राजनीति
ओली की निरंतर भारत-विरोधी मुद्रा दोनों देशों के संबंध को लंबे समय तक प्रभावित करेगी
Harshil Mehta - 18th July 2020

भगवान राम तो नेपाली हैं,” कुछ ही दिन पहले राष्ट्र को संबोधित करते समय नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने कहा। उन्होंने साथ ही कहा कि “भारत की अयोध्या नकली है” और “असली अयोध्या नेपाल के बीरगंज जिले में स्थित है।”

उनके इस बयान की वजह से दोनों देशो में एक नया-सा विवाद शुरू हो गया। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंडने इस बयान की निंदा करते हुए कहा कि ओली की टिप्पणियाँ “न तो राजनीतिक रूप से सही हैं, न ही कूटनीतिक रूप से बराबर हैं”। भारत में खुद को राम का वंशजकहने वाले अजीत रघुवंशी ने ओली को कानूनी नोटिस भेजकर माफ़ी माँगने की माँग की। 

ऐसा पहली बार नहीं है कि वर्तमान के नेपाली प्रधानमंत्री ने भारत के विरुद्ध कुछ विवादित बयान दिया हो। भारत-विरोधी बयान देना तो मानों उनकी एक आदत-सी बन चुकी है। नेपाल में अभी उनकी सरकार हर मोर्चे पर निष्फल रही है, उनकी पार्टी में ही उनके विरुद्ध में एक वातावरण बन चुका है और उनके इस्तीफे की माँग भी बार-बार होती आई है।

इस परिस्थिति में ओली हर हालत में अपनी कुर्सी बचाए रखना चाहते हैं और उसके लिए वे नेपाली राष्ट्रवाद को भड़का रहे हैं। नेपाल के साम्यवादी प्रधानमंत्री स्वाभाविक रूप से चीन से निकट हैं तो ऐसे में भारत के खिलाफ बोलने से वह चीन की दृष्टि में हीरो बने रहेंगे और साथ ही लोगों के अंदर एक राष्ट्रवाद की भावना भड़काने में सफल भी हो सकेंगे।

उनके भारत-विरोधी बयानों का सिलसिला नेपाल के नए मानचित्र को लाने से शुरू हुआ। दीर्घ समय से भारत द्वारा प्रशासित लिम्पियाधुरा, लिपुलेख व काला पानी विस्तार को नेपाल के नए मानचित्र में शामिल किया गया और उसके लिए संसद में संशोधन को पारित भी किया गया। उसी दौरान ओली ने फिर से भारत के खिलाफ लोगों को भड़काने वालें बयान दिए।

ओली ने भारत की सिंहों वाली राजमुद्रा को निशाना बनाते हुए कहा कि भारत के साथ उनके संघर्ष में “सत्यमेव जयते” होगा न कि “सिंहमेव जयते”। इसी के साथ उन्होंने यह तक कह दिया, “भारत से आया हुआ कोरोनावायरस चीन में उत्पन्न हुए कोरोनावायरस से ज्यादा खतरनाक है।” 

10 जून को फिर से उन्होंने नेपाल में फैली कोरोनावायरस की महामारी के लिए भारत को ज़िम्मेदार ठहराया और बिना किसी वैज्ञानिक आधार के दावा किया कि नेपाल के 85 प्रतिशत मामले भारत से आए। 28 जून को ओली ने फिर से एक बार भारत पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि उनको प्रधानमंत्री के पद से हटाने की कोशिश के खेल नई दिल्ली में खेले जा रहे हैं।

ये बयान और ओली की हरकतें भारत-नेपाल संबंध के लिए सच में हानिकारक हैं। सबसे पहला तो इससे भारत की छवि नेपाल में खराब होगी। भारत की प्रारंभिक वर्षों से एक नीति रही है- अन्य देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना।

ओली के बयान उस नीति पर ही सीधा प्रश्न खड़ा कर देतें हैं। वर्तमान राजकीय परिस्थिति के आधार पर आसानी से कहा जा सकता है कि ओली का जाना तो निश्चित है परंतु वे भारत पर एक शंका खड़ी कर जाएँगे। उनके आंतरिक संघर्ष की वजह से हुए इस्तीफ़े के बावजूद भी सामान्य नेपाली भारत पर शंका की नज़र से देखेगा।

दूसरी ओर भारत के पक्ष में बोलने वाले नेपाली भी हैं लेकिन नए राष्ट्रवाद के कारण वे मौन रहना पसंद करेंगे। इसका उदाहरण नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी की सांसद सरिता गिरी से बेहतर कोई और नहीं हो सकता।

नेपाली संसद में जब मानचित्र में संशोधन के लिए विधेयक पारित किया जा रहा था तब गिरी इसके विरुद्ध खड़ी हुई थी और इस विधेयक को वापिस लिया जाना चाहिए, ऐसा उनका मत था। कुछ ही समय बाद उनके घर पर काले ध्वज लहराए गए, उनके विरुद्ध नारेबाज़ी हुई और उन्हें भारत जाने की धमकियाँ भी दी गईं। कुछ दिनों पहले ही उनको पार्टी से भी निकाल दिया गया।

तीसरा, भारत में रहने वाले नेपाली और नेपाल में रहने वाले भारतीयों के लिए भी यह हानिकारक होगा। एक आम भारतीय और नेपाली के बीच की खाई दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। इसका सीधा लाभ असामाजिक तत्वों को होगा जिनकी राजनीति की बुनियाद भारत और नेपाल की शत्रुता पर आधारित होगी।

लगता है कि ओली के भारत-विरोध का यह सिलसिला अविरत रूप से चालू ही रहेगा। भविष्य में जब भी उनकी सरकार पर थोड़ा बहुत भी संकट आएगा, वह भारत के सिर अपनी नाकामी का ठीकरा फोड़ देंगे। उनके बयानों का स्तर इससे भी नीचे जाए तो उसमें आश्चर्य नहीं होगा।

हर्षिल महेता एक विद्युत अभियंता, स्तंभ-लेखक और राजनीतिक समीक्षक हैं। वे @MehHarshil के माध्यम से ट्वीट करते हैं।