राजनीति
गले मिलने और आँख मारने की नाटकीयता – नए महागठबंधन की उम्मीदों को झटका

प्रसंग
  • अविश्वास प्रस्ताव पर समीक्षा में एक एकलौते विषय यानी 2019 लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन की गणित पर तीन बिन्दुओं का अभाव था।
  • प्रधानमंत्री ने भी झलक दिखाई कि 2019 लोकसभा चुनाव की दौड़ में भाजपा की मुख्य रणनीति क्या हो सकती है।

20 जुलाई को, नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने पहले ‘अविश्वास प्रस्ताव’ का सामना किया। कार्यालय में यह सरकार अपने पांचवें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। एक विपक्ष द्वारा एक सत्तारूढ़ सरकार के लिए अविश्वास व्यक्त करने का यह 27 वां अवसर था और 2003 के बाद से पहला। पिछली बार इसी जगह पर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई अपने फ्लोर टेस्ट में आसानी से पास हो गए थे और शुक्रवार को भी विपक्ष के लिए यही परिणाम रहा।

भारतीय जनता पार्टी की पूर्व सहयोगी और केंद्र सरकार में साझीदार तेलुगू देशम पार्टी (टीडीएम) द्वारा प्रस्तावित इस प्रस्ताव को राहुल गांधी की अगुवाई में कॉंग्रेस का मुखर समर्थन प्राप्त था। लोकसभा में यह 126 वोटों के मुक़ाबले 325 वोटों से पराजित हुई। लेकिन बहस के दौरान कॉंग्रेस अध्यक्ष ने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी के प्रति प्यार और सम्मान के स्पष्ट हाव-भाव में प्रधानमंत्री को गले लगाया।

अगली सुबह अखबारों की सुर्खियों का अनुमान लगाया जा सकता था। गांधी ने परिपक्वता दिखाई और दिलों को जीत लिया। अंततोगत्वा उन्होंने अपनी दिलेरी साबित की। हांलाकि वे अपनी स्क्रिप्ट के मुताबिक नहीं बोल पाए , गले लगने के बाद उनका बर्ताव को भारत की युवा संवेदनशीलताओं के चंचल प्रतिबिम्ब के रूप में वर्णित किया गया है। राजनीतिक परिपक्वता के साथ गाँधी के नवीनतम स्पर्श को प्रमाणित करने हड़बड़ी में अविश्वास प्रस्ताव पर समीक्षा में एक विषय यानी 2019 लोकसभा चुनावों के लिए गठबंधन की गणित पर तीन बातों का अभाव था।

इस प्रस्ताव को मोदी सरकार के खिलाफ महागठबंधन की ताकत का प्रदर्शन कहा गया। सोनिया गाँधी ने आत्मविश्वास के साथ दावा किया की कांग्रेस के पास संख्याएं थीं, यहाँ तक कि लोकसभा सभापति सुमित्रा महाजन द्वारा प्रस्ताव के नोटिस को बिना हंगामे के स्वीकार कर लिया गया था।

कांग्रेस की अगुवाई में विपक्ष ने अपने पक्ष में 126 वोट जुटाए। कुछ पार्टियाँ निश्चित रूप से मोदी विरोधी और भारतीय जनता पार्टी विरोधी हैं। विपक्ष के पास वोटों की संख्या कम से कम 144 (तालिका देखें) होनी चाहिए थी। इसके बजाय उन्हें वोट मिले सिर्फ 126।

18 वोटों का अंतर क्या बयां करता है? हमें कुछ चीजें पता हैं। सबसे वरिष्ठ कांग्रेसी सांसद मध्य प्रदेश में आगामी चुनावों के कारण एक पंचायत सम्मलेन का बहाना बनाकर अनुपस्थित रहे। उन्हें खुले तौर पर अविश्वास प्रस्ताव का मजाक उड़ाया और कहा कि उनके अनुभव के 38 वर्ष उन्हें यह बताने के लिए पर्याप्त थे कि यह एक समय की बर्बादी थी। कुछ मीडिया रिपोर्टों ने कहा कि कैराना से राष्ट्रीय लोक दल की सांसद तबस्सुम हसन ने गलती से सरकार के पक्ष में वोट कर दिया। तृणमूल कांग्रेस के कुछ सांसद पश्चिम बंगाल में होने वाली रैली के व्यवस्थापन के कारण अनुपस्थित रहे।

इन सभी स्पष्टीकरणों को यदि सम्मिलित भी कर लिया जाए फिर भी यह लगता है कि एक अच्छी खासी संख्या में, संभवतः दहाई के आंकड़े में, सांसदों ने महागठबंधन के खिलाफ और मोदी सरकार के समर्थन में वोट किया। गाँधी अपने ही समूह को एक साथ रखने में नाकाम रहे। वह अपने पूरे समूह को दिल्ली नहीं बुला सके, उनके लिए वोट करने को तो भूल जाइये।

निस्संदेह रूप से, महागठबंधन के दो स्तंभों बहुजन समाज पार्टी और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के पास कोई भी सांसद नहीं है। फिर भी मोदी विरोधी सांसदों द्वारा प्रधानमंत्री को खुलकर वोट करना, पार्टी नेताओं की अवहेलना करना और लोक सभा से अयोग्यता का जोखिम उठाना गाँधी के नेतृत्व में अविश्वास प्रस्ताव का एक बड़ा शो है।

