राजनीति
हिंदुत्व का तर्क- क्यों हिंदू धर्म की अत्यधिक विविधता के साथ जीवित रहना कठिन है

प्रसंग- हिंदू धर्म और अब्राहमिक धर्मों में अंतर समझना आवश्यक है।

चार्ली हेब्दो की हत्याएँ, सलमान रुशदी और सोमालियाई पूर्व मुस्लिम अयान हिरसी अली को जान से मारने की धमकियाँ, डच राजनेता पिम फॉरटुइन की हत्या और हाल ही में हिंदू समाज नेता कमलेश तिवारी की कथित इस्लामियों द्वारा हत्या में एक बात समान है- सिर्फ जिहादी ही नहीं, आम मुस्लिम भी धार्मिक चिह्नों को अत्यधिक गंभीरता से लेते हैं।

यह तब स्पष्ट हो गया जब एक आम टीवी व्यक्तित्व अब्दुल रज़ाक़ खान ने कमलेश तिवारी की हत्या की निंदा करने से मना कर दिया था। केवल शब्दों में भी करुणा नहीं दिखाई उसने। बिना अगर-मगर के हत्या की निंदा करने से मना करने को अब मुख्यधारा में स्वीकार्यता मिल गई है।

इस्लाम के प्रति हिंदुओं में यह गलतफहमी- जो कि आज भी तथाकथित सेक्युलर (धर्मनिरपेक्षतावादी) हिंदुओं में है- की जड़ भारत में दोनों समुदायों के बीच फूट है। यदि आप इस्लाम को नहीं समझेंगे तो इसके साथ शांति से नहीं रह सकेंगे।

इससे आगे यह होगा कि यदि आप इनके कुछ व्यवहार को अपना नहीं पाएँगे तो ये आपका आदर नहीं करेंगे। क्यों उन काफिरों का आदर किया जाए जो स्वयं अपने पवित्र चिह्नों का सम्मान नहीं करते हैं?

जब इस्लाम भारत में आया तो यह पूरी तरह गठित हो चुका था, न कि अन्य भारतीय धर्मों के साथ सह-विकसित होने के विचार से आया था। बहु-आस्थाएँ रखने वाले और अनेक परंपराओं में मानने वाले भारतीयों को इस नए धर्म का आगमन नहीं खला लेकिन यही दूसरी ओर से कभी सत्य नहीं हो सका, भले ही व्यवहारिक स्तर पर दोनों समुदायों ने कुछ हद तक एक दूसरे को स्वीकारा।

यही चीज़ रोम में हुई जब शुरुआती ईसाई और पैगन विश्वासों से धर्मांतरित होने वालों की संख्या बढ़ने लगी थी। अनेक भगवानों वाले रोमनों के क्राइस्ट नामक नए ईश्वर के आने से कोई समस्या नहीं थी लेकिन नौसिखिए ईसाइयों के लिए रोमन विश्वासों को स्वीकारना अभिशाप था।

ईसाइयों के लिए एक ही बात स्वीकार्य थी- अपने मत में रोमनों का धर्मांतरण। और मूल रूप से वही हुआ। यूनानी विश्वासों और तर्कों के वंशज होने वाले पश्चिमी मस्तिष्क का द्वारा ईसाइयत ने बंद कर दिया। (इसे इस पुस्तक में पढ़ा जा सकता है।)

आवश्यक बातें जो हिंदुओं को इन दोनों अब्राहमिक मतों के बारे में समझनी और आत्मसात करनी चाहिए, वे निम्नलिखित हैं-

पहली, दोनों ही धर्म एक विश्वास पर आधारित हैं, न कि आध्यात्मिक खोज पर। क्योंकि विश्वास किसी झूठी साबित होने वाली परिकल्पना पर आधारित नहीं हो सकता इसलिए इस विश्वास के लिए किसी भी खतरे को धर्म के लिए बड़े खतरे के रूप में देखा जाता है।

भारतीय धर्मों में ईश्वर व्यक्तिगत पूजा और रीति-रिवाजों के लिए हैं लेकिन मुख्य उद्देश्य मोक्ष का है जिसमें आध्यात्मिक सत्य की खोज की जाती है। ईश्वर में विश्वास केवल चेतना के उच्च स्तर पर पहुँचने में सहायता करता है। इसे कह सकते हैं कि ईश्वर वह शेरपा है जो आपको बेस शिविर तक ले जाता है और वहाँ से ज्ञान और सत्य के पहाड़ की चढ़ाई आपके आपने आप करनी है।

