राजनीति
जावेद अख्तर के नाम एक पैगाम- सेक्युलर शायर का झीना लिबास तार-तार हो चुका है

किसी शायर या अफसानानिगार के भीतर का दर्द ही उसकी शायरी और कथा-कहानी में अलफाजों की शक्ल लेता है। जावेद अख्तर फिल्मों में लिखते थे। पता नहीं कब शायर हो गए। पता नहीं पहले शायर थे और फिल्मों में लिखने बाद में गए। उनके पिता जांनिसार अख्तर भी शायर थे। मजाज लखनवी शायद मामू थे। शायरी लहू में है। फिर शबाना आजमी (पत्नी क्रमांक दो के रूप में) उनकी ज़िंदगी में आईं।

वे कैफी आज़मी की दुख्तर हैं। कैफी वामपंथी सोच के एक ज़मीनी शायर थे। फिल्मों में भी गाने लिखे। सब जानते हैं। आज़मगढ़ की पहचान हैं वे। आज़मगढ़ की और भी पहचानें हैं। वह भी सबको पता है।

हुनर हर कहीं से जावेद के आसपास है। पता नहीं फिर उनकी मुश्किल क्या है? मुझे याद नहीं सन् 84 में दिल्ली और देश की सड़कों पर जब बेकसूर सरदारों को घेर-घेरकर तुगलक के जमाने की बेरहमी से मारा जा रहा था तब शायर किस फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने में मसरूफ था?

फिर आया 90, जब कश्मीर की घाटी से चुन-चुनकर पंडितों को मार भगाया गया। इबादतगाहों से लाउड स्पीकरों पर बाकायदा धमकी दे-देकर। वह भयावह कत्लेआम था जब सड़कों पर लाशें फेंकी गईं। तब भी शायर किसी दरगाह पर समाधि की अवस्था में था। हाँ, सन् 75 में मान सकते हैं कि वह फिल्मी दुनिया में अपनी जगह बनाने में लगा था इसलिए इमरजेंसी का भभका उसे महसूस ही न हुआ हो! मतलब इस काले कालखंड में सब ठीक ही था जावेद की नज़र में।

आज़ाद हिंदुस्तान की तारीख में इन मौकों पर शायर की नज़र में ज़रूर रामगढ़ में रामराज्य रहा होगा। जब 1993 और फिर 2008 में धमाकों से मुंबई दहली तब शायर महोदय की नाक पर ऐसा ही गुस्सा किसने देखा था? क्या धमाकों की आवाज़ जावेद के कानों में नहीं पड़ी थी? कोई गीत लिखा हो, मंचों पर गुस्साए हों, कोई आगबबूला तकरीर दाऊद और मेमन पर फटकारी हो? कोई दबी हुई म्याऊं जैसा ही कोई सुर निकाला हो?

अब शायर रामगढ़ की चिंता में दुबला हुआ जा रहा है। बिल्कुल एंग्री यंगमैन के तेवर में है शायर। आँखों में खून उतरा हुआ। शायर ने कभी परदे पर एंग्री यंगमैन का किरदार गढ़ा था। ऐसा किरदार जो गब्बर को चित कर दे। लेकिन असल में पूरी कहानी गड़बड़ा गई। बड़ी चोट हो गई।

परदे का वह निर्लज्ज एंग्री यंगमैन गुजरात में टूरिज्म का प्रचार करने लग गया। कम्बख्त वीरू भी बेवफा निकला। वह भी गब्बर के गिरोह शामिल हो गया। बसंती को भी साथ कर दिया और अब अपने बड़े बेटे को भी संसद के घोड़ों पर सवार करा दिया। बेवफा निकले सब!

जनाबे-आला की बेचैनी तब और बढ़ गई जब वोटरों ने 2019 में भी दगा दे दिया। फिर श्रीनगर में 370 बोल्ट का करंट लग गया। तीन तलाक तो फिर भी खून का घूंट पीकर दाब लिया गया था। लेकिन कंबख्त अदालत ने अयोध्या में भी कहीं का नहीं छोड़ा। ऐसे कैसे सेक्युलरिज्म चलेगा भई? अब क्या हवाओं को भी बहने और पानी को बरसने की इजाज़त लेनी होगी? इतनी बुरी-बुरी खबरें आने के बाद शायर के जोड़ों का दर्द बढ़ गया। दर्द इतना बढ़ गया कि डॉ. आर्थो के गोली-तेल बेअसर हो गए।

अब दिल्ली की बारी आई। दो महीने से निरक्षर खवातीनें सीएए की अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ बनकर एक बड़ा रास्ता रोककर गुंडागर्दी पर उतारू हैं और उन्हें परदे के पीछे से चलाने वाले ठेकेदार लोकतंत्र के सब्र का इम्तहान लेते रहे तब जावेद अंकल एक दफा समझाने नहीं गए कि हिजाब में कैद देवियों, सीएए के तहत आपमें से किसी को मुल्क से निकालकर कराची-लाहौर का टिकट नहीं दिया जाएगा? आप घर जाइए। रास्ता मत रोकिए। इस कानून का आपसे-हमसे कोई लेना-देना नहीं है। इतना वक्त बेटियों को पढ़ाने में लगाइए। उन्हें अच्छे कॉलेजों में भेजिए। खुली हवा में साँस लेने दीजिए।

मगर चार दिन पहले दिल्ली सुलगी तो शायर भी सुलग गया। धुआँ तब और बढ़ गया जब देखा कि अरे ये क्या, जनाब ताहिर हुसैन साहब धरा रहे हैं। अपने किलेनुमा घर की छत पर जंग का पूरा साजोसामान सजाते हुए और दंगाइयों को डायरेक्शन देते हुए स्क्रीन पर देखे गए ताहिर में शायर को एक मजलूम मुसलमान नज़र आया, जिसे निशाना बनाया जा रहा है। पीड़ित पक्ष की सदाबहार फिल्म के लिए एक किरदार मिल गया। वजूद खतरे में आ गया। अब तो शायर की जान ही सुलग गई। सुबह ही उसने एक अदद ट्वीट दे मारा।

शायर के तेवर तीखे हैं। गुस्सा नाक पर ही है। आँखों में चिंगारियाँ देखिए। अल्फाजों में तल्खी लाजमी है। सेक्युलर मंचों पर शायरी की बजाए जोरदार तकरीरें झाड़ रहे हैं। शायर को दो चेहरों से नफरत है। सख्त नापसंद हैं उसे गुजरात के दो चेहरे। वह उसे गब्बर और सांभा जैसे नज़र आ रहे हैं। बस चलता तो इंटरवल के पहले ही दोनों काे मरवाकर इंटरवल के बाद सेक्युलरिज्म के चार गाने डालकर फिलिम बना देता। मगर यह बॉलीवुड नहीं है। मूवी नहीं है। हकीकत है। जिंदगी की हकीकत। हिंदुस्तान की भोगी हुई हकीकत।

आला हजरत खुद को मजहबी नहीं मानते। भोपाल के सैफिया कॉलेज में पढ़ते हुए पुराने भोपाल की ईद और रमजान पर कुछ बोलने को कहो तो फरमाते हैं- अमा यार कुछ और बात करो। हम एथीस्ट हैं। यानी नास्तिक। कितनी अच्छी बात है। एक शायर या लेखक को होना भी चाहिए। क्यों वह किसी की तरफदारी में दिखे। लेकिन दिख गया।

खुलकर दिख गया। सुनकर देख लीजिए, उसकी तकरीरें कहीं से उसे नास्तिक साबित नहीं करतीं। वह पूरे मजहबी कलर में हैं। वह भी बिना चश्मे के थ्री-डी। बला की मासूमियत है कि वह देश के भविष्य को लेकर चिंतित है।

शायर की द्वितीय पत्नी भी अदाकारा रही हैं। अक्सर साथ नज़र आती हैं। वे सोशल एक्टिविस्ट बनकर भी घूमती हैं। सुधारों की बात करती हैं। महिलाओं के मजबूत किरदार की पैरोकार हैं। लेकिन अपने ही आसपास महिलाओं की बुरके से आजादी पर लब हैं कि सिले हुए हैं।

जबकि सब तरह के और सब तरफ से सुधार की सबसे ज्यादा गुंजाइश उनके ही चहल-पहल से भरे ईमान की रोशन से रौनकदार मोहल्ले में है। मगर वे अपने मोहल्ले में कोई हल्ला नहीं चाहतीं। हिम्मत ही नहीं है। कौन फतवों में उलझे। इसलिए आओ मियां एक घर छोड़कर चलें।

सुधार के लिए इतना बड़ा हिंदुस्तान पड़ा है। सियासत पड़ी है। मजदूर हैं। नौकरियाँ नहीं हैं। गरीबी है। या अल्ला, सांप्रदायिकता तो बेहिसाब है। देश में डर कितना बढ़ गया है। देखो नसीर साब भी डर रहे हैं। कहाँ अपने मोहल्ले में बुरके और तालीम की बात करके हो-हल्ला खड़ें करें। अभी लेने के देने पड़ जाएंगे। वहां हाथ मत डालो। वहाँ मौलवी साब सब देख लेंगे। तो माेहल्ले में सब चलने दें। बुरका फर्ज है। वह मजहब की शान का प्रतीक है। मेजोरिटी की सांप्रदायिकता इस वक्त सबसे खास है। तो तकरीर के लिए अपन जोड़े से चलते हैं!

अब सब उजागर है। सेक्युलरिज्म का नकाब गिर गया है। चेहरों पर सब तरफ से सचाई की रोशनी पड़ रही है। शायर की आँखें मिचमिचा रही हैं। सबको सब दिख रहा है। इनकी बेचैनी मौसमी है। वह मौसम देखकर आती है। वे बड़े बदलाव चाहते हैं बस एक खास वर्ग को बचाकर रखा जाए।

सेक्युलरिज्म खतरे में आ जाता है अगर ताहिर की छत पर निगाह जाती है। ताहिर के घर की तरफ न देखें, अंकित शर्मा को ही आतंकी बता दें। अब तो वह मर गया। साबित कर दें कि वह किसी हमले की प्लानिंग से ताहिर के घर की तरफ बढ़ रहा था। उसे आईबी ने ही भेजा था। वही पेट्रोल बम, गुलेल और पत्थर लेकर आया था। सारी कहानी उसी पर बुन देते। कम से कम इंसानियत तो बच जाएगी। ताहिर ही नजर आया। गब्बर और सांभा अल्लाह से खौफ खाओ। मजलूमों पर ऐसे जुल्म न ढाओ। कयामत के दिन हिसाब होगा। दोजख से डरो।

जावेद अख्तर को शायर के झीने लिबास से बाहर आ जाना चाहिए। वह तार-तार हो चुका है। वैसे भी मंचों पर उनकी मौजूदगी में अब शायरी कम और तकरीरें ज्यादा सुनाई दे रही हैं। आगबबूला तकरीरें। इन तकरीरों में उनका एंगल एथीस्ट होने का कहीं से नहीं है, यह भी दिख गया है। उनके इरादे शब्दों की शातिर चाशनी से पगे हो सकते हैं,  लेकिन ऊपर की मीठी परत के भीतर जाकिर नाइक का उत्पाद ही है। और भीतर जाएं तो जहर उगलते किसी काजी या इमाम का कड़वा स्वाद ही मिलेगा।

इसलिए बेहतर है कि जावेद सेक्युलर शायर और फिल्म लेखक के खोल से बाहर आएँ। वे दाढ़ी-टोपी और तारेक फतह के मुताबिक बड़े भाई का कुरता और छोटे भाई का पाजामा धारण करके प्रकट हों। तब उनकी तकरीरें तब ज्यादा कहर ढाने वाली हो जाएँगी। तब कौम किसी बड़े बदलाव की उम्मीद कर सकती है। असली गेटप में।