राजनीति
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में प्रभुत्व रखने वाले प्रमुख कारक- भाग 1
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के साथ प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी

प्रसंग
  • पाँच प्रमुख कारक जो यह निर्धारित करेंगे कि छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव कौन जीतेगा।

छत्तीसगढ़ में एक आकर्षक प्रतियोगिता चल रही है, जहाँ कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर को भुनाने और वापसी करने का लक्ष्य रख रही है, वहीं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपनी स्थिति को और अधिक मजबूत करने की उम्मीद कर रही है। चुनावों में जीत या हार किसी एक कारक पर नहीं बल्कि कई कारकों पर निर्भर करती है। यह दो भाग वाली श्रृंखला में से पहला है जिसमें हम उन मुद्दों को सम्मिलित करने का प्रयास करेंगे, जो राज्य चुनावों में प्रभावी हो सकते हैं।

  1. सोशल इंजीनियरिंग

भारत के अधिकांश राज्यों की तरह छत्तीसगढ़ भी जाति आधारित राजनीति से अछूता नहीं है। राज्य की आबादी का लगभग एक तिहाई भाग अनुसूचित जनजाति (एसटी) का है, जबकि 12 प्रतिशत से अधिक आबादी अनुसूचित जाति (एससी) की है| वहीं अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का 41 प्रतिशत, सवर्ण का 9 प्रतिशत, मुस्लिमों का 2 प्रतिशत और अन्य का 4 प्रतिशत हिस्सा है। छत्तीसगढ़ में 90 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से 29 एसटी के लिए और 10 एससी के लिए आरक्षित हैं। सवर्ण और ओबीसी ने परंपरागत रूप से भाजपा का समर्थन किया है। जहाँ एसटी समुदाय के वोट कांग्रेस और भाजपा के बीच समान रूप से विभाजित हैं, वहीं एससी समुदाय के वोट कांग्रेस, भाजपा और बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के बीच विभाजित हैं। वर्ष 2013 में जहाँ कांग्रेस ने 29 आरक्षित सीटों में से 18 सीटें जीतीं थीं वहीं भाजपा ने 10 में से 9 एससी आरक्षित सीटों पर कब्जा किया था।

चुनाव में अजीत जोगी के प्रवेश ने मामले को जटिल बना दिया है, क्योंकि सतनामी दलित समुदाय (भाजपा का गढ़) और जनजातीय समुदाय (कांग्रेस का गढ़) पर उनका महत्वपूर्ण प्रभाव है। उनसे आगे निकलने के लिए सभी पार्टियां प्रत्येक सीट पर सही जाति संयोजन बनाने का प्रयास कर रही हैं। आश्चर्य है कि एससी-एसटी अधिनियम में केंद्र के संशोधन के खिलाफ सवर्णों द्वारा राज्य में आंदोलन का ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा है। हालांकि सामान्य वर्ग अपनी कम आबादी के कारण चुनाव जीतने में महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाता है, लेकिन कैबिनेट के लगभग आधे पदों पर उनका कब्जा होता है।

जातिवार विश्लेषण (स्रोत: सीएसडीएस रिपोर्ट्स, www.politicalbaba.com)

 

  1. लीडरशिप रेटिंग

भाजपा इस बार राज्य विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के करिश्मे के साथ-साथ मुख्यमंत्री रमन सिंह की लोकप्रियता और उनकी लोकप्रिय योजनाओं का पूरा फायदा उठाने की उम्मीद कर रही है। एबीपी-सी वोटर सर्वे ने कांग्रेस की जीत की भविष्यवाणी की, लेकिन इसमें 34 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने रमन सिंह को अगले मुख्यमंत्री के रूप में देखने की इच्छा जताई, जबकि 17 प्रतिशत के साथ अजीत जोगी दूसरे स्थान पर रहे। हमने हालिया राज्य चुनावों मे देखा है कि जिस पार्टी का उम्मीदवार लोकप्रियता की रेटिंग में आगे रहता है, आमतौर पर वही चुनाव जीतता है। कांग्रेस के लिए परेशानी यह बनी हुई है कि इसके नेता भूपेश बघेल और टी एस सिंह देव ने अजीत जोगी से कम प्रतिशत हासिल किया है।

इंडिया टुडे – एक्सिस माईइंडिया पॉलिटिकल स्टॉक एक्सचेंज (पीएसई) में भी, 41 प्रतिशत के साथ रमन सिंह अपने प्रतिद्वंदी बघेल (21 प्रतिशत) से आगे हैं। 2014 लोकसभा चुनावों में भी रमन सिंह फैक्टर ने एक अहम भूमिका निभाई थी। राज्य में मोदी फैक्टर का असर कम रहा था और केवल 10 प्रतिशत भाजपा समर्थकों ने ही पार्टी के लिए मतदान किया था क्योंकि मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे, जिनका राष्ट्रीय औसत 27 प्रतिशत था। अब यह देखा जाना बाकी है कि क्या यह अब भी उतना ही मजबूत है या इसको मोदी द्वारा धक्का लगाने की जरूरत है। लोकप्रियता की दौड़ में मोदी ने 59 प्रतिशत रेटिंग हासिल की है जो उनको अगला प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं जबकि 34 प्रतिशत लोगों ने राहुल गांधी को अगले प्रधानमंत्री के रूप में चुनना पसंद किया है।

