राजनीति
लक्षद्वीप के प्रस्तावित नियम गलत या विकास-विरोधी विपक्ष कर रहा नकारात्मक राजनीति

भारत की विडंबना है कि यहाँ हिंदुओं के संबंध में ‘जन भावना’ पर कदापि विचार नहीं किया जाता। परिवारवादी दलों के नेता ‘मुस्लिम ध्रुवीकरण’ तथा ‘तुष्टीकरण’ को ‘तुरुप का इक्का’ मानते हैं और इसी ‘कार्ड’ की सहायता से अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने का सतत प्रयास करते (रहे) हैं।

‘मुस्लिम ध्रुवीकरण’ से वे अपना राजनीतिक करियर चमकाते (रहे) हैं। राजनीति में मुस्लिम तुष्टीकरण-ध्रुवीकरण की धारा को संजीवनी देकर जीवित रखने-करने का कार्य सदैव चलता रहता है। इधर, लक्षद्वीप के प्रशासक प्रफुल्ल पटेल द्वारा लाए गए नए नियमों पर ‘विरोधी’ केंद्र सरकार पर आक्रामक हैं।

उनके विरोधी स्वर में ‘मुस्लिम आबादी’ और ‘संस्कृति’ जैसे शब्दों के प्रयोग की बारंबारता पर ध्यान देने की आवश्यकता है। कुछ समझ ना आने पर ‘संघ का एजेंडा’ बताकर मोदी-भाजपा विरोधी किसी भी मामले में ‘हिंदू-मुस्लिम’ का कोण खड़ा कर देते हैं।

इसके विपरीत ध्यातव्य है कि इधर, संघ का दृष्टिकोण ‘सर्वसमावेशी’ हो गया है। कुछ एजेंट बुद्धिजीवी एवं मीडियाकर्मी संघ-भाजपा की मुस्लिम ‘हितोन्मुखी’ दृष्टि को भी ‘ध्रुवीकरण’ के कोण से देखते हैं। अर्थात् ना पारिवारिक राजनीतिक दलों के नेता भाजपा को मुस्लिम हितोन्मुखी बनते देखना चाहते हैं, ना एजेंट बुद्धिजीवी एवं मीडियाकर्मी ही!

इसे कुछ इस तरह भी समझा जा सकता है कि परिवारवादी नेता, एजेंट बुद्धिजीवी एवं मीडियाकर्मियों को मुस्लिमों की ‘दशा-दुर्दशा’ से कोई लेना-देना नहीं है। वे मुस्लिमों को ‘मजहबी’ (ज्ञान-विज्ञान से विमुख) बनाकर रखने में ही अपना स्वार्थ देखते हैं।

स्मरणीय है कि मोदी की मुस्लिम ‘हितान्वेषी’ योजनाओं ने ऐसे लोगों को आइना दिखाया और उन्हें अनेकानेक प्रसंगों में बेनकाब किया है।
लक्षद्वीप में बने कानूनों की वास्तविकता के विपरीत कांग्रेस पार्टी के नेताओं का मानना है कि भाजपा ‘धार्मिक कार्ड’ खेल रही है। उनकी दृष्टि में प्रायः भाजपा ‘मुस्लिम-विरोधी’ दल है।

भाजपा की लोक एवं देश हितान्वेषी सुधारवादी पहलों में वे एनकेन प्रकारेण ‘मुस्लिम’ का मुद्दा लाने से नहीं चूकते। इस संदर्भ में दो ही बातें हो सकती हैं– या तो उनकी मति-स्मृति अत्यंत क्षीण है, अथवा वे देश को हिंदू-मुस्लिम के नाम पर सतत दो धड़ों में बाँटने की मंशा रखते हैं।

स्मरणीय है कि मुस्लिमों के जीवन में सुधार के लिए मोदी सरकार ने कई उपाय किए हैं। यद्यपि नकारात्मकता की राजनीति करने वाले विपक्ष ने ‘तीन तलाक़’ का राजनीतिकरण कर दिया, तथापि मुस्लिमों के हित में मोदी की योजनाओं को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

मुस्लिम-हित में ही मोदी सरकार ने पाँच करोड़ विद्यार्थियों को ‘प्रधानमंत्री छात्रवृत्ति’ देने की योजना बनाई थी। मोदी ने ही मुस्लिम युवकों के ‘एक हाथ में कुरान और दूसरे हाथ में कम्प्यूटर’ की बात की थी। ऐसे में, मोदी-भाजपा को मुस्लिम-विरोधी कहना कितना तर्कसंगत है?

