राजनीति
मध्य प्रदेश चुनाव- 10 डाटा बिंदुओं से समझें परिणाम

इस चुनाव में भाजपा की हार के प्रमुख कारण रहे- नगरीय क्षेत्रों में विधायक स्तर पर रही एंटी-इनकंबेंसी तथा आदिवासी इलाकों में खराब प्रदर्शन।

हाल ही में संपन्न हुए मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस तथा भाजपा के बीच क़रीबी मुक़ाबला रहा जिसमें अंतत: कांग्रेस ने 114  सीटें जीतकर सरकार बनाई। यह आँकड़ा पूर्ण बहुमत के आँकड़े से केवल दो सीटें कम है।

इस कड़े मुक़ाबले को निम्न 10 बातों के आधार पर समझा जा सकता है।

  1. आदिवासी समुदायों ने भाजपा के विरुद्ध मत डाले। यह भाजपा की हार का एक प्रमुख कारण रहा। बात दें कि मध्य प्रदेश में 22 प्रतिशत जनसंख्या आदिवासियों की है।
  • सामान्य सीटें- कुल 148 (भाजपा- 74, बसपा- दो, कांग्रेस- 68, निर्दलीय- तीन, समाजवादी पार्टी- एक)
  • अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित सीटें- कुल 35 (भाजपा- 18, कांग्रेस- 17)
  • अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित सीटें- कुल 47 (भाजपा- 17, कांग्रेस-29, निर्दलीय- एक)

2. अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित जिन 29 सीटों पर कांग्रेस जीती है उनमें से 25 सीटों पर जीत का अंतर 10,000 से अधिक रहा है, जिसने बड़े अंतर पैदा किए हैं।

3. दस सीटों पर हार-जीत का अंतर 1,000 वोटों से कम रहा जिनमें-
– भाजपा ने 3 सीटें जीतीं-
# मंदसौर लोकसभा क्षेत्र की जावरा सीट (511 वोट)
# सागर लोकसभा क्षेत्र की एससी आरक्षित बीना सीट (632 वोट)
# गुना लोकसभा क्षेत्र की कोलारस सीट (720 वोट)

– कांग्रेस ने निम्न 7 सीटों पर 1,000 वोटों से कम अंतर से जीत दर्ज की-
# ग्वालियर लोकसभा क्षेत्र की ग्वालियर दक्षिण सीट (121 वोट)
# मंदसौर लोकसभा क्षेत्र की सुवासरा सीट (350 वोट)
# जबलपुर लोकसभा क्षेत्र की जबलपुर उत्तर सीट (578 वोट)
# खजुराहो लोकसभा क्षेत्र की राजनगर सीट (732 वोट)
# दमोह लोकसभा क्षेत्र की दमोह सीट (798 वोट)
# राजगढ़ लोकसभा क्षेत्र की ब्यावरा सीट (826 वोट)
# खरगोन लोकसभा क्षेत्र की एसटी आरक्षित राजपुर सीट (932 वोट)

4. ग्वालियर दक्षिण, जबलपुर उत्तर और दमोह सीट भाजपा का गढ़ हुआ करती थीं किंतु इस बार तीनों जगह कुल 1651 वोटों से भाजपा हारी है।

  • ग्वालियर दक्षिण सीट से भाजपा की बागी पूर्व महापौर समीक्षा गुप्ता खड़ी हुई थीं तथा उन्हें 30,745 वोट मिले।
  • जबलपुर उत्तर से राज्य के भारतीय जनता युवा मोर्चा के पूर्व अध्यक्ष धीरज पटेरिया, भाजपा के बागी प्रत्याशी थे तथा उन्हें 29,479 वोट मिले।
  • वर्ष 1990 से दमोह सीट का प्रतिनिधित्व जयंत मलैया कर रहे थे, अब यहाँ एक अलग नाम की आवश्यकता थी किंतु भाजपा ने उस पर ध्यान नहीं दिया। यहीं पर भाजपा के पुराने नेता रामकुमार कुसुमरिया बगावत कर गए थे तथा उन्हें कुल 1,133 वोट मिले और वे 335 मतों के अंतर से जीते।

रामकुमार कुसुमरिया नज़दीकी पथरिया सीट से भी प्रत्याशी थे, यह सीट भाजपा से बसपा ने 2,205 वोटों के अंतर से जीत ली। कुसुमरिया को कुल 8,755 वोट मिले।

यदि समीक्षा गुप्ता, धीरज पटेरिया तथा रामकुमार कुसुमरिया बगावत नहीं करते तो भाजपा 111 से 113 तक सीटें जीत सकती थी वहीं बसपा एक सीट तक सीमित हो सकती थी।

