राजनीति
हेडगेवार ने कांग्रेस के विषय में 1925 में जो जाना, वह कांग्रेसी आज तक नहीं समझ पाए

कांग्रेस में आंतरिक कलह की बातें चल रही हैं लेकिन अंदाज़ा लगाइए कि हेडगेवार कितने दूरदर्शी थे, वे 1925 में ही कांग्रेस से अलग हो गए थे। यानी वे उसी समय समझ गए थे कि कांग्रेस में लोकतंत्र नहीं है, अगर देश को स्वस्थ लोकतंत्र यानी प्रकारांतर से स्वस्थ भविष्य देना है तो इस संस्था का राजनीतिक विकल्प देना होगा।

वे उसी समय सक्रिय-राजनीति से बाहर आ गए और स्वस्थ लोकतंत्र के लिए समर्पित मस्तिष्क और शरीर तैयार करने के काम में लग गए। उन्होंने कांग्रेस को काफी करीब से जाना था इसलिए अपनी बनाई संस्था का ढाँचा ऐसा निर्मित किया कि यहाँ कभी परिवार की न चल सके। आप आरएसएस या भाजपा में परिवार के वर्चस्व की कल्पना भी नहीं कर सकते।

पूरी संस्था का सेटअप ऐसा है कि योग्यता के बल पर ही ऊपर चढ़ने का अवसर मिल सकता है। भले ही आप वाजपेयी, आडवाणी, भागवत, सुदर्शन या स्वयं हेडगेवार के ही परिवार के क्यों न हों, केवल इस आधार पर आप आरएसएस या भाजपा के प्रमुख या नीति-निर्धारक नहीं बन सकते।

इस संस्था का ढाँचा ऐसा है कि इसे कार्यकर्ता ही चलाते हैं। मतलब यह नहीं हो सकता कि अध्यक्ष या प्रधानमंत्री जो मन कर लें। वाजपेयी ने गुजरात दंगों के बाद सोचा मोदी को निलंबित कर दें लेकिन गुजरात के मुख्यमंत्री कार्यकर्ताओं के दिलों के सम्राट बन चुके थे। पार्टी के सबसे कद्दावर नेता भी अपने फैसले को पार्टी पर नहीं थोप सके। बल्कि खुद वे अप्रासंगिक हो गए लेकिन मोदी को नहीं हटा सके क्योंकि कार्यकर्ता नहीं चाहते थे।

2013 में जब आडवाणी भी मोदी की दावेदारी को रोक रहे थे तब भी कार्यकर्ताओं ने अड़ंगा डाल दिया। तो सोचिए, एक तरफ कांग्रेस का परिवारवाद और उसके विलोम में ऐसी राजनीतिक संस्था जहाँ कार्यकर्ताओं की चलती हो। सोशल मीडिया तो अब आया है लेकिन हेडगेवार ने तो उसी समय संस्था की कमान जनता (कार्यकर्ताओं) के हाथों में दे दी थी।

इस मनःस्थिति और ढाँचे से बनी संस्था की आने वाले दिनों में कितनी बड़ी राजनीतिक स्वीकार्यता होगी, यह हेडगेवार को 1925 में ही समझ में आ गया था। ऐसा इसलिए क्योंकि वे स्वभाव से बद्धमूल लोकतांत्रिक थे और कांग्रेस के अलोकतंत्र को अच्छे से समझते थे।

आप कल्पना कीजिए कि अगर आरएसएस (जनसंघ/भाजपा) का जन्म न हुआ होता तो आज क्या स्थिति होती। देश में एकल-सत्तावादी विमर्श चल रहा होता। तब रात को दिन और दिन को रात कहने पर भी आपको यकीन करना होता बल्कि जनता दल और फिर भाजपा के अभ्युदय के पहले तक यही होता भी रहा है।

महात्मा गांधी ने अपने मन के अनुसार कार्य किया, पाकिस्तान को पैसे दिए, कभी आंदोलन शुरू, कभी बंद किया। नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक के समय को भी उठाकर देख लीजिए, इन दलों ने जो-जो राजनीतिक बातें कीं, उन्हें निर्विरोध मान लिया जाता रहा। उसके विरोध में बोलने वाले एकेडेमिक्स द्वारा द्रोही करार दिए जाते।

किसी भी लोकतंत्र की धुरी या स्तंभ चाहे जितने हों लेकिन मूल में दो ही अवधारणाएँ हैं जिनके बिना लोकतंत्र असफल हो जाता है। पहला, आलोचना और दूसरा, संवाद। भाजपा के जन्म से पहले देश में इन दोनों का ही अभाव रहा है। कांग्रेस एकतरफा रही है।