परिवारवादी विपक्षियों के भय को सहज ही समझा जा सकता है। उन्हें लगता है कि यदि ‘मुस्लिम जनाधार’ भी मोदी-भाजपा के साथ हो जाएगा तो उनके पास शेष क्या रह जाएगा? लक्षद्वीप में प्रफुल्ल पटेल द्वारा लाए गए नए नियमों के ‘मसौदों’ के विरोध में कांग्रेस सहित एनसीपी, माकपा और अन्य विपक्षी दल खड़े हो चुके हैं।

केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन इस मामले में एक क़दम आगे चल रहे हैं। उन्होंने केरल के साथ द्वीपों के ‘भौगोलिक और सांस्कृतिक जुड़ाव’ का मुद्दा उठाते हुए लक्षद्वीप की जनता के पक्ष में केरल विधानसभा में प्रस्ताव भी प्रस्तुत कर दिया, जिसे विपक्ष के नेता वीडी सतीसन ने भी समर्थन दिया है।

उल्लेखनीय है कि प्रफुल्ल पटेल द्वारा लाए गए मसौदा नियमों में एक है– ‘लक्षद्वीप विकास प्राधिकरण विनियमन’ (एलडीएआर)। जब विवाद गति पकड़ने लगा तो प्रफुल्ल पटेल ने स्पष्ट किया कि वे “लक्षद्वीप को मालदीव जैसा विकसित करना चाहते हैं”।

लक्षद्वीप के जिलाधीश एस आस्कर अली ने भी स्पष्ट किया, “यह अनावश्यक विवाद है क्योंकि मसौदा नियम द्वीपों के विकास के लिए हैं और गृह मंत्रालय अभी मसौदा नियमों की संवीक्षा कर रहा है।” अर्थात् सबको इस बात का ध्यान भी होना चाहिए कि ये मसौदा नियम हैं, अनुमोदित, अनुशंसित, अधिसूचित नियम नहीं हैं।

विपक्ष की धारा में केरल सीपीआई (एम) के राज्यसभा सांसद एलामाराम करीम ने अपनी दलगत विचारधारा का पालन करते हुए उद्योगपति परिवारों को लाभ पहुँचाने की घिसी-पिटी बात कही है। सार्वजनिक रूप से स्पष्ट है कि वामपंथियों के सोच-विचार का वही ढर्रा है– ढाक के वही तीन पात!

इस निस्सार विचारधारा में ‘शोषक’ ‘शोषित’ ‘शोषण’ शब्द घुट्टी में पिलाए जाते हैं। उद्योगपतियों वाले संदर्भ पर लक्षद्वीप के जिलाधीश की टिप्पणी विचारणीय है–

“हमने सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर एकीकृत द्वीप प्रबंधन योजना भी लागू की है, जो कि द्वीप की नाजुक पारिस्थितिकी को विध्वंसकारी विनाश से बचाने के लिए ही है। कोई भी मौजूदा सभी नियमों की अनदेखी कर बड़े पैमाने पर व्यावसायिक विकास नहीं कर सकता है।”

अस्तु, भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं लक्षद्वीप के प्रभारी एपी अब्दुल्लाकुट्टी का मंतव्य भी प्रसंगोचित है कि विपक्षी दलों के नेता जान-बूझकर प्रफुल्ल पटेल का विरोध कर रहे हैं। यह भी कि द्वीप समूह में नेताओं के ‘भ्रष्ट चलन’ को समाप्त करने के लिए प्रफुल्ल पटेल ने अनेकानेक कठोर कदम उठाए हैं।

ध्यातव्य है कि लक्षद्वीप में केवल एक ही हवाई अड्डा है। पर्यटन को बढ़ाने और दूसरे द्वीपों से जुड़ने के लिए ‘विकास’ का मार्ग ही एकमात्र उपाय है। स्मरणीय है कि लक्षद्वीप 36 द्वीपों का एक द्वीप समूह है, जिनमें से केवल 11 द्वीपों में लोग निवास करते हैं।