दूसरा, कहानी भारतीय जनता पार्टी की ओर पलट गयी। सरकार 325 वोट प्राप्त करने में कामयाब रही। शिवसेना से अलग हो जाने के बाद राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक गठबंधन (एनडीए) की ताकत कम हो गयी थी। लेकिन सरकार अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) और कई सारे क्षेत्रीय दलों द्वारा वोट प्राप्त करते हुए 325 के आंकड़े तक पहुँच गयी। इसके अतिरिक्त, बीजू जनता दल (बीजेडी) ने कार्यवाही में भाग ही नहीं लिया और प्रस्ताव प्रस्तावित होने से पहले से बाहर चला गया।

भावी गठबन्धनों के लिए एक बड़े आश्चर्य में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) की दरियादिली के साथ सराहना की और इसके सदस्य वोट विभाजन से पहले बाहर चले गये।

ऐआईएडीएमके, बीजेडी और टीआरएस के नेता लगातार मोदी सरकार की आलोचना करते रहते हैं। जबकि उन्होंने कांग्रेस और राहुल गाँधी के साथ न खड़े होने का फैसला किया और कुछ ने तो सरकार के पक्ष में वोट किया। यह बीजेपी के लिए एक बड़ी जीत है तब जबकि मीडिया 2019 के महागठबंधन की रचना लिखने की तैयारी कर रही थी।

तीसरा प्रधान मंत्री ने एक आक्रामक भाषण दिया। एक तरफ जहाँ प्रधान मंत्री के द्वारा प्रयोग किये गए डेटा और भाषण कला के बारे में काफी लिखा गया लेकिन एक बिंदु के बारे में नहीं लिखा गया जिसमें कांग्रेस के संभावित सहियोगियों को कांग्रेस द्वारा करायी गयी बेज्जती की याद दिलाई गयी। मोदी ने कई नेताओं का नाम लिया जैसे कि पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुख़र्जी, शरद पवार और पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा, जिन्हें कांग्रेस द्वारा अपमानित किया गया या फिर राजनितिक अंत के बाद अलग कर दिया गया।

स्पष्टीकरण का यह तरीका बहुत ही रोमांचक है। प्रधान मंत्री ने पवार और देवगौड़ा के ऊपर तंज नहीं कसे जोकि महागठबंधन के दो स्तम्भ हैं। बल्कि उन्होंने उनके समर्थकों को यह दिखाया कि किस तरह से कांग्रेस ने उनके शीर्ष नेताओं की बेज्जती की है। प्रांतीय नेताओं का गौरव तभी तक है जब तक प्रान्त का गौरव कायम है और उनके मत की कोई पूछ है। उनके वोटरों को यह बता के कि उनके शीर्ष नेता उस पार्टी से गठबंधन कर रहे हैं जिसने पहले उनकी और उनके प्रान्त की बेज्जती की है। मोदी ने “वोटर और नेताओं” और “नेताओं और कांग्रेस” के बीच बने भरोसे को तोड़ने का प्रयास किया।

यह बीजेपी का 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए वार करने का एक तरीका हो सकता है। यह कांग्रेस के साथ गठबंधन करने वाली प्रांतीय पार्टियों को अलग करने की और बदले में लगातार प्रांतीय गौरव की लड़ाई लड़ने वाले वोटरों को राष्ट्रीय गौरव की लड़ाई में शामिल करने का प्रयास करते रहेंगे। बीजेपी इसमें कब और कितना सफल होती है यह तो वक़्त ही बताएगा लेकिन यह एक आक्रामक और दिलचस्प दांव है जो कि एकदम 2019 की तैयारी की शुरुआत में खेला गया है।

यह तो स्पष्ट है की बीजेपी राहुल गाँधी को राष्ट्रीय सत्ता चलाने लायक लीडर की श्रेणी में न आने देने का प्रयास करती रहेगी। बीजेपी राष्ट्रीय दलों को उनकी गरिमा का वास्ता देकर कि वे राहुल गाँधी को अपना नेता नहीं चुन सकते, महागठबंधन में दरार डालने का प्रयास कर रही है। और राष्ट्रीय प्रसिद्धि रखने वाले किसी नेता के बिना महागठबंधन की परिकल्पना मुश्किल है।

समाचार पत्रों ने राहुल गाँधी की स्पीच की तारीफ और नरेन्द्र मोदी का राहुल गाँधी से कायदे से गले न मिलना दिखाना उचित समझा। मुख्य बात जो सामने निकल के आई कि महागठबंधन की रचना में अभी वक़्त है और साथ ही एनडीए ने अपने पुराने और नए साथियों के लिए द्वार खोल रखे है।

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसे एक ट्वीट के माध्यम से बहुत कायदे से समझाया – कांग्रेस ने फिर से दिखावे पर ज्यादा जोर दिया और शासन कला की बरीकियों का ध्यान नहीं रखा।

आशीष चांदोरकर सार्वजनिक नीति, राजनीति और करंट अफेयर्स पर लिखते हैं. वे पुणे में रहते हैं। और @c_aashish से ट्वीट करते हैं।