राजनीति
मप्र 2019- कांग्रेस का निशाना उन पाँच जगहों पर जहाँ 1989 से भाजपा जीतती आई है

आशुचित्र- भाजपा चाहेगी कि लोकसभा चुनाव शीर्ष स्तर का चुनाव हो जो नरेंद्र मोदी के नाम और ट्रैक रिकॉर्ड के आधार पर चुनाव लड़ा जाए मगर कांग्रेस संभवतः भाजपा के गढ़ों में बड़े नामों को डालकर भाजपा की क्षमता को बांध देगी।

भारतीय जनता पार्टी 1989 से मध्य प्रदेश की राजनीति में प्रमुख हिस्सेदार रही है, जब राम जन्मभूमि आंदोलन के पीछे पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ी थी। 1991 के चुनाव को छोड़कर भाजपा को हर चुनाव में कांग्रेस से ज़्यादा सीटें मिली हैं।

इससे पहले कि राज्य दो भागों में विभाजित होकर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बँटा, राज्य में कुल 40 लोकसभा सीटें थीं। भाजपा ने 1989 में 27 सीटें (कांग्रेस- ​​8), 1991 में 12 सीटें (कांग्रेस- ​​26), 1996 में 27 सीटें (कांग्रेस- ​​8), 1998 में 30 सीटें (कांग्रेस- ​​10), और 1999 में 29 सीटें (कांग्रेस- 11) जीतीं थी।

द्विभाजन के बाद मध्य प्रदेश ने 11 निर्वाचन क्षेत्रों को छत्तीसगढ़ में स्थानांतरित करने के साथ 29 निर्वाचन क्षेत्रों को बनाए रखा। इस युग में, भाजपा ने 2004 में 25 सीटें (कांग्रेस- ​​4), 2009 में 16 सीटें (कांग्रेस- ​​12), और 2014 में 27 सीटें (कांग्रेस- ​​2) जीतीं। पिछले 30 वर्षों में, कांग्रेस केवल 1991 और 2009 में लोकसभा चुनावों में एक मज़बूत ताकत रही है।

वास्तव में ये पाँच सीटें हैंभिंड, भोपाल, दमोह, इंदौर और विदिशा जो भाजपा 1989 से कभी नहीं हारी है।

हालाँकि, मप्र भाजपा के लिए अपरिचित परिस्थितियों में 2019 का लोकसभा चुनाव होगा। दिसंबर 2018 में कांग्रेस ने भोपाल से भाजपा को बाहर कर दिया तथा राज्य चुनाव जीतने के बाद बहुजन समाज पार्टी (बसपा), समाजवादी पार्टी (सपा) और विधान सभा के निर्दलीय सदस्यों के समर्थन से सरकार बनाई। हालाँकि कांग्रेस ने 1998 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी लेकिन 1998 और 1999 के लोकसभा चुनावों में भाजपा का वर्चस्व रहा। इस बार कांग्रेस अपनी 2018 की राज्य पर अपनी जीत का लाभ उठाने की कोशिश कर रही है और तीन दशकों से भाजपा के साथ रही पाँच सीटों को निशाना बनाना चाहती है।

भिंड

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के डॉ भागीरथ प्रसाद ने कांग्रेस की इमरती देवी को आसानी से लगभग 1.6 लाख मतों से हराया। 2018 के राज्य चुनावों में चंबल क्षेत्र में कांग्रेस को भारी मात्रा में वोट मिले। भिंड में भी कोई अपवाद नहीं था हालाँकि भाजपा ने यहाँ दो विधानसभा सीटें जीतीं। ग्वालियर के डबरा से इमरती देवी ने भारीभरकम जीत हासिल की।

भिंड लोकसभा की विधानसभा सीटों में भाजपा पर तीन गुना ज़्यादा प्रहार हुआ। 2014 की टैली के आधार पर देखा जाए तो भाजपा को लगभग 11 प्रतिशत वोटों का नुकसान हुआ। लगभग 86 हजार नए मतदाताओं ने भी बहुजन समाज पार्टी या कांग्रेस को वोट दिया। मतदाता भी बड़े पैमाने पर भाजपा के खिलाफ हो गए।

अफवाहें हैं कि भाजपा अपने सांसद भागीरथ प्रसाद को चुनाव लड़ने का एक और मौका देने से इनकार करेगी। पूर्व सांसद अशोक अर्गल ने फिर से अपना दावा ठोक दिया है। कांग्रेस सीमा महंत को टिकट दे सकती है जो  कि स्थानीय इलाकों  में एक जानी मानी हस्ती हैं और छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ नेता चरणचंद महंत की संबंधी हैं।

