर थे। विरोध के तेवर। संघर्ष के तेवर। लड़ने के तेवर। ईमानदारी और मेहनत के बूते पर एक बुलंद आवाज के तेवर। वे एक ऐसी पार्टी के पक्षधर थे जिसे राजधानी में होने वाली शपथ के लिए एक लंबा इंतजार करना था। उस समय रामगोपाल के बच्चे छोटे-छोटे रहे होंगे। फिर वे बड़े हुए होंगे। पार्टी की बुलेट ट्रेन जब तक सत्ता के शानदार प्लेटफार्म पर आई तब तक झकास कुर्ते-पाजामे में पदों के इर्दगिर्द चतुर नेताओं की एक अलग पौध पनपी। ट्रेन धूमधड़ाके से आगे निकल गई। रामगोपाल वहीं रह गए। वे परिवार को ढंग से संभाल पाने लायक भी खुद को खड़ा नहीं कर सके। हाट-बाजार में रुपए-दो रुपए का सामान बेचकर भला कोई कौन से टर्न ओवर को टच कर लेगा?

 वक्त बुरा हो तो अपने भी साथ छोड़ते हैं। हालांकि मुझे नहीं पता कि वे गांव में अकेले क्यों थे और उनका परिवार शहर में क्यों जा बसा था? उन्हें रुपए-दो रुपए कमाने की जरूरत क्यों थी? बस्ती वालों को उनकी हालत का कितना अंदाजा था? उनके पड़ौसी कौन थे? क्या कोई नाते-रिश्तेदार भी थे? थे तो कभी आते-जाते थे या सबने बिल्कुल ही अकेला छोड़ दिया था? जिस पार्टी को सींचने में रामगोपाल के पसीने की बूंदें भी लगी थीं, उसकी शाखों और शिखरों पर चमके कितने किस्मत के धनी महानुभाव रामगोपाल के बारे में कितना जानते थे? जानते भी थे या नहीं? जानते ही होंगे। वर्ना उनके मरने के बाद एक ट्वीट कोई क्यों करता?

  सब उन्हें प्यार से उस्ताद कहकर पुकारते थे-उस्ताद राम-राम…उस्ताद क्या हाल हैं…। वे दोनों हाथ जोड़कर मुस्कराकर जवाब देते। हालचाल पूछते। कभी अंदाजा ही नहीं लगता था कि इस आदमी का सही में क्या हाल है? वे पार्टी के संघर्ष के दिनों में बेहद आक्रामक कार्यकर्ता थे। सरजू महाराज की होटल में ऑपरेशन ब्लू स्टार की गहमागहमी के दिनों में उस्ताद की आवाज सबसे अलग होती थी। सिख विरोध दंगों में वे खुलकर दिल्ली की मुखालफत करते थे। महाराष्ट्र में शिवसेना का उभार उनमें ऊर्जा भरता था। अटल-आडवाणी उनमें उम्मीदें जगाते थे। राम मंदिर आंदोलन उन्हें राम राज्य की स्थापना का पहला पड़ाव मालूम होता था। वे मेहनत से अपनी रोटी कमाते थे और इसी विचार के लिए जमीन पर जूझते रहते थे। चुनावों के समय सब काम छोड़कर पार्टी के काम में लगते थे। इस तरह ऐसे रामगोपालों के बूते पर ही पार्टी ने निचले स्तर पर अपनी जड़ें जमाई थीं। जब जड़ें जम गईं तो राम गोपाल जड़ों में ही रह गए। हर कहीं सत्ता की शाखों पर पंख फड़फड़ाने के लिए अलग प्रजाति प्रकट हुई।

 मंडल स्तर पर ऐसे नेताओं ने अवतार लिए जिन्होंने पंचायती राज के तीनों स्तरों पर अपने परिवार के पट्‌टे लिखाए। खदानें खोदीं। कारोबार फैलाए। नामी नेता बन गए। जो राजधानियों से बेहतर कनेक्टीविटी कायम कर पाए, वे लाल बत्तियों में जा सरके। सबके राजयोग प्रबल थे। औसत बुद्धि, साधारण हैसियत और शुद्ध रूप से अपने लाभ-शुभ के लिए राजनीति में आने वालों ने पंद्रह साल का राजयोग गले तक भरकर भोगा और पंद्रह दिन भी याद रख सकने लायक समाज को कुछ बेहतर नहीं दिया। उनका उसूल था-काम कम बातें ज्यादा! राजनीति में आने के फायदे क्या हैं, यह उनकी कारोबारी हैसियत से पता चलेगा। खदानें, क्रशर, डेयरी, रियल इस्टेट और सहकारी सोसायटियों से लेकर ऊपर के तमाम पदों पर उनकी आसान पहुंच से ज्ञात होगा कि राजनीति में कामयाबी क्या होती है? जिनके करीबियों की पांच-पचास करोड़ की कंपनियां पचास हजार करोड़ पार कर गईं!

