राजनीति
मिड-डे मील्स से आधार को जोड़कर कर्नाटक हर साल करता है 100 करोड़ रुपये से अधिक की बचत

प्रसंग
  • मिड-डे मील योजना के साथ आधार जोड़ने के कारण कर्नाटक सरकार को प्राप्त हुए लाभ पर आंकड़े सामने आ रहे हैं।
  • यह है रिपोर्ट:

पिछले साल 28 फरवरी को केंद्र सरकार ने घोषणा की थी कि पूरे देश में मिड-डे मील योजना का लाभ प्राप्त कर रहे बच्चों को अपने पास आधार संख्या होने का प्रमाण प्रस्तुत करना होगा। नरेंद्र मोदी सरकार के विरोधियों ने इस निर्णय की तुरंत आलोचना की और इसकी आवश्यकता पर सवाल उठाये। विभिन्न कहानियाँ सामने आयीं जैसे – सरकार बच्चों को आधार के लिए पंजीकृत करना चाहती है और उन पर जीवन-पर्यंत नज़र रखी जाएगी।

मिड-डे मील योजना वह योजना है जो यह सुनिश्चित करती है कि स्कूली बच्चों को दोपहर का भोजन निशुल्क प्राप्त हो। इस योजना की परिकल्पना अधिक से अधिक बच्चों को स्कूल तक लाने के लिए तमिलनाडु में स्व. के. कामराज द्वारा की गयी थी जब वह मुख्यमंत्री थे। योजना को अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के संस्थापक स्वर्गीय एम. जी. रामचंद्रन ने और मजबूत किया। उन्होंने कुपोषण से निपटने में बच्चों की मदद के लिए इस योजना को एक पौष्टिक आहार योजना में परिवर्तित कर दिया। इस योजना को 1995 में केंद्र द्वारा अपनाया गया, और तब से इसमें विभिन्न बदलाव हुए हैं।

सरकार के इस कदम पर चिंताएँ तर्कसंगत थीं लेकिन वे हंगामे का कारण बनीं। वर्तमान सरकार द्वारा निर्धारित आधार कार्ड के उपयोग के सरल तरीके को देखते हुए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी, और साथ ही, इसमें अन्य उद्देश्य भी ध्यान में रखे गए थे। जल्द ही उद्देश्यों में से एक उद्देश्य पूरा हो गया। दो महीने बाद, रिपोर्ट में बताया गया कि आंध्र प्रदेश, झारखंड और मणिपुर जैसे राज्यों में 44 लाख “फर्जी छात्रों” का खुलासा किया गया।

मिड-डे मील योजना के लाभार्थियों के साथ आधार संख्या जोड़ने के सरकार के फैसले पर धावा बोलने में कॉंग्रेस जैसे विपक्षी दल सबसे आगे थे। लेकिन कॉंग्रेस और इसके गठबंधन सहयोगी जनता दल (सेक्युलर) ही सबसे पहले कर्नाटक में केंद्र के इस निर्णय का लाभ उठा रहे हैं।

कर्नाटक में मिड-डे मील योजना का प्रबंधन शिक्षा विभाग के तहत लोक निर्देश विभाग (डीपीआई) द्वारा किया जाता है। जबकि लोक निदेशक राजमर्रा के कार्यों का संचालन करते हैं वहीं आधारभूत कार्य जैसे आधार जोड़ना इत्यादि शिक्षा विभाग द्वारा प्रबंधित किए जाते हैं।

एक डीपीआई अधिकारी ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर स्वराज्य को बताया कि विभाग का काम मिड-डे मील प्रदान करना है और आधार को जोड़ने का विषय शिक्षा विभाग से संबन्धित है। अधिकारी ने कहा, “यदि कोई बच्चा आधार कार्ड चाहता है तो हम उसे संबन्धित प्राधिकरण या प्राधिकारी के पास भेजते हैं।”