इस सीट पर भी बसपा, सपा और विभिन्न मजबूत स्थानीय लोगों का बड़ा प्रभाव रहेगा। बहुत सारी बातें  उम्मीदवारों के चयन और पार्टियों के बीच हो रहे दलबदल  पर भी निर्भर करेगा।

भोपाल

2018 के राज्य चुनावों में भोपाल भाजपा के लिए एक बड़ा झटका साबित हुआ। पार्टी भोपाल दक्षिणपश्चिम और भोपाल सेंट्रल की सीटें कांग्रेस से हार गई। हालाँकि भाजपा ने विधानसभा मतों के आधार पर इस सीट को बरकरार रखा होगा लेकिन यह बहुत ही संकीर्ण जीत होगी जो 2014 के जीत से बहुत दूर है।

भोपाल के सांसद आलोक संजर को बहुत प्रभावशाली नेता नहीं माना जाता है फिर भी  वे इस सीट से चुनाव लड़ने के लिए एक बड़ा नाम बना सकते हैं। नरेंद्र तोमर जो कि वर्तमान केंद्रीय मंत्री और ग्वालियर के सांसद हैं उन्हें भोपाल में स्थानांतरित करने की बातचीत की जा रही है।

भाजपा के स्थानीय दिग्गज बाबूलाल गौर को इस बार गोविंदपुरा सीट से टिकट देने से इनकार कर दिया गया था। वह तब से कांग्रेस के साथ काम कर रहे हैं हालाँकि उनकी बहू ने सीट से चुनाव लड़ा और आराम से जीतीं।

दूसरी ओर कांग्रेस ने भोपाल से अपने राज्य लोकसभा अभियान की शुरुआत की। राहुल गांधी ने 9 फरवरी को भोपाल में एक रैली को संबोधित किया जिसमें राफेल सौदे का उपयोग करते हुए नरेंद्र मोदी सरकार पर अपने प्रथागत हमलों का शुभारंभ किया।

कांग्रेस को भी उम्मीदवार चयन समस्या का सामना करना पड़ता है। पार्टी ने 1989 से शुरू होने वाले आठ लोकसभा चुनावों में इस सीट से आठ अलगअलग उम्मीदवारों को मैदान में उतारा। पार्टी के लिए कोई निरंतरता नहीं रही है। हालाँकि कांग्रेस द्वारा करीना कपूर खान को भोपाल लाने की बातें हो रही हैं। उनके ससुर मंसूर अली खान पटौदी 1991 में कांग्रेस के उम्मीदवार थे लेकिन उस समय भाजपा के सुशील चंद्र वर्मा से हार गए थे।

दमोह

दमोह को 2018 में भाजपा द्वारा संकीर्ण रूप से हासिल किया गया। हालांकि इस लोकसभा क्षेत्र ने राज्य में हुए टैली के दौरान पासे पलट दिए।

डॉ रामकृष्ण कुसुमारिया जो कि भाजपा के दिग्गज नेता रह चुके थे उन्होंने राज्य चुनाव लड़ने के लिए टिकट लेने से इंकार कर दिया और अकेले ही दो निर्वाचन क्षेत्रों, दमोह और पथरिया से चुनाव लड़े। उन्होंने दोनों निर्वाचन क्षेत्रों में बीजेपी की हार के अंतर से अधिक मत हासिल किए। अगर उनके सभी वोट भाजपा की टैली में जुड़ जाते तो पार्टी राज्य की 111 सीटों पर होती जबकि कांग्रेस की 113 और बसपा की एक सीट पर सिमट जाती। वास्तविक टैली भाजपा के लिए 109 कांग्रेस के लिए 114 और बसपा के लिए दो सीटों पर समाप्त हुई।

कुसुमारिया अब राहुल गांधी की भोपाल रैली में कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। संभावना है कि वह लोकसभा के लिए कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में मैदान में होंगे। भाजपा के लिए अच्छी खबर यह थी कि इसने लगभग सभी वोटों को अपने पास बनाए रखा, हालाँकि अन्य सभी दलों ने अपनी टैली में सुधार किया। प्रहलाद पटेल जो कि मौजूदा सांसद हैं  उनको अपनी सीट बरकरार रखनी चाहिए लेकिन कुसुमिया उनपर भारी पद सकते हैं।

