राजनीति
नेपाल में भाषाई कलह ने तूल पकड़ा है- हिंदी राष्ट्रभाषा या नहीं?
आशुचित्र- नेपाल में हिंदी सामाजिक-राजनीतिक खींचतान में उलझी हुई है जहाँ इसे भारतीय और इस प्रकार से विदेशी भाषा के रूप में देखा जा सकता है।
 
नेपाल के एक कानूनविद् ने हाल ही में हिंदी को देश की राष्ट्रीय भाषा बनाने का आह्वान किया। नेपाली कांग्रेस के देव एन कलवार ने संसद में कहा कि हिंदी को नेपाल की लोकभाषा घोषित किया जाना चाहिए क्योंकि हिंदी 80 प्रतिशत आबादी को समझ में आती है।
अपने कथ्य का समर्थन करने के लिए उन्होंने एक अध्ययन का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि नेपाल की 50 प्रतिशत आबादी हिंदी बोल सकती है और 80 प्रतिशत लोग इसे समझ सकते हैं।
भले ही सांसद की इस मांग का कुछ नहीं हुआ लेकिन नेपाल में हिंदी के मुद्दे पर देश में सामाजिक-भाषाई तनाव का एक बड़ा मुद्दा फिर से सामने आ गया है।
2015 का नया नेपाली संविधान जिसकी उद्धघोषणा का विरोध देश के मैदानी इलाकों में व्यापक रूप से हुआ, उसमें नेपाली जो देवनागरी लिपि में है उसे देश की आधिकारिक भाषा के रूप में स्वीकार किया गया था। संविधान हालाँकि यह भी कहता है कि एक प्रांत नेपाली के अलावा राज्य में बोली जाने वाली किसी भी भाषा को आधिकारिक दर्जा दे सकता है।

2015 में नेपाली छात्रों का विरोध

राज्यों ने उसी के अनुसार काम किया। उदाहरण के लिए प्रांत संख्या दो ने नेपाली के अलावा मैथिली, भोजपुरी और बज्जिका को अपनी आधिकारिक भाषा बनाया।
भाषा का मुद्दा देश के सामाजिक-राजनीतिक तनावों में निहित है जहाँ सत्ता पारंपरिक रूप से पहाड़ी अभिजात वर्ग के हाथों में रही है और मैदानी इलाकों के लोगों ने खुद के साथ भेदभाव और हाशिए पर रखने का दावा किया है। यह कोई हालिया घटना नहीं है, यह राजशाही के दिनों से ही होता आ रहा है। एक मधेसी पत्रकार ने लेखक को बताया कि राजा बीरेंद्र के महल में उनके पास एक भी मधेसी कर्मचारी नहीं थे और उनके शासनकाल के दौरान मधेसियों से उनका संबंध ना के बराबर था।
पहाड़ी-मैदानी विभाजन का मूल कारण 2015 का मधेसी आंदोलन था जब मैदानी इलाकों में नए संविधान की उद्धघोषणा के विरोध में लोग मैदान में उतर आए थे क्योंकि यह 2007 के अंतरिम संविधान से कई प्रावधानों में भिन्न था और जिनमें सबसे प्रमुख राज्य संगठन का प्रावधान था।
तत्कालीन 2007 में अंतरिम संविधान ने 10 राज्यों का प्रस्ताव किया गया था जो मधेसी आबादी को समेकित करते थे। 2015 के संविधान ने तब भी देश को सात राज्यों में संगठित किया जिसका मतलब था कि पहाड़ियों से ऊँची जातियाँ सात में से छः राज्यों में बहुमत में थीं। इसने न केवल मधेसी राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बदल दिया बल्कि उनके भाषाई एकीकरण को भी रोका।
मधेस देश के लगभग 23 प्रतिशत क्षेत्रफल और आबादी का 48 प्रतिशत में शामिल है जिनमें से अधिकांश नेपाली को अपनी मातृभाषा के रूप में नहीं  पहचानते हैं। मैथिली क्षेत्र में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा बनी हुई है। यह देश की दूसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा भी है।
हिंदी की अगर हम बात करें तो जनगणना रिकॉर्ड से यह पता चलता है कि नेपाल में मातृभाषा के रूप में हिंदी बोलने वाले नेपाल की आबादी का 0.28 प्रतिशत ही है। भले ही आबादी का एक छोटा हिस्सा हिंदी को अपनी मातृभाषा के रूप में उद्धृत करता है लेकिन यह बड़ी संख्या में लोगों जिन्होंने मैथिली और भोजपुरी को अपनी मातृभाषा के रूप में अपनाया हुआ है जो कि भले अलग-अलग भाषाएँ हैं, लेकिन व्यापक रूप से हिंदी की बहनें ही हैं, द्वारा समझी और बोली जाती है।
इसकी पुष्टि करते हुए नेपाल के राष्ट्रीय भाषा नीति आयोग ने 1994 में कहा कि था कि “तराई भाषाओं के शिक्षित मूल वक्ताओं ने हिंदी भाषा का इस्तेमाल एक-दूसरे से संवाद के लिए किया”। इसके अलावा उर्दू 2.6 प्रतिशत नेपालियों की मातृभाषा है जिसमें ज्यादातर मुस्लिम हैं। चूँकि उर्दू और हिंदी की जड़ें एक समान हैं क्योंकि यह फ़ारसीकृत हिंदुस्तानी है (और हिंदी संस्कृतनिष्ठ हिंदुस्तानी है) और इसके वक्ता अपने आप में ही हिंदी में पारंगत हैं। यहाँ तक ​​कि बिना किसी भी आधिकारिक मान्यता के अभाव में हिंदी एक लोकभाषा के रूप में  नेपाल के मैदानी इलाकों में काफी मज़बूत है जो अपनी आबादी का लगभग 48 प्रतिशत है।
फिर नेपाल में हिंदी का इतना विरोध क्यों हो रहा है जबकि देश की आधी आबादी के लिए यह भाषा व्यावहारिक रूप से प्रचलित है?
काठमांडू से प्रकाशित हिंदी पत्रिका हिमालिनी के प्रकाशक सच्चिदानंद मिश्रा ने स्वराज्य को बताया कि हिंदी अक्सर भारत से जोड़ कर देखा जाता है और इसे भारतीय भाषा के रूप में चित्रित किया जाता है।