ध्यातव्य है कि विपक्ष ने स्थानीय निवासियों में ज़मीनें छीन जाने के भय को हवा देकर लक्षद्वीप के युवाओं को भाजपा के विरोध में खड़ा करने का प्रयास किया है और वे कुछ हद तक सफल भी होते हुए दिखाई दे रहे हैं। यही कारण है कि भाजपा युवा मोर्चा के कुछ सदस्यों ने बहकावे में आकर त्याग-पत्र दे दिया है।

ऐसे हथकंडों से विपक्ष मोदी-भाजपा को दुर्बल करने का अल्पकालिक लक्ष्य साध रहा है, परंतु लक्षद्वीप के विकास में वह किस प्रकार बाधा बन रहा है और हानि पहुँचा रहा है, यह विचारणीय पक्ष (प्रश्न) है। लक्षद्वीप ही नहीं, अपितु संपूर्ण भारत का विकास ऐसे विरोध से सहज संभव नहीं।

प्रफुल्ल पटेल द्वारा लाए गए मसौदा नियमों में ‘असामाजिक गतिविधि विनियमन अधिनियम’ (पासा) भी एक मसौदा नियम है। वास्तव में सार्वजनिक व्यवस्था को अक्षत बनाने की दृष्टि से यह अधिनियम समाजानुकूल ही है।

दुर्भाग्य कि हमारे समाज में आपद स्थिति में क़ानून न होने पर क़ानून क्यों नहीं बनाया गया इत्यादि जैसे भावावेशपूर्ण प्रश्न किए जाते हैं। अब जबकि अग्रिम रूप में अधिनियम बन रहे हैं, तब भी प्रश्न किए जा रहे हैं?

कुछ समाचार-पत्रों ने नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एलसीआरबी 2019) की रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि लक्षद्वीप में अपराधों के मामले नगण्य हैं। उनके अनुसार महिला छेड़छाड़ तथा यौन शोषण के कुछेक ही मामले हैं।

ऐसी रिपोर्टिंग के आलोक में प्रश्न यह भी उपस्थित होता है कि अपराध बढ़ने से पूर्व क़ानून बन जाने से क्या और किसे असुविधा हो सकती है? क्या क़ानून अधिकाधिक महिलाओं का यौन शोषण होने के उपरांत ही बनना-बनाना चाहिए?

सार्वजनिक व्यवस्था को अक्षत बनाए रखने से किसे समस्या हो सकती है? विकास विरोधी विपक्ष क्योंकर क़ानून-व्यवस्था को सुदृढ़ करने के पक्ष में नहीं है? ऐसे ही कुछ प्रश्नों में इनके विरोध के उत्तर मिल जाते हैं।

वैसे भी, इस विनियमन के अनुसार वही व्यक्ति हिरासत में लिया जाएगा जो सार्वजनिक व्यवस्था के प्रतिकूल कार्य करेगा। अर्थात् वह व्यक्ति जो मद्य-तस्कर (बूटलेगर) हो अथवा क्रूर हो, ड्रग्स का अपराधी, अनैतिक यातायात अपराधी, संपत्ति हड़पने वाला, साइबर अपराधी, सूदखोर, पर्यावरण विध्वंसक अथवा यौन अपराधी हो।

और यह अधिनियम लक्षद्वीप के लिए ‘अद्वितीय’ नहीं है। केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में ये नियम लागू हैं। स्मरणीय है कि देश को भ्रमित करने के लिए विकास विरोधी विपक्ष को कोई-न-कोई ‘मुद्दा’ चाहिए होता है। कोई मुद्दा ना हो तब भी वह बाल की खाल खींचने का काम करने से बाज़ नहीं आता।

एक और मसौदा ‘पंचायत चुनाव विनियम’ से संबंधित है। इसके अंतर्गत जिनके दो से अधिक बच्चे हैं, उन्हें पंचायत चुनाव की उम्मीदवारी प्राप्त नहीं हो सकेगी। आज भारत के लिए सोचने वाले प्रत्येक भारतीय के मन में यह प्रश्न अवश्य ही उठता होगा कि दो से अधिक बच्चों की आवश्यकता ही क्या है?

