राजनीति
मध्य प्रदेश 2018: जहाँ कांग्रेस ‘घर वापसी’ की उम्मीद कर रही है, वहीं भाजपा गुजरात दोहराने का लक्ष्य रख रही है

प्रसंग
  • कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर को भुनाने की उम्मीद कर रही है क्योंकि भाजपा पिछले 15 साल से सत्ता में है।
  • हालांकि, चौहान और मोदी को नाथ, सिंधिया और सिंह, जो शाही राजनेताओं के रूप में देखे जाते हैं, की तुलना में बड़े जननेता के रूप में देखा जाता है।

छत्तीसगढ़ और राजस्थान चुनावों के साथ-साथ मध्यप्रदेश में राज्य चुनाव नवंबर 2018 में होने हैं। जहाँ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) घर वापसी की उम्मीद कर रही है, वहीं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में लगातार चौथी जीत का लक्ष्य रख रही है।

कर्नाटक में असफलता के बाद भाजपा के लिए यह चुनाव जीतना जरूरी है। वर्ष के अंत में होने वाले चुनावों को लोकसभा चुनाव 2019 का सेमीफाइनल कहा जा रहा है। मध्य प्रदेश संसद में 29 सदस्य भेजता है और यह 2019 के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि 2014 के आम चुनाव में पार्टी ने 29 सीटों में से 27 सीटें जीती थीं। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कोई भी नुकसान एक गलत संकेत देगा।

द्विध्रुवीय प्रतियोगिता

मध्यप्रदेश ने कांग्रेस और भाजपा के मध्य एक दंगल के साथ तत्वतः एक द्विध्रुवीय प्रतियोगिता देखी है। कई पड़ोसी राज्यों के विपरीत, छोटे या क्षेत्रीय दलों को यहाँ राज्य चुनावों में ज्यादा सफलता नहीं मिली है। सुंदर लाल पटवा के नेतृत्व में, राम मंदिर आंदोलन के परिणामस्वरूप 1990 में राज्य में पहली भाजपा सरकार का गठन हुआ था। हालांकि, यह केवल 1993 तक ही टिक सकी क्योंकि सरकार को बर्खास्त कर दिया गया था। कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में वर्ष 1993 से 2003 तक राज्य को शासित किया। वर्ष 2000 में दीर्घकालिक मांग का सम्मान करते हुए राज्य को विभाजित किया गया और छत्तीसगढ़ का निर्माण किया गया।

विभाजन के बाद 2003 में आयोजित हुए पहले चुनाव में भाजपा ने तेजतर्रार नेता उमा भारती के नेतृत्व में आसान जीत हासिल की। 2005 में, नेतृत्व में परिवर्तन किए गये और चौहान मध्यप्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने। उनके नेतृत्व में भाजपा ने 2008 में और 2013 में चुनाव जीते।

क्षेत्रीय दल अपनी छाप छोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अभी तक कोई सफलता नहीं प्राप्त हुई

1990 के दशक के आरंभ से बहुजन समाज पार्टी (बसपा), केवल उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्रों में और 6 से 7 प्रतिशत की औसत वोट हिस्सेदारी के साथ राज्य के तीसरे सबसे बड़े खिलाड़ी के रूप में उभरी है। समाजवादी पार्टी (सपा) ने भी 2 से 3 प्रतिशत की औसत वोट हिस्सेदारी के साथ अच्छी उपस्थिति प्रदर्शित की है। हालांकि पिछले दो चुनावों में इसका प्रभाव काफी कम हो गया है। 2003 में जहाँ सपा को सात सीटें मिलीं, वहीं बसपा ने 2008 में इतनी ही सीटें हासिल कीं लेकिन 2013 में यह चार सीटों पर सिमट गयी।

भाजपा से मुकाबला करने के लिए कांग्रेस महागठबंधन (एमजीबी) बनाने के विकल्प तलाश रही है और बसपा एवं सपा के साथ बातचीत कर रही है। 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 44.9 प्रतिशत और कांग्रेस ने 36.4 प्रतिशत वोट हिस्सेदारी दर्ज की थी। यदि कांग्रेस, बसपा और सपा ने एक साथ चुनाव लड़ा होता, तो भाजपा और महागठबंधन के बीच का अंतर घटकर 1 प्रतिशत रह गया होता।

कांग्रेस को सत्ता-विरोधी लहर से फायदा मिलने की उम्मीद है

कांग्रेस किसी भी प्रकार की सत्ता-विरोधी लहर, जो 15 वर्षीय सरकार के खिलाफ उठना स्वाभाविक है और गुजरात इसका उपयुक्त और ताजा उदाहरण है, का लाभ उठाकर वापसी करने की उम्मीद कर रही है। कांग्रेस कृषि संकट, किसान आत्महत्या, महिलाओं के खिलाफ अपराध और राज्य का औसत स्वास्थ्य राष्ट्रीय स्वास्थ्य के औसत से कम होने के सूचकों पर भाजपा सरकार पर निशाना साध रही है। कांग्रेस रणनीतिकार सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटी के सर्वे द्वारा उत्साहित हैं, जो कहता है कि कांग्रेस 2018 में जीत जाएगी। हालांकि, सर्वे में नमूने का आकार केवल 980 है और इसलिए, मेरी राय में परिणाम गंभीरता से नहीं लिए जाने चाहिए।