रमन फैक्टर और मोदी फैक्टर

रमन फैक्टर और मोदी फैक्टर

  1. महागठबंधन

छत्तीसगढ़ के चुनाव हमेशा पेचीदा रहे हैं। 2013 में भाजपा और कांग्रेस के बीच वोट शेयर का अंतर सिर्फ 0.7 प्रतिशत था। औसतन 5 प्रतिशत वोट शेयर और 12 प्रतिशत अनुसूचित जातियों के समर्थन के साथ राज्य में बसपा की अच्छी मौजूदगी है। इसीलिए राज्य में गठबंधन करने के लिए कांग्रेस मायावती की बसपा को लुभा रही है। 2013 में अगर बसपा और कांग्रेस एक साथ मिलकर चुनाव लड़ते तो चुनावी परिणाम अलग होते और गठबंधन ने 90 में से 52 सीटों पर जीत दर्ज की होती।

10 एससी सीटों में से भाजपा और गठबंधन ने पाँच-पांच सीटों पर जीत प्राप्त की होती। मायावती की ताकत गठबंधन सहयोगी को वोट स्थानांतरित करने की उनकी क्षमता है। अभी तक बातचीत को अंतिम रूप नहीं दिया गया है क्योंकि मायावती तीन राज्यों में पैकेज सौदे की माँग कर रही हैं, इन तीनों राज्यों में इस साल के अंत में या अगले साल लोकसभा चुनाव होने हैं। जोगी भी बसपा के साथ गठबंधन करने के लिए उत्सुक हैं। बसपा की राज्य में काफी माँग है।

  1. दोनों पार्टियों में गुटबंदी

छत्तीसगढ़ में चुनाव पारंपरिक रूप से कांग्रेस और भाजपा के बीच दो घोड़ों की दौड़ है। राज्य में कांग्रेस दलों और उप-दलों में बंटी है। भूपेश बघेल, टी. एस. सिंह देव और चरन दास महंत प्रमुख दलों की अगुवाई कर रहे हैं। पार्टी की अंदरूनी उठा-पटक के कारण मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा नहीं की गई है, जो जोखिम भरा साबित हो सकता है। जोगी का कांग्रेस छोड़कर अपनी नई पार्टी बनाना कांग्रेस के अंदर लंबे समय तक चलने वाली लड़ाई का ही नतीजा था। वह अभी भी कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय चेहरा बने हुए हैं। अब जब राहुल गांधी ने अगुवाई की जिम्मेदारी अपने सर ले ली है तो वह यात्राओं और रैलियों के माध्यम से चुनाव में पार्टी का नेतृत्व करेंगे। मेरे हिसाब से, मध्य प्रदेश और राजस्थान की तुलना में इस राज्य पर उनका अधिक ध्यान हो सकता है।

  1. पार्टियों की प्रचार रणनीति

यह व्यापक रूप से स्वीकृत है कि जहाँ भाजपा राज्य में एक विशाल और शक्तिशाली संगठन है वहीं कांग्रेस इस तरह की कैडर उपस्थिति से बौखलाई हुई है। बघेल और सिंह देव ब्लॉक और मंडल स्तर पर पार्टी की संरचना को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा के पन्ना प्रमुख के अनुसार, कांग्रेस भी बूथ प्रबंधकों का अपना जत्था तैयार कर रही है। दोनों पार्टियों ने अपने राजनीतिक संदेश का प्रसार करने के लिए सैकड़ों वाट्सऐप ग्रुप बनाए हैं। रमन सिंह ने चौथे चरण के लिए वोट मांगने के लिए एक जनसंपर्क कार्यक्रम में सभी निर्वाचन क्षेत्रों को शामिल करते हुए एक राज्यव्यापी अटल विकास यात्रा का शुभारंभ किया है। भाजपा ने ‘नवा छत्तीसगढ़ 2025’ की योजना निर्धारित की है और एक ‘अटल दृष्टि पत्र’ तैयार किया है।

राज्य के नागरिक इस पत्र पर अपने विचार और सुझाव साझा कर सकते हैं जिसे रमन सिंह के शासन में सहभागिता के रूप में देखा जाता है। कांग्रेस टी-शर्ट के एक अनोखे तरीके के माध्यम से इसका जवाब दे रही है। कांग्रेस ने भाजपा सरकार की खिल्ली उड़ाने के लिए ‘उड़ गई विकास की चिड़िया’ प्रचार वाक्य वाली 1 लाख से अधिक टी-शर्ट छपवाकर बांटी हैं।

ओपिनियन पोल्स क्या कहते हैं?

एबीपी-सी मतगणना सर्वेक्षण 90 सीटों में से 54 सीटों के साथ कांग्रेस की जीत का अनुमान लगाता है, जबकि इंडिया टुडे-ऐक्सिस भाजपा की जीत का अनुमान लगाता है और 50 प्रतिशत उत्तरदाता राज्य सरकार के प्रदर्शन से संतुष्ट हैं। सार्वजनिक भविष्यवाणी मंच क्राउडविजडम ने भाजपा द्वारा 42, कांग्रेस द्वारा 41, जोगी कांग्रेस द्वारा 5 और बसपा द्वारा 2 सीटें जीतने के साथ त्रिशंकु विधानसभा का अनुमान लगाया है। संक्षेप में, कई कारकों का पेचीदा खेल यह निर्धारित करेगा कि छत्तीसगढ़ का चुनाव जीतने का गौरव किसे मिलता है। खुशबू कुमारी के इनपुट्स के साथ।

अमिताभ तिवारी एक पूर्व कॉर्पोरेट और निवेश बैंकर है जो राजनीति और चुनावों में अपनी रुचि का अनुसरण रहे हैं। उपरोक्त विचार व्यक्तिगत हैं। इनका ट्विटर हैंडल @politicalbaaba है।