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अर्थशास्त्र में टिड्डियों, महामारी, बाढ़-सूखा आदि से निपटने के लिए क्या उपाय बताए गए हैं

आशुचित्र- कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आपदाओं से निपटने के लिए दिए गए सुझावों को बताता लेख

2020 प्राकृतिक आपदाओं का वर्ष लग रहा है।

कोविड-19 ने विश्व को थाम लिया है एवं लाखों की जान ले ली है और कोई अंत भी दृष्टिगोचर नहीं है।

इस वर्ष की शुरुआत में ऑस्ट्रेलिया के दावानल ने वन्यजीव को बड़े स्तर पर नष्ट किया और 33 लोगों के प्राण हर लिये।

इंडोनेशिया हाल की सबसे घातक बाढ़ का शिकार हुआ।

फिलिपींस को दूसरे सबसे सक्रिय ज्वालामुखी फटा और सहस्रों लोगों को प्रभावित किया।

कश्मीर में हिमस्खलन हुआ और उत्तरी भारत में कई भूकंप आए।

अब टिड्डियों का हमला हुआ है और ये कीड़े लाखों की संख्या में महाद्वीपों के ऊपर मंडरा रहे हैं।

किसी भी दृष्टि से यह एक आम वर्ष नहीं है।

विश्व एक से दूसरे संकट से जूझ रहा है और क्वारन्टाइन में बैठा हुआ मैं तीसरी ईसापूर्व शताब्दी में मौर्य साम्राज्य की स्थापना कर अपने शिष्य चंद्रगुप्त को राजा बनाने वाले एक उत्कृष्ट शिक्षक कौटिल्य का लिखा हुआ अर्थशास्त्र पढ़ रहा हूँ।

अर्थशास्त्र में कौटिल्य प्राकृतिक आपदाओं जैसे सूखा, आग, बाढ़, रोग और महामारी, चूहों, टिड्डियों, कीड़ों आदि के हमले पर बात करते हैं।

कौटिल्य कहते हैं कि जब भी ऐसा कोई खतरा आता है तो “राजा को सभी की रक्षा वैसे करनी चाहिए जैसे एक पिता अपनी संतान की करता है और निरंतर (दिन और रात में) यज्ञों के माध्यम से प्रार्थना करनी चाहिए।” (अध्याय 4.4.42,43)

वर्तमान में भारत पर टिड्डियों का हमला जारी है, इससे निपटने के लिए कौटिल्य कहते हैं, “चूहों, टिड्डियों, चिड़ियों और कीड़ों के हमले को रोकने के लिए संबंधित जीव (जैसे बिल्ली, नेवले आदि) को खुला छोड़ देना चाहिए और इन जीवों को कुत्तों से बचाना चाहिए। विषैले दाने देकर या विशेषज्ञों द्वारा शुद्धि क्रिया करके इनसे निपटा जा सकता है। या एक कर तय कर देना जैसे हर व्यक्ति इतने मरे हुए चूहे लाकर दे।” (अध्याय 4.3.21,23-25,27)

महामारी से निपटने के लिए कौटिल्य कहते हैं कि चिकित्सकों से दवा के उपयोग, तपस्वियों से शुद्धि या प्रायश्चित क्रिया और विशेषज्ञों को गुप्त क्रिया करने का आह्वान करना चाहिए, यदि महामारी मनुष्यों को प्रभावित कर रही हो।

यदि महामारी का प्रभाव मवेशियों पर हो तो वे कहते हैं, “उनकी शालिकाओं का शुद्धिकरण और उपयुक्त ईश्वरों की विशेष पूजा की जानी चाहिए।” (अध्याय 4.3.13-16)

यदि देश में सूखा पड़े तो अर्थशास्त्र इससे निपटने के कई तरीके बताता है।

“राजकोष से रियायती दरों पर बीज और खाद्य का सार्वजनिक वितरण, गढ़ निर्माण या सिंचाई कार्य शुरू करके काम के बदले भोजन देना, राजसी अनाज भंडार को साझा करना, निजी खाद्य भंडार को सार्वजनिक करना, मित्र राजाओं की सहायता माँगना, अतिरिक्त खेती करके अनाज, सब्ज़ी और फलों को पर्याप्त रखना, मछली और अन्य जानवरों का शिकार करना”, जैसे सुझाव अध्याय 4.4.17-20 में दिए गए हैं।

बाढ़ के लिए नदी के किनारे रहने वाली जनसंख्या को उच्चतर क्षेत्र में जाने और लकड़ी के तख्ते, बाँस एवं नावों को तैयार रखने के लिए कहा गया है। अगर नाव के स्वामी खतरे में फँसे लोगों को न बचाएँ तो अर्थशास्त्र में इसे दंडनीय अपराध बताया गया है।

“बाढ़ में बह गए लोगों को तूमड़, चर्म थैले, पेड़ के तने, नावों और मोटी रस्सियों से बचाना चाहिए।”, पुस्तक में कहा गया है।

अर्थशास्त्र में कुछ आपदाओं को दूसरों से अधिक खतरनाक माना गया है। उदाहरण स्वरूप, कौटिल्य कहते हैं, “बाढ़ आग से अधिक खतरनाक है क्योंकि बाढ़ सैकड़ों गाँवों को नष्ट करती है जबकि आग एक गाँव को ही।”

कौटिल्य से पहले कुछ शिक्षकों ने माना था कि रोग और महामारी सूखे से अधिक खतरनाक हैं क्योंकि लोगों के बीमार पड़ने और मरने से कारण पूरा राज्य थम जाता है, वहीं सूखे में काम जारी रखा जा सकता है जिससे राजस्व एकत्रित किया जा सकता है लेकिन कौटिल्य इससे सहमत नहीं थे।

उनके अनुसार रोग और महामारी सिर्फ एक क्षेत्र को प्रभावित करते हैं और “रोग के लिए उपचार खोजा जा सकता है। वहीं सूखा पूरे देश को प्रभावित करता है और लोगों की आजीविका छीन लेता है।” (अध्याय 78.4.4-8)

कौटिल्य का तर्क था कि रोग स्थानीय ही रहता है जबकि बाढ़ और सूखा कृषि उत्पाद प्रभावित करके आजीविका को प्रभावित करते हैं। लेकिन आज की महामारी स्थानीय नहीं है और वैश्विक स्तर पर इसने प्राण हरे हैं और आजीविका को प्रभावित किया है।

कौटिल्य के काल में कृषि आय का मुख्य साधन था, न सिर्फ व्यक्ति के लिए, बल्कि राजकोष के लिए भी। इसलिए कृषि उत्पाग पर कर लगाया जाता था जबकि आज हम इसे कर मुक्त रख सकते हैं।

ईश्वरी कृत्यों के अलावा कौटिल्य उन आपदाों की भी बात करते हैं जो मानवीय कृत्यों के कारण आती हैं और राज्य की स्थिरता के लिए खतरा होती हैं।

सेनाओं द्वारा लूट-पाट, राजा और प्रजा का पतन, आंतरिक कलह, विद्रोही संघ या मुखिया, कपटी अधिकारी या व्यापारी, आदि।

नोट- अर्थशास्त्र के पेंग्विन क्लासिक संस्करण से उपरोक्त उद्धरण लिए गए हैं।

अरिहंत स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं।