राजनीति
करुणानिधि के राजनीतिक जीवन से भाजपा द्वारा आत्ममंथन करने के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण सबक

प्रसंग
  • करुणानिधि और भाजपा वास्तविक भागीदार नहीं हैं, लेकिन राष्ट्रीय पार्टी को राष्ट्रीय राजनीति में द्रमुक के उदय से सही सबक लेना होगा।
  • इन्हें क्षेत्रीय शक्तियों को साथ ले चलने के लिए थोड़ा झुकना होगा।

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), जिसे कर्नाटक में प्रगाढ़ पैठ बनाने के बावजूद दक्षिण में उत्तर भारतीय पार्टी के रूप में देखा जाता है, को अपने मूल राजनीतिक प्रवृत्तियों को गंभीरता से पुनर्जीवित करने के लिए एम. करुणानिधि के निधन का उपयोग करना चाहिए।

अन्य बातों के अलावा, द्रविड़ मुनेत्र कझागम (द्रमुक) के प्रमुख के रूप में करुणानिधि अपने राजनीतिक जीवन में चार मुद्दों को सामने लाए – अधिक राज्य स्वायत्तता, क्षेत्रीय भाषाओं में गौरव, जाति विन्यास के बारे में जागरूकता और केंद्र में बराबर की भागीदारी।

जम्मू-कश्मीर के अलावा, तमिलनाडु एक ऐसा राज्य रहा है, जो करीब-करीब अलगाववादी कहा जाता है। द्रमुक के अलगाववाद के आत्मसमर्पण से भाजपा के लिए सबक यह है कि आप राज्यों को केवल अधिक स्वायत्तता देकर ही क्रम में रख सकते हैं। केंद्र से पूरे भारत पर शासन नहीं किया जा सकता है। हालांकि, पिछले दो दशकों से यह सच रहा है, कि केंद्र किसी भी प्रमुख राज्य में अपनी ही सनक और पसंद पर राष्ट्रपति शासन को लागू करने में असमर्थ रहा है,अगला तार्किक कदम आगे औपचारिक रूप से राज्यों को और अधिक शक्तियां अवक्रमित करना है। भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास आवेगों को मजबूत रखने का यही एकमात्र तरीका है, क्योंकि भविष्य में राज्यों को सुधारों और परिवर्तनों की प्रेरक शक्ति होना है। नरेंद्र मोदी सत्ता के औपचारिक विभाजन को उनका अगला राजनीतिक लक्ष्य बनाकर लोगो की नज़रों में एक सही कदम उठाने के अंक बटोरेंगे।

सीखने का दूसरा सबक प्रगति के मार्ग में अंग्रेजी पर जोर बनाए रखने के साथ क्षेत्रीय भाषाओं को प्राथमिकता देना है। हिंदी भाषा, जो अधिकांश भारतीयों द्वारा बोली जाती है, लेकिन यह अभी भी एक क्षेत्रीय भाषा है। एक साधारण कदम सभी क्षेत्रीय भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा देने के लिए हो सकता है और महत्वपूर्ण तकनीकी तथा साहित्यिक कार्यों से अंग्रेजी-से-क्षेत्रीय भाषा और क्षेत्रीय-से-क्षेत्रीय भाषा अनुवादों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए राज्यों को बड़े अनुदान की पेशकश करना, जिससे क्षेत्रीय भाषाओं में प्रवीणता की धीमी कमी को अवरुद्ध किया जा सके। यह बीजेपी को अपने हिंदी-हिंदू छवि जाल से बचने में भी मदद करेगा। मोदी को संदेश देने की जरूरत है कि सभी भारतीय भाषाएं समान हैं। हिंदी भाषा को सभी भाषाओं के समान नहीं होना चाहिए।

द्रमुक ने ब्राह्मणवाद विरोध को अपनाया; और यह तर्क अब पुराना हो जाने के बावजूद, इसने समावेश और जाति सशक्तिकरण का एक शक्तिशाली संदेश भेजा जो भी आवश्यक था।बीजेपी की नींद जाति आधारित सशक्तिकरण की वास्तविकता से खुल चुकी हैं। अब भाजपा के नेतृत्व में तेजी से ओबीसी(प्रधानमंत्री समेत) बढ़ रहे हैं,और दलितों के खिलाफ “बढ़ते” अत्याचारों के बावजूद इसकी दलितों तक पहुंच में सुधार हुआ है।अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार अधिनियम को मजबूत करने के लिएहाल ही में उठाया गया कदम, जो सुप्रीम कोर्ट के फैसला, मनमाने तरीके से गिरफ्तारी पर रोक लगाता था, को खत्म करने के लिए था,और पिछड़े वर्गों पर राष्ट्रीय आयोग को संवैधानिक दर्जा देने के लिए बिल पास करना, इस दिशा में उठाए गए कदम हैं। जबकि पूर्व कदम अनौपचारिक है, और बाद वाला प्रतिभा से दूर कदम है, बीजेपी स्पष्ट रूप से अपने जाति समीकरणों को बनाए रखने की व्यापक अनिवार्यताओं के अनुरूप आ रही है।

आखिरी संदेश, भाजपा को इसपर आत्ममंथन करने की जरूरत है कि उसे केन्द्र में महागठबंधन (कई पार्टियों से गठबंधन) तैयार करना होगा, भले ही इसका बहुमत हो। 2014 से, मोदी ने अपनी सरकार का नेतृत्व किया है लेकिन इस सरकार में केवल एक ही पार्टी शामिल है बाकी सहयोगी दलों के पास मामूली मंत्रालय हैं और उनको अहम फैसलों पर दरकिनार कर दिया जाता है। यही कारण है कि शिवसेना, तेलुगू देशम पार्टी और यहां तक ​​कि अकाली के साथ भाजपा के संबंधों में खटास आ गई है, इनमें से कोई भी वास्तव में सरकार का साथ छोड़ सकता है। जब करुणानिधि वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा के साथ गठबंधन में थे, और 2004-14 के बीच संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के साथ, उनकी पार्टी ने केंद्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वास्तव में, बीजेपी 2004में हार गई, क्योंकि क्षेत्रीय पार्टियों ने आंध्र में टीडीपी और तमिलनाडु में अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के साथ गठबंधन कर लिया था। भाजपा ने करुणानिधि को छोड़ दिया, और उसकी कीमत चुकाई।

करुणानिधि और बीजेपी एक विचारधारा वाले साझेदार नहीं हैं, लेकिन राष्ट्रीय पार्टी को राष्ट्रीय राजनीति में द्रमुक के उदय से सही सबक सीखना है। भाजपा को क्षेत्रीय शक्तियों के साथ नम्रता से आना चाहिए।

पिछले नवंबर में, प्रधानमंत्री ने चेन्नई में एक 90 वर्ष से भी अधिक बूढ़े बीमार नेता का हाल-चाल लेने के लिए दौरा किया था और ऐसी अटकलें लगाई जा रही थीं कि 2019 के चुनावों के लिए वह द्रमुक के साथ गठबंधन के विकल्प खुले रख रहे हैं।

जगन्नाथ स्वराज के संपादकीय निदेशकहैं। वह @TheJaggi पर ट्वीट करते हैं।