 काश, मैं रामगोपाल नाम के इस बेदाग दामन वाले सीधे-सरल इंसान के जिंदा रहते उन पर कुछ लिख पाता। मैं सालों पहले गांव छोड़कर पढ़ाई के लिए बाहर निकला था। पढ़ाई के बाद वैसा कोई काम गांव में था नहीं। इसलिए इस शहर उस शहर में जाना पड़ा। फिर रामगोपाल भी साल में दो-एक बार की ग्राम परिक्रमा में दर्शन मात्र के लिए कभी सामने आए, कभी नहीं आए। जब भी आए तो पता नहीं क्यों मैं उनके चेहरे पर कोई कहानी क्यों नहीं पढ़ पाया और पता नहीं होली के दिन उनकी याद क्यों आ गई? मेरा उनसे कोई रिश्ता नहीं था। न सियासी, न कारोबारी। उनकी याद आई तो लगा कि अगर वे कभी श्यामला हिल्स या चार इमली तक आ पाते तो तय है कि लोग उन्हें देखकर नानाजी देशमुख और दीनदयाल उपाध्याय को ही याद करते। वे बिल्कुल आम इंसान के सही नुमाइंदे होते, जैसा किसी को भी होना चाहिए। सियासत की सबसे निचली पायदान पर वे बिल्कुल उसी गोत्र के थे। एक ऐसा फूल जो एक बदहाल बगीचे में मुरझा गया।

 पंद्रह साल कम नहीं होते। रामगोपाल उस्ताद ने अपने उसी गांव और गांव की उन्हीं गलियों से उन सबको सत्ता की महायात्रा करते हुए देखा, जो नामालूम हैसियत से सियासत में आए थे। वे तकदीरों में राजयोग लिखाकर लाए थे। इसलिए पूरे पंद्रह साल तक राजमार्गांे की चहल-पहल के केंद्र में जननायकों की पिनक में घूमते रहे। फिर एक दिन शाम ढल गई।  उस्ताद की जिंदगी की शाम भी और क्षण भंगुर सत्ता की शाम भी। इन पंद्रह सालों में किसी ने पलटकर उस्ताद की सुध नहीं ली। उन्हें इज्जत से जीने लायक आधार देने में भी किसी ने दिलचस्पी नहीं ली। कामयाब लीडरों की नजर में वे नाकामी की एक कहानी थे। उनके पास था ही क्या? गुरूवार के हाट बाजार या धूल उड़ाती गुप्ताजी की खटारा बसों में कांच-कंघा बेचकर कमाने वाले एक आम आदमी में ऐसा क्या होता, जो बड़े नेता उनके पास कभी आते? मुझे नहीं पता ऐसे कितने रामगोपाल गुमनाम मौत मरे होंगे, जिनका सच्चा तर्पण अभी शेष है। हर भव्य और ऊंची इमारत की अंधेरी नींव में अनगिनत पत्थर पड़े होते हैं। रामगोपाल उस्ताद भी उनमें से ही एक थे।

सिर्फ नेताओं से ही कोई उम्मीद क्यों? बीस हजार आबादी की जिस बस्ती में वे मरे, वहां साल भर पहले ही एक बड़ा धार्मिक जलसा हुआ। मुनि महाराज के इशारे पर लाखों की बोलियां लगाने वाले सेठ वहां इकट्‌ठा थे। मैंने सुना कि एक सामान्य से दुकानदार ने भी पचासेक लाख की बोली ठोककर अपनी हैसियत का परिचय दिया था। जिस पांडाल में इस कल्याणकारी जलसे की रौनक बरसी, उसके सामने ही किसी देहाती बस में उस्ताद कांच-कंघा बेचकर चाय-समोसे की अपनी खुराक का इंतजाम कर रहे होंगे। उस्ताद की उपेक्षा या गुमनामी की मौत के पाप में उनकी अपनी पार्टी वाले ही भागीदार नहीं हैं। मैं भी हूं, जो मरने के बाद लिखने बैठा हूं और वे सब जो अपने मोक्ष के लिए बड़ी-बड़ी बोलियां लगाकर वापस तिजोरियां संभालकर बैठ गए!

 मेरे उस्ताद, मेरे ये अल्फाज मैं मिट्‌टी में मिल चुकी आपकी राख को नम आंखों से अर्पित करता हूं!

6 जुलाई 2018 को उस्ताद का निधन हुआ था और उसके कुछ ही महीनों बाद ही मध्य प्रदेश से भाजपा सरकार चली गई। 

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छः पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com