उपनगरीय बेंगलुरु के दोद्दाथोगुरु में एक मिड-डे मील केंद्र, जहां लगभग 50 बच्चों को दोपहर का भोजन निःशुल्क प्राप्त होता है, की प्रभारी मंजुला ने कहा कि यहाँ सभी बच्चों के पास आधार कार्ड हैं जो कि मिड-डे मील योजना से जुड़े हैं।

उन्होंने कहा, “सभी बच्चों के आधार लिंक्ड हैं। यदि कोई बच्चा नया आता है और उसके पास आधार कार्ड नहीं होता है तो हम बच्चे को एक या दो महीने का समय देते हैं।”

कर्नाटक में मिड-डे मील योजना राज्य के सात उत्तर-पूर्वी जिलों में लॉंच होने के साथ 2002-03 में शुरू हुई थी। अगले साल योजना को सभी 30 जिलों तक पहुंचा दिया गया था। प्रारंभ में यह योजना सिर्फ सरकारी स्कूलों तक ही सीमित थी, लेकिन बाद में सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों को भी इसमें जोड़ा गया। पहले सिर्फ प्राथमिक विद्यालय के बच्चों को ही भोजन दिया जाता था लेकिन अब कक्षा 10 तक के छात्र इस योजना में शामिल किए चुके हैं।

डीपीआई अधिकारी ने कहा, “सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के लिए केंद्र और राज्य कक्षा आठ तक के लिए 60:40 अनुपात के आधार पर बोझ साझा करते हैं। कक्षा 9 और 10 के लिए पूरा का पूरा दायित्व राज्य सरकार के कंधों पर होता है।”

वर्तमान में प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, हाइ स्कूल और मदरसों समेत 54830 विद्यालय मिड-डे मील योजना के अंतर्गत आते हैं। इनमें से 48098 विद्यालय सरकारी हैं।

मिड-डे मील योजना के लिए 58 लाख से अधिक छात्र नामांकित हुए थे और लगभग 53.48 लाख छात्र इस योजना में शामिल होने की मंजूरी प्राप्त कर चुके हैं। सभी छात्रों को चावल, दाल, सब्जियों के साथ तेल, नमक ईंधन और मसाले दिये जाते हैं, जिन्हें भोजन संरचना में उचित महत्व दिया जाता है। राज्य एक मेन्यू चार्ट लेकर आया है जिसमें सप्ताह में चार दिन छात्रों को सांभर-चावल दिया जाता है, जिसमें हर दूसरे दिन सब्जी बदल-बदल कर दी जाती है। शुक्रवार को छात्रों को बीसी बेले बाथ परोसा जाता है और शनिवार को उन्हें गेंहूँ से बना भोजन दिया जाता है।

कुछ गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) ने भी मिड-डे मील योजना में सरकार की मदद करने के लिए हाथ आगे बढ़ाया है। पूरे कर्नाटक में कुछ 9.3 लाख बच्चों को भोजन देने में लगभग 66 एनजीओ शामिल हैं। एनजीओ सह-भागिता की विशेषता यह है कि भोजन केंद्रीकृत रसोई घरों में तैयार किया जाता है।

17 प्रतिशत लाभार्थियों की देखभाल और सहभागिता करने वाले गैर सरकारी संगठनों के साथ लाभार्थियों के आधारों को जोड़े जाने के सरकार के प्रयासों ने अच्छे नतीजे दिखाए हैं।

जबकि डीपीआई अधिकारी ने कहा कि उनके पास मिड-डे मील योजना के साथ आधार कार्ड जोड़े जाने के बारे में कोई विवरण नहीं था, वहीं शिक्षा विभाग ने सिर्फ तीन जिलों उडुपी, उत्तर कन्नड़ और दक्षिण कन्नड़ में सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे छात्रों पर ब्योरा दिया था।

फिर भी, मिड-डे मील योजना के साथ आधार को जोड़ने के कारण कर्नाटक सरकार को मिले लाभ पर स्वराज्य द्वारा प्राप्त किए गए आंकड़े अब सामने आ रहे हैं।

शिक्षा विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक, तीन जिलों में सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे 2.1 लाख छात्र मिड-डे मील योजना से लाभान्वित हो रहे हैं। इनमें से 1.55 लाख छात्रों द्वारा आधार कार्ड प्रमाण प्रदान किए जा चुके हैं।