दूसरी, अब्राहमिक विश्वासों में व्यक्ति ईश्वर की सेवा करता है। वहीं भारतीय धर्मों में, विशेषकर हिंदू धर्म में ईश्वर लोगों के लिए हैं। यहाँ तक कि जैन और बौद्ध धर्म में उन्हें ईश्वर की आवश्यकता भी महसूस नहीं हुई। हिंदू परंपराओं में हम ईश्वर की सेवा इसलिए करते हैं ताकि वह हमारी सहायता कर सके।

ईष्ट देवता के सिद्धांत से हम अपने भगवान स्वयं चुनते हैं। हम अपने भगवानों की रक्षा वैसे करते हैं जैसे अपने बच्चों या बूढ़े माँ-बाप की। इसलिए जब कट्टरवादी मुस्लिम शासकों के हमले का खतरा मंदिरों पर मंडरा रहा था, तब हिंदुओं ने तीर्थस्थलों से मूर्तियों को निकालकर अपने संरक्षण में रखा था। (इसपर अधिक जानकारी के लिए पढ़ें।)

मूल विचार है कि ईश्वर का दायित्व है हमारी रक्षा करना न कि हमें उनकी रक्षा करनी है। इसलिए जब द्रविड़ एक्टिविस्ट राम या हनुमान के चित्रों पर चप्पलें बरसाते हैं, तब कम आक्रोश होता है। वहीं दूसरी ओर यदि कोई अब्राहमिक ईश्वरों या पैगंबरों के अपवित्रिकरण का प्रयास करता है तो स्थिति अलग होती है। अब्राहमिक मत में विश्वास रखने वालों को उनके ईश्वर और पैगंबरों की प्रशंसा के अलावा और कुछ स्वीकार्य नहीं है।

तीसरी, हमारे ईश्वर हमारा परिवार होते हैं। हम उनसे लड़ते हैं, उनसे प्रेम करते हैं, उनकी पूजा करते हैं, उनसे शिकायत करते हैं और कई बार अपने हित में परिस्थितियों को न देखकर उन्हें त्यागने की धमकी भी देते हैं। जब हम घर बदलते हैं तो अपने भगवानों को भी साथ ले जाते हैं, उसी तरह जैसे अपने बच्चों को।

अब्राहमिक मतों में ईश्वर हमसे ऊपर है जो हमें लगातार आँक रहा है और कठोर आज्ञाकारिता की अपेक्षा रख रहा है। इसमें ईश्वर की कतित गलती के लिए उसकी निंदा करने की कोई गुंजाइश नहीं है।

चौथी, हिंदू धर्म में विचार नीचे से ऊपर की ओर जाते हैं, भले ही हमारे पास आदि शंकराचार्य से रामनुजाचार्य तक, श्री तैत्न्य महाप्रभु से श्री नारायण गुरु तक और स्वामी विवेकानंद से रमन महर्षि तक चेतनाप्राप्त गुरु हैं जिन्होंने हमारे कई धर्मशास्त्रों की रचना की है।

लेकिन अंततः हिंदू धर्म वही होता है, जैसा आप चाहते हैं। दूसरी ओर अब्राहमिक मत ऊपर से नीचे वालों को प्राप्त हुए हैं- ईश्वर से विशेष पैगंबरों या एजेंटों के माध्यम से। आपको इन ईश्वरों के साथ कोई छूट नहीं मिलती है।

इन सब बातों से स्पष्ट हो जाता है कि एक और जहाँ अब्राहमिक मतों में मानने वाले अपने धर्म, धार्मिक पुस्तकों और पैगंबरों को अत्यधिक गंभीरता से लेते हैं, वहीं हिंदू ऐसा नहीं करते हैं। हमें दूसरे धर्मों के अनुयायियों से संवाद-संबंध में इस अंतर को समझना होगा।

निष्कर्ष- जब तक हम अपने विविध विश्वासों और परंपराओं को कुछ मूल सिद्धांतों के आधार पर कुछ हद तक एकीकृत नहीं करते हैं तब तक हम इन अनम्य (कठोर) धर्मों के युद्ध की बलि बनते रहेंगे। इसी तर्क से हिंदुत्व के इस छत्र का विकास आवश्यक है जो विविधताओं को समावेशित करते हुए सभी भारतीय धर्मों का आश्रय बने।