5. केवल पाँच सीटों पर जीत का अंतर 50,000 से अधिक रहा-

  • ग्वालियर लोकसभा की एससी आरक्षित डबरा सीट जिस पर कांग्रेस की इमरती देवी ने 57,446 वोटों से जीत दर्ज की है।
  • विदिशा लोकसभा क्षेत्र की बुधनी सीट जहाँ भाजपा के शिवराज सिंह चौहान ने 58,999 वोटों से जीत दर्ज की है।
  • सीधी लोकसभा क्षेत्र की चितरंगी सीट जहाँ भाजपा के अमर सिंह ने 59,248 वोटों से जीत दर्ज की है।
  • धार लोकसभा की कुक्षी सीट जहाँ कांग्रेस के सुरेंद्र सिंह बघेल ने 62,930 वोटों से जीत दर्ज की है।
  • इंदौर लोकसभा क्षेत्र की इंदौर-2 सीट जहाँ भाजपा के रमेश मेंदोला ने 71,011 वोटों से जीत दर्ज की है।

गौरतलब है कि इसी सीट से 2013 में भी रमेश मेंदोला ने सर्वाधिक वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी।

6. यदि लोकसभा सीटों के संदर्भ में कुल वोट देखें जाएँ तो भाजपा 17 तथा कांग्रेस 12 सीटें जीत सकती है।

7. लोकसभा सीटों के संदर्भ में निम्न सीटों से एकतरफ़ा परिणाम आए-

  • रीवा (सभी आठ सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की है)
  • छिंदवाड़ा (सभी सात सीटों पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की है)
  • ग्वालियर (आठ में से सात सीटें कांग्रेस के खाते में गई हैं)
  • मंदसौर (आठ में से सात सीटें भाजपा के खाते में गई हैं)
  • मुरैना (आठ में से सात सीटें कांग्रेस के खाते में गई हैं)
  • सागर (आठ में से सात सीटें भाजपा के खाते में गई हैं)
  • सीधी (आठ में से सात सीटें भाजपा के खाते में गई हैं)

8. शहरी क्षेत्र जो भाजपा का गढ़ माने जाते थे, वहाँ भाजपा को कुछ जगह हार का सामना करना पड़ा है।
राज्य के पाँच सबसे बड़े शहरों में भाजपा को कुछ हद तक नुकसान हुआ है। अभी यह पाँचों लोकसभा सीट भाजपा के पास हैं।

  • भोपाल (भाजपा- पाँच सीटें, कांग्रेस- तीन सीटें)
  • ग्वालियर (भाजपा- एक सीट, कांग्रेस- सात सीटें)
  • इंदौर (भाजपा- चार सीटें, कांग्रेस- चार सीटें)
  • जबलपुर (भाजपा- चार सीटें, कांग्रेस- चार सीटें)
  • उज्जैन (भाजपा- तीन सीटें, कांग्रेस- पाँच सीटें)

9. राजधानी भोपाल की दो प्रमुख सीटें, भोपाल मध्य तथा भोपाल दक्षिण-पश्चिम भाजपा हार गई है। 2008 तथा 2013 में दोनों ही सीटें भाजपा ने जीती थीं। यह सीटें 2008 में ही बनी थीं।

10. चुनाव में केवल भाजपा ने ही अपनी पकड़ वाली सीटें नहीं हारी हैं बल्कि कांग्रेस को भी हार झेलनी पड़ी है। 2013 के चुनावों में कांग्रेस ने 59 सीटें जीती थीं, उनमें से 27 सीटें इस बार कांग्रेस हार गई है। ऐसी सीटें जो 2013 में कांग्रेस के पास थीं तथा इस बार कांग्रेस ने हार झेली है, उनका लोकसभा क्षेत्रों के साथ विवरण इस प्रकार है-
अमरपाटन (सतना लोकसभा सीट), अतेर (भिंड), बड़वानी (खरगोन), बासौदा (विदिशा), ब्यौहारी (सीधी), भगवानपुरा (खरगोन), चितरंगी (सीधी), चुरहट (सीधी), गुढ़ (रीवा), हरदा (बैतूल), इछावर (विदिशा), जबेरा (दमोह), जतारा (टीकमगढ़), केवलारी (मंडला), खरगापुर (टीकमगढ़), कोलारस (गुना), मैहर (सतना), मंडला (मंडला), मऊगंज (रीवा), नागौद (सतना), नरसिंहगढ़ (राजगढ़), परसवाड़ा (बालाघाट), पाटन (जबलपुर), पवई (खजुराहो), सिरोंज (सागर), विजयपुर (मुरैना), विजयराघवगढ़ (खजुराहो)।

नगरीय क्षेत्रों में विधायक स्तर पर रही एंटी-इनकंबेंसी तथा आदिवासी इलाकों में ख़राब प्रदर्शन इस चुनाव में भाजपा की हार का प्रमुख कारण रहे।

अंत में एक तथ्य और: वर्ष 1967 से लेकर अभी तक, जिस पार्टी ने खरगोन जीता है, वही पार्टी भोपाल में राज करती आई है, इस बार खरगोन कांग्रेस ने जीता है।

आशीष चंदोरकर सार्वजनिक नीतियों, राजनीति व समसामायिक मुद्दों पर लिखते हैं। वे @c_aashish के माध्यम से ट्वीट करते हैं।