सही मायने में इस लोकतंत्र को आलोचनात्मक विकल्प आरएसएस (भाजपा) ने ही दिया। अगर यह संगठन न आया होता तो भारत की जनता विकल्पहीन इस परिवार की सनक की भेंट चढ़ती रहती। बलपूर्वक नसबंदी, आपातकाल जैसी घटनाएँ इस सनक के ही उदाहरण हैं। आरएसएस ने देश को एकतरफा राजनीतिक सनक की भेंट चढ़ने से बचाया है। उसने लोकतंत्र को बुनियाद दी है।

आज कांग्रेस के अंदर कितना लोकतंत्र है यह पूरा देश देख रहा है। कांग्रेस की पीआर टीम जिस राहुल गांधी को नेता बनाने के लिए कमर कस चुकी है। राहुल को विनम्र और लोकतांत्रिक नेता के रूप में प्रोजेक्ट करने की रणनीति इसलिए असफल हो गई है क्योंकि असल में वे न ही लोकतांत्रिक हैं और न ही विनम्र।

यूपीए के कार्यकाल में मनमोहन सिंह को दो कौड़ी का समझने से लेकर ऑर्डिनेंस फाड़ने तक और सार्वजनिक मंचों पर अहंकारी नेता की बॉडी-लैंग्वेज से लेकर कांग्रेसी कार्यकर्ताओं और नेताओं को मिलने के लिए समय न देने तक की सारी अलोकतांत्रिक हरकतें राहुल के स्वभाव में बद्धमूल हैं।

इसके अतिरिक्त वे राजनीति को अर्धकालिक व्यवसाय (पार्ट-टाइम जॉब) की तरह अगंभीरता से लेते हैं। ऐसी मनःस्थिति के नेता को इतनी बड़ी पार्टी और प्रकारांतर से देश सौंपने की हरकत या कोशिश के लिए कांग्रेस अक्षम्य है।

जो नेता देश के किसी मुद्दे पर पाँच पंक्तियों तक की निजी राय न रखता हो, उसे लोकतंत्र का प्रहरी बनाना इस देश की जनता से तो नहीं ही होगा, खासकर तब जब यह जनता राजनीतिक रूप से इतनी प्रखर है। उसकी प्रखरता का पता तो सोशल मीडिया के आने के बाद पूरे विश्व को चल गया है।

नेहरू-गांधी परिवार के नाम पर राजनीतिक रोटियाँ खाने की आदत पड़ चुकी कांग्रेसी जमात को आलस्य ने बुरी तरह घेर रखा है वरना कर्मठ लोग इस सड़ चुके नेतृत्व को कबका ठोकर लगाकर आगे बढ़ जाते। (लेकिन योग्य और विरोधी को यह पार्टी सदैव दुत्कारती है। सुभाषचंद्र बोस इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं।)

देश की जनता में ‘नेहरू-गांधी परिवार का क्रेज़’ वाले तर्क का खंडन मैं उस व्यक्ति के उदाहरण से करता हूँ जिसने 1925 में गांधी-पटेल, नेहरू, तिलक, गोखले आदि नेताओं के युग में अकेले कांग्रेस को पछाड़ने की मंशा से संस्था बनाने की हिम्मत की। ऐसे में आज 2020 में इतने मज़बूत सेटअप के बावजूद राहुल गांधी जैसे अयोग्य व्यक्ति में विकल्प ढूंढने का क्या औचित्य।

आरएसएस को गालियाँ दे लीजिए, हेडगेवार पर अट्टाहास कर लीजिए लेकिन अकेले अपने बूते पर इतने बड़े देश में, इतने ताकतवर लोगों की ताकतवर सेंटिंग्स के समक्ष यह सोचना- “मैं देश की राजनीति को विकल्प दूँगा”, केवल इस भावना के लिए भी हेडगेवार प्रणम्य हैं। आज तो उनका देखा सपना न सिर्फ सच हुआ है बल्कि ऐसा सच हुआ है कि दुनिया में उनके द्वारा बनाई संस्था से बड़ी कोई दूसरी संस्था नहीं है।

मैं भारतीय राजनीति में केशव बलिराव हेडगेवार को गांधी के ही समतुल्य महान व्यक्तित्व मानता हूँ क्योंकि कांग्रेस के रूप में अगर वे देश की मुख्यधारा को निर्मित कर रहे थे तो हेडगेवार उस मुख्यधारा के विकल्प के लिए मंच तैयार कर रहे थे। मैं आरएसएस और भाजपा से इसलिए नाराज़ रहता हूँ कि उन्होंने हेडगेवार को उनका उचित राजनीतिक कद अब तक नहीं दिया है। मैं हेडगेवार को भी महात्मा जैसी संज्ञा के सर्वथा उपयुक्त मानता हूँ।

धन्यवाद महात्मा केशव बलिराम हेडगेवार।

आदित्य सेठ आनंदराम जयपुरिया कॉलेज, कोलकाता में अध्यापक हैं। वे @adityakumargiri के माध्यम से ट्वीट करते हैं।