यदि प्रफुल्ल पटेल दो बच्चों वाला फार्मूला लक्षद्वीप में लागू करने की योजना बना रहे हैं तो भारत सरकार को इसे लगे हाथ हर क्षेत्र में यथावश्यक संशोधन-परिवर्धन के साथ लागू करना चाहिए। चूँकि लक्षद्वीप में मुस्लिम आबादी अधिक है, इसलिए यह नियम अनुचित है कहना निंदनीय है।

मुस्लिमों को प्रायः अलगा कर देखने की ‘कांग्रेसी सोच’ को अब विराम देने की आवश्यकता है। मुस्लिम भी निश्चय ही चाहते होंगे कि दो बच्चों वाली नीति देश ही नहीं, अपितु परिवार के विकास की दृष्टि से सर्वोत्तम एवं स्वीकार्य है।

वैसे, दो बच्चे के मानदंडों पर लक्षद्वीप के जिलाधीश ने औचित्यपूर्ण टिप्पणी की है– “2011 की जनगणना के अनुसार लक्षद्वीप का जनसंख्या घनत्व 2,149 प्रति व्यक्ति वर्ग किमी था, जो कि राष्ट्रीय औसत 382 प्रति व्यक्ति वर्ग किमी से बहुत अधिक है। हमारे पास सीमित भूभाग है। इसी क्षेत्र में संसाधनों और बुनियादी ढाँचे बनाने हैं।”

वैसे, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, उत्तराखंड और कर्नाटक पहले ही ऐसे क़ानून बना चुके हैं। इन राज्यों में जिनके दो से अधिक बच्चे हैं, वे पंचायत चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हैं। आशा है कि विकास विरोधी विपक्ष दो बच्चों वाली नीति का राजनीतिकरण नहीं करेगा।

आज नहीं तो कल देश को इस नीति को अपनाना ही होगा। अतः ‘काल करे सो आज कर’ – शुभस्य शीघ्रम! गौमांस सेवन प्रतिबंध की चर्चाओं ने भारतीय राजनीति में प्रायः हलचल पैदा की है। कई मीडियाकर्मी एवं एजेंट बुद्धिजीवी गौ-तस्करी, गौ-हत्या को ‘लिंचिंग’ का प्रमुख कारण मानते रहे हैं।

गौमांस सेवन वर्जित करने का मुख्य कारण धार्मिक बताया जाता है। ऐसे में जब प्रफुल्ल पटेल ‘लक्षद्वीप पशु संरक्षण विनियम’ लेकर आते हैं तो विपक्ष को ‘अल्पसंख्यकों’ पर धार्मिक खिलवाड़, दबाव, प्रताड़ना, उत्पीड़न इत्यादि का मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है। विपक्ष के लिए यह ‘मुद्दा’ किसी अन्य मुद्दे से अधिक कारगर प्रतीत होता (रहा) है।

यद्यपि इस विवाद के संबंध में भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं लक्षद्वीप के प्रभारी अब्दुल्लाकुट्टी ने कहा है– “विपक्ष अनावश्यक रूप से पशु संरक्षण नियमन को सांप्रदायिक रंग दे रहा है। हम दुधारू पशुओं को संरक्षित करना चाहते हैं। इसका लक्षद्वीप के मुस्लिम बहुल द्वीप और उनकी धार्मिक मान्यताओं से कोई लेना–देना नहीं है। यह कांग्रेस द्वारा फैलाया जा रहा शरारती प्रचार है।”

लक्षद्वीप के जिलाधीश ने इस विनियम को ‘नीतिगत निर्णय’ कहते हुए पूर्ण समर्थन दिया है। आस्कर अली ने कहा है– “हम दुधारू गायों को संरक्षित करना चाहते हैं। जो इसके अवैध कारोबार से जुड़े हैं और जिनके निजी हित हैं, केवल वे ही इस क़ानून के विरोध में प्रचार कर रहे हैं।”