हिमाल्नी के ऑनलाइन संस्करण की प्रति

मिश्रा ने कहा, “हिंदी को एक विदेशी भाषा के रूप में दर्शाया हुआ है और इसलिए इसके इस्तेमाल को हतोत्साहित किया जाता है।” “भले ही अधिकांश मैथिली और भोजपुरी भाषी हिंदी को समझते हैं और अक्सर इसका उपयोग करते हैं लेकिन वे इस विदेशी तत्व के कारण हिंदी को अपनी दूसरी या तीसरी भाषा के रूप में उल्लेख करने से हतोत्साहित होते हैं।”
मिश्रा ने उर्दू के मुद्दे पर भी बात की। उन्होनें यह कहा कि “भाषा संस्कृति के अधीन है और धर्म के नहीं,”। “एक मुसलमान अपने हिंदू पड़ोसी की तरह ही मैथिली या हिंदी बोलता है लेकिन धार्मिक पहचान पर जोर देने और धर्म को भाषा से जोड़ने की बढ़ती प्रवृत्ति के कारण कई मुस्लिम उर्दू को अपनी मातृभाषा कहते हैं।”
राष्ट्रवाद भी एक भूमिका निभाता है क्योंकि राष्ट्रवादी बयानबाजी भारत के चारों ओर घूमती है और हिंदी को भारतीय एजेंट के रूप में प्रदर्शित करने से राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने का अवसर मिलता है। हिंदी में शपथ लेने वाले सांसदों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन इस बात की गवाही है।
हिमालिनी के एक लेख में काठमांडू के त्रिभुवन विश्वविद्यालय में हिंदी की प्रोफेसर श्वेता दीप्ति ने एक नेपाली पोर्टल पर एक रिपोर्ट का हवाला दिया जिसमें दावा किया गया था कि सभी मधेसी नेता अपनी भाषा और संस्कृति से प्यार की वजह से केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट पार्टी के साथ शामिल हुए थे ताकि विशेष रूप से राष्ट्रवाद को तीव्र करने में उनका साथ दे सकें।
दीप्ति ने तर्क प्रस्तुत दिया कि क्या वे सभी जिनको अपनी भाषा और संस्कृति से प्यार है अपना समर्थन पहाड़ी कम्युनिस्टों को देंगे जिनका चुनाव लड़के संविधान में संशोधन करने और मधेसी आकांक्षाओं को समायोजित करने का कोई इरादा नहीं है और इसका मतलब है कि जो उनके साथ नहीं हैं और उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षाओं के लिए काम नहीं कर रहा या तो वो राष्ट्रविरोधी है या नेपाली नहीं हैं?

12 अक्टूबर 2015 को केपी शर्मा ओली का शपथ ग्रहण

अपने लेख में, दीप्ती ने नेपाल में पाखंडी रवैये पर प्रकाश डाला जो हिंदी बोलने वालों को विदेशी मानते हैं लेकिन भारत में गोरखालैंड का मुद्दा जो कि भारत का एक घरेलू मुद्दा और इसमें कोई संदेह नहीं कि नेपाल इसे अलग-थलग करने में करने में लगा हुआ था।
इस प्रकार नेपाल के सामाजिक-राजनीतिक झगड़े के बीच में हिंदी फसी हुई है जहाँ इसे भारतीय और इस प्रकार विदेशी माना जाता है। देश में भारत-विरोधी भावना के पनपने के साथ राष्ट्रवाद को हवा देने के लिए भाषा को एक साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है जो कि एक ऊबड़-खाबड़ सड़क पर हल चलाने जैसा है और यह नेपाली राष्ट्रीय पहचान के साथ मेल नहीं खाती जिसके कारण इसे समायोजित नहीं किया जा सकता।
मधुर शर्मा दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास के छात्र हैं। वे @madhur_mrt द्वारा ट्वीट करते हैं।