अधिकारी ने कहा, “हमने अभिभावकों के आधार कार्ड स्वीकार कर लिए हैं क्योंकि उन्होंने जल्द ही अपने बच्चों के लिए आधार कार्ड प्राप्त करने के वादा किया है।” दक्षिण कन्नड़, उडुपी, उत्तर कन्नड़, मैसूर, शहरी बेंगलुरू, शिवमोग्गा, हसन, चिक्कामगुलूरु, हावेरी, हुबली, धारवाड़, बेलगावी और चित्रदुर्ग जैसे जिलों में लगभग 85 प्रतिशत छात्र आधार कार्ड प्रदान कर चुके हैं।

फिर भी, अधिकारी फर्जी छात्रों या डुप्लिकेट प्रविष्टियों की पहचान करने में सक्षम रहे हैं, हालांकि उपलब्ध आंकड़े सिर्फ इन तीन जिलों के ही थे।

विभागीय अधिकारियों का कहना है कि इस साल मई तक उन्होने 45,676 आधार कार्डों की पहचान की है और इन जिलों में इन्हें रद्द कर दिया है। इसका मतलब है कि इन तीनों जिलों में 20 प्रतिशत छात्रों की एक बड़ी संख्या को “फर्जी छात्रों” के रूप में पहचाना गया है।

शिक्षा विभाग के एक अधिकारी ने कहा, “कई प्रविष्टियां अभिभावकों के नाम पर थीं।”

बेंगलुरु में भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण के अधिकारियों ने उन मामलों में बच्चों और अभिभावकों का विवरण मांगा है जहां डुप्लिकेट प्रविष्टियाँ पायी गयी हैं। अधिकारियों का उद्देश्य ऐसी प्रविष्टियों को बाहर निकालना है।

उसकी बात ना करते हुए, अधिकारी ने इंगित किया कि ऐसा करने से भी सरकार को ठीक-ठाक बचत करने में मदद मिली है। अधिकारी ने कहा, “हम मिड-डे मील के लिए प्रति दिन प्रति बच्चे पर 10-12 रुपये खर्च करते हैं। चलिये मान लेते हैं कि फर्जी छात्रों की पहचान ने सरकार को प्रति दिन प्रति डुप्लीकेट प्रविष्टि पर 11 रुपये बचाने में मदद की है। इसके परिणामस्वरूप दिन में 5 लाख रुपये से अधिक की बचत होती है।”

यह देखते हुए कि मिड-डे मील महीने में 25 दिन दिया जाता है, इससे 1.25 करोड़ रुपये की मासिक बचत होती है। अतएव तीनों जिलों में एक साल की बचत 15 करोड़ रुपये से ऊपर पहुँचती है।

विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अगर कर्नाटक सरकार केवल तीन जिलों में फर्जी छात्रों को बाहर कर 15 करोड़ रुपये बचा सकती है, तो कुल वार्षिक बचत 100 करोड़ रुपये से अधिक हो सकती है। अनाधिकारिक रूप से वे कानाफूसी करते हैं कि बचत लगभग 250-300 करोड़ रुपये तक हो सकती है।

और यदि केंद्र द्वारा प्रस्तुत किए गए 44 लाख फर्जी छात्रों के आंकड़ों को देखा जाये तो सालाना बचत 1,000 करोड़ रुपये से ऊपर के आंकड़े को छूती है!

अनुमानित आंकड़ा निकालने वाले अधिकारियों का कहना है कि बस यही कारण है कि कई लोग ऑन रिकॉर्ड बात नहीं करना चाहते हैं। वे आपके लिए रहस्य छोड़ते हुए कहते हैं कि शायद नुकसान “फर्जी छात्रों” तक ही सीमित नहीं है।

एम. रघुराम से मिली जानकारी के साथ

एम.आर. सुब्रमणी स्वराज्य के कार्यकारी संपादक हैं। वे @mrsubramani पर ट्वीट करते हैं।