चौहान और मोदी फैक्टर से भाजपा को जीत की उम्मीद

भाजपा चौहान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास के ट्रैक रिकॉर्ड के जरिए जीतने की उम्मीद कर रही है। चौहान के शासन में मध्यप्रदेश ने उत्कृष्टता हासिल की है, विशेष रूप से आर्थिक और सामाजिक मोर्चों पर। क्रिसिल के अनुसार गुजरात (2012-2017) के बाद यह दूसरा सबसे तेजी से वृद्धि करता हुआ राज्य (राष्ट्रीय औसत 6.9 प्रतिशत वृद्धि दर के मुकाबले 8.1 प्रतिशत संयुक्त वृद्धि दर) है और इसने कुख्यात बीमारू टैग को सफलतापूर्वक हटाने के अलावा देश में सबसे ज्यादा कृषि विकास दर दर्ज की है। मध्य प्रदेश को 2017 में कुल निवेश का 16.4 प्रतिशत निवेश प्राप्त हुआ और यह महाराष्ट्र के बाद दूसरे स्थान पर रहा।

कांग्रेस में गुटबाजी से बीजेपी को लाभ

जहाँ भाजपा चौहान की लोकप्रियता और लोगों के साथ उनके उल्लेखनीय जुड़ाव पर अपना दांव खेल रही है, वहीं कांग्रेस ने अपने पुराने अनुभवी दिग्गजों, प्रदेश कांग्रेस कमेटी (पीसीसी) अध्यक्ष कमलनाथ, अभियान समिति के अध्यक्ष और युवा आइकन ज्योतिरादित्य सिंधिया और समन्वय प्रमुख एवं पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के संयुक्त नेतृत्व में एकजुट लड़ाई लड़ने की तैयारी की है।

कमलनाथ के इस साल की शुरुआत में पीसीसी प्रमुख बनने के बाद वह मीडिया से सुर्खियां बटोरने में सक्षम रहे और ऐसा लगा कि पार्टी इस बार भी भाजपा को कड़ी चुनौती दे सकती है। नेताओं ने शुरू में एक संयुक्त प्रदर्शन भी किया, लेकिन पार्टी और संगठनात्मक ढांचे के भीतर गुटबाजी की जड़ें बहुत गहरी हैं। मुख्यमंत्री कौन होगा इसके लिए नाथ और सिंधिया के समर्थकों के बीच सोशल मीडिया और पोस्टर युद्ध शुरू हो चुका है। पूर्व पीसीसी प्रमुख अरुण यादव भी नाराज मालूम पड़ते हैं। ये सभी इस तथ्य को इंगित करते हैं कि राज्य में बड़े कांग्रेस नेता अपने स्वयं के एजेंडे के साथ चल रहे हैं।

मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार पर सस्पेंस

जैसा कि भारत में चुनाव प्रेसिडेंशियल शैली में परिवर्तित हो गए हैं, जिसमें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार ना घोषित करना कांग्रेस पार्टी की संभावनाओं को नुकसान पहुंचा सकता है। 2013 के लिए सीएसडीएस के एक चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण में, 44 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा था कि यदि कांग्रेस मध्य प्रदेश में अपने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम घोषित करेगी तो कांग्रेस को फायदा होगा।

अंत में, यह पूरी लड़ाई कांग्रेस के कई चेहरों के खिलाफ भाजपा के एक चेहरे की लड़ाई है। चौहान एक सरल नेता हैं और लोकप्रियता के मामले में प्रधानमंत्री मोदी के बाद यकीनन दूसरे स्थान पर हैं। उनके पास एक नम्र, व्यावहारिक व्यक्ति होने के साथ-साथ किसानपुत्र होने की छवि है। नाथ, सिंधिया और सिंह की तिकड़ी में कॉर्पोरेट रॉयल्टी की एक छवि है। एक तरह से, चुनावी जंग मिट्टी से जुड़े किसानपुत्र और अमीर घरानों में पैदा हुए तथा वातानुकूलित कमरों में रहने वाले नेताओं के बीच है। यह कई मायनों में मोदी-गांधी की कामदार बनाम नामदार जैसी प्रतियोगिता है। वास्तव में यह एक दिलचस्प लड़ाई है!

दिव्या भान से इनपुट के साथ

अमिताभ तिवारी एक भूतपूर्व कॉर्पोरेट एवं निवेश बैंकर हैं जो अब राजनीति और चुनावों के लिए अपनी अभिलाषा का अनुसरण कर रहे हैं। व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं। वह @politicalbaaba पर ट्वीट करते हैं।