सीट का निर्धारण बसपा जो करती है उसके आधार पर किया जा सकता है। पार्टी राज्य में सभी सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है वह भी कांग्रेस या सपा की सहायता के बगैर।

इंदौर

सुमित्रा महाजन ने 1989 से आठ बार इंदौर से सीट जीती है। 2009 को छोड़कर  इंदौर लोकसभा में उनकी पकड़ बहुत मजबूत रही है। हालांकि उन्होंने 2014 में भी पद छोड़ने की इच्छा व्यक्त की थी लेकिन फिर उस वर्ष चुनाव लड़ने हेतु आगे बढ़ीं। वह 2014 से लोकसभा अध्यक्ष हैं।

यह देखते हुए कि 2018 में भाजपा इस लोकसभा की कुछ विधानसभा सीटें कांग्रेस से हार गई मुख्य रूप से स्थानीय सत्ता विरोध के कारण और यह संभव है कि भाजपा इंदौर से एक नए उम्मीदवार को मैदान में उतारे। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को चुनाव लड़ना चाहिए। अगर वह पार्टी की राजनीति में बने रहना चाहते हैं तो मौजूदा महापौर और विधानसभा की सदस्य मालिनी गौड़ एक और उम्मीदवार हो सकती हैं। विजयवर्गीय के विश्वासपात्र और विधायक रमेश मेंदोला भी विजयवर्गीय का स्थान ले सकते हैं।

भोपाल की तरह कांग्रेस के पास फिर से एक कठोर निर्णय लेना होगा। कांग्रेस के लिए 1989 से अब तक सात उम्मीदवार लोकसभा चुनाव लड़ चुके हैं। पार्टी अरुण गोविल को खड़ा कर सकती है जिन्होंने दूरदर्शन धारावाहिक में भगवान राम का किरदार निभाया था और रामायण स्थानीय इलाकों  में काफी प्रचलित है।

भाजपा ने 2018 में अपने अधिकांश वोटों को अपने कब्जे में कर लिया। लेकिन 2014 के बाद से 1.5 लाख नए मतदाताओं ने इंदौर में नामांकन किया है। भोपाल की तरह यह भी संभावना है कि पार्टी को उन पर पकड़ नहीं मिली है। कांग्रेस इन लाभों पर खुद को खड़ा करना चाहेगी।

विदिशा

अटल बिहारी वाजपेयी, शिवराज सिंह चौहान और सुषमा स्वराज वो नाम हैं जो पिछले तीन दशकों में विदिशा लोकसभा सीट से जीते हैं। भारत की विदेश मंत्री और मौजूदा सांसद सुषमा स्वराज पहले ही कह चुकी हैं कि वह फिर से लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगी।

सबसे तार्किक विकल्प तब पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हो सकते थे अगर वे राष्ट्रीय मंच पर जाते। इसके अलावा भाजपा किसी और को भी खड़ा कर सकती है जिससे उसकी सीट सुरक्षित बनी रहेगी 2018 में कांग्रेस की बड़ी बढ़त हासिल करने के बावजूद।

कांग्रेस के लिए पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह विकल्प हो सकते हैं। वह पिछली बार भी चुनाव लड़े थे लेकिन स्वराज से हार गए थे। गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का इस सीट पर कुछ प्रभाव है और कांग्रेस उनके साथ गठबंधन करके हासिल बहुत कुछ कर सकती है  और यह एक ऐसा गठबंधन होगा जो विधानसभा चुनाव एक साथ लड़ने के लिए तैयार नहीं था।

बहरहाल अब भी विदिशा में भाजपा का पलड़ा भारी रहेगा। पांच सीटों में से विदिशा और इंदौर अभी भी भाजपा के लिए सबसे सुरक्षित दाँव हैं।

भाजपा चाहेगी कि लोकसभा चुनाव शीर्ष स्तर का चुनाव हो और सब नरेंद्र मोदी के नाम और ट्रैक रिकॉर्ड के आधार पर चुनाव लड़े मगर कांग्रेस हर सीट पर अलग से लड़ने की कोशिश करेगी। कांग्रेस संभवतः भाजपा के गढ़ों में बड़े नामों को डालकर भाजपा की  क्षमता को बांध देगी।

आशीष चंदोरकर सार्वजनिक नीतियों, राजनीति व समसामायिक मुद्दों पर लिखते हैं। वे @c_aashish के माध्यम से ट्वीट करते हैं।