वैसे, इस संदर्भ में हमें संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) का भी संदर्भ एवं संज्ञान लेना चाहिए। प्रायः यह भी सुनने में आता है कि गौमांस का सेवन मानव शरीर की लिए हानिकारक है। जबकि यूएनईपीने गौमांस को ‘पर्यावरणीय दृष्टि से भी हानिकारक’ बताया है।

1 ग्राम गौमांस पकाने में भी भारी ऊर्जा लगती है। औसतन एक हैमबर्गर के कारण पर्यावरण में 3 किलोग्राम कार्बन का उत्सर्जन होता है। किसी ऑटोमोबाइल वाहन के द्वारा 160 किमी की दूरी तय करने में जितनी मात्रा में ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन होता है, 1 किग्रा बीफ में उतनी ही मात्रा में ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन होता है।

वैसे, हिंदू धर्म में गाय को माता का दर्जा दिया गया है। यदि हिंदुओं की ‘जन भावना’ का भी ध्यान रखा जाए तो क्या बुरा है? इसी को दृष्टिगत रखते हुए लेख के आरंभ में हिंदुओं की ‘जन भावना’ का उल्लेख किया है। परंतु, तर्क-कुतर्क करने वालों की दृष्टि में लक्षद्वीप के संदर्भ में यह तर्क असंगत होगा, क्योंकि यहाँ 96 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम निवास करते हैं।

वैसे, अब्दुल्लाकुट्टी ने स्पष्ट कर ही दिया है कि विपक्ष अनावश्यक रूप से ‘सांप्रदायिक रंग’ दे रहा है। प्रायः मुस्लिमों का पक्ष लेने वाली कांग्रेस तथा महागठबंधन के साथी दलों के आचार-विचार-व्यवहार से यह स्पष्ट हो जाता है कि उन्हें हिंदुओं की ‘जन भावना’ से कोई सरोकार नहीं है।

एक और मसौदा ‘शराब पर प्रतिबंध’ हटाने के संबंध में है। इसे भी विपक्ष ‘मज़हब का रंग’ देकर चर्चा का मुद्दा बना रहा है। शराब पर प्रतिबंध होने के बावजूद इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता कि वहाँ अवैध रूप से शराब आती-जाती रही है। पर्यटन और अर्थव्यवस्था की दृष्टि से पर्यटक और सरकार शराब को जानती-समझती है।

प्रत्येक बात को ‘सांप्रदायिक कोण’ से देखने की विपक्ष के चाल-चलन (चरित्र?) को देश की जनता जान-समझ चुकी है। सब जान रहे हैं कि इस ‘सांप्रदायिक कोण’ (रंग?) के कारण नीतियों का कार्यान्वयन सहज संभव नहीं हो पाएगा और देश का विकास नहीं हो पाएगा।

यह भी विचारणीय है कि मसौदा नियमों को गृह मंत्रालय द्वारा मंजूरी देने के उपरांत केंद्रीय कैबिनेट उनकी संवीक्षा एवं विचार-विमर्श करती है तथा कैबिनेट की मंजूरी के उपरांत उन पर राष्ट्रपति की सहमति भी अनिवार्य होती है। राष्ट्रपति की सहमति के उपरांत ही नियमों को अधिसूचित किया जाता है।

अतः अभी मसौदा नियम संवीक्षा की प्रक्रिया में ही हैं परंतु जैसा कि विकास विरोधी विपक्ष का चरित्र रहा है, वह किसी बात के होने से पहले ही उसे ‘मुद्दा’ बना देता है और देश में चर्चा-अपचर्चा आरंभ कर देता है।

यदि संवीक्षा एवं सहमति के उपरांत भी विकास विरोधी विपक्ष का दोषारोपण चलता रहा तो समझ लेना चाहिए कि ‘संविधान ख़तरे में’ है क्योंकि यह विकास विरोधी विपक्ष प्रायः संविधान की प्रक्रिया को भी अनुचित मानता (रहा) है। लक्षद्वीप के बहाने हमें विकास विरोधी विपक्ष के चाल-चलन-चरित्र को पुनः एकबार जानने-समझने का सुअवसर मिल रहा है।

डॉ आनंद पाटील तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं। वे @AnandPatilCU के माध्यम से ट्वीट करते हैं।