राजनीति
केरल यौन उत्पीड़न मामला – कम्यूनिस्ट सरकार इतनी उदासीन क्यों?
केरल यौन उत्पीड़न मामला – कम्यूनिस्ट सरकार इतनी उदासीन क्यों?

प्रसंग
  • महिला सुरक्षा पर कम्यूनिस्ट का रिकार्ड काफी खराब रहा है। इस समय लोगों को न्याय के लिए अनिच्छुक केरल सरकार पर पर्याप्त दबाव डालना चाहिए

केरल पिछले कुछ महीनों से यौन हिंसाओं के लिए सुर्खियों में रहा है। इनमें से कुछ मामलों में चर्च का नाम आ रहा है। हालांकि, हाल ही के दो मामलों में भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी की अगुवाई वाली लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट पार्टी का महिला सुरक्षा के मामले में कामुक और नाजुक रूख सामने आया है।

ऐसा ही एक मामला और सामने आया है जिसमें डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया के एक नेता ने केरल विधानसभा में भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी के नेता पी.के. ससी पर यौन शोषण का आरोप लगाया है। डीवाईएफआई के नेता ने सीपीआई-एम पार्टी के उच्च अधिकारियों तक अपना मामला उठाया है लेकिन अभी तक कोई कार्यवाई नहीं की गई है। अपने दुख को व्यक्त करने के लिए केरल महिला आयोग की प्रमुख एम. सी. जोसेफ़ाइन ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा है कि “गलतियाँ हो जाती हैं।” जबकि राष्ट्रीय महिला आयोग ने एक मामला दर्ज किया है, केरल महिला आयोग और सीपीआई-एम के बीच विरोध जारी है।

दूसरा मामला, एक नन द्वारा मिशनरी ऑफ जीसस बिशप फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ शिकायत का है। नन ने जून ने शिकायत की थी कि 2014 से 2016 के बीच कोट्टायम के निकट कुरविलंगद में एक कॉन्वेंट (विहार) में मुलक्कल ने उसका यौन उत्पीड़न और बलात्कार किया था। पुलिस इस मामले की जाँच कर रही है, लेकिन पुलिस की कार्यवाई से नाखुश नन मुलक्कल की गिरफ्तारी की माँग पर अमादा है।

चर्च ने बिशप को बचाने की कोशिश की है, जो खुद ही शिकायत को वापस लेने की कोशिश में नन को लुभाने के लिए उसके सामने नकदी और खुशामद की पेशकश कर रही है। केरल हाई कोर्ट ने अब इस मामले में दखल देते हुए मामले की प्रोग्रेस रिपोर्ट तलब की है। दूसरी तरह, पीड़ित नन को निर्दलीय विधायक पी.सी. जॉर्ज के मौखिक हमलों का सामना करना पड़ा जबकि मिशनरी ऑफ जीसस, जो रोमन कथलिक चर्च तक बात पहुंचता है, मुलक्कल के समर्थन में आगे आ गया है।

अगर कोई इस बात को लेकर आश्चर्यचकित है कि “सीपीएम की अगुआई वाली सरकार की “हम परवाह नहीं करते हैं”, तो आधुनिक इतिहास के कुछ अनुस्मरण निम्नलिखित हैं। ये प्रकट करेंगे कि कम्युनिस्ट नेतृत्व में महिलाओं के खिलाफ भेदभाव और उनके मामलों को बर्खास्त करना कोई नई बात नहीं है।

1987 के केरल विधानसभा चुनावों पर ध्यान दें तो पाएंगे कि सीपीआई-एम ने केआर गौरी अम्मा को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया था। एलडीएफ ने 78 सीटों के साथ चुनाव जीता लेकिन सीपीआई-एम की नीति निर्माण समिति द्वारा गौरी अम्मा के नेतृत्व को अस्वीकार कर दिया गया था। इनके स्थान पर 70 वर्षीय ई. के. नायनार को मुख्यमंत्री बनाया गया था। याद रखिए, यह वही थे जो अपनी टिप्पणी, कि “अमेरिका में जैसे चाय पीना आम बात है वैसे ही बलात्कार”, के लिए लोकप्रिय थे। अंततः गौरी अम्मा, जो एझावा समुदाय से ताल्लुक रखती हैं जिसका समर्थन सीपीआई-एम को मिलता है, को बाहर कर दिया गया और उन पर अपनी पार्टी बनाने का दबाव डाला गया।

नायनार ने अभी तक बलात्कार पर टिप्पणियाँ करना बंद नहीं किया है। 1996-2001 के दौरान, सूर्यनेल्ली बलात्कार मामला या सेक्स कांड ने केरल को झकझोर कर रख दिया। फिर इस कलंकित घटना पर उन्होंने टिप्पणी की, “इस पर इतना बखेड़ा क्यों खड़ा किया जा रहा है जबकि बलात्कार तो हर समय होते रहते हैं।” इसका मुख्य आरोपी धर्मराजन था जो कि एक सीपीआई-एम कार्यकर्ता था। जिस मामले में राज्यसभा के पूर्व डिप्टी चेयरमैन पी. जे. कुरियन का नाम भी घसीटा गया था उसमें इतनी लापरवाही बरती गई कि मुख्य आरोपी के अलावा अन्य सभी आरोपी फरार हो गए थे। 16 वर्ष की दुष्कर्म पीड़िता और उसका परिवार पूरी तरह बिखर गए और हमेशा के लिए बर्बाद हो गए थे।

जब नरेंद्र मोदी सरकार ने बाल यौन उत्पीड़न के आरोपियों को मृत्युदंड का  अध्यादेश जारी किया तो सीपीआई-एम की नीति निर्माण समिति की सदस्या वृंदा करात इसकी आलोचना करने वाली पहली महिला थीं। केंद्र में अध्यादेश को लेकर आलोचना करते हुए उन्होंने कहा, “असली मुद्दा यह है कि जो लोग सरकार में हैं वे ही बलात्कारियों का बचाव कर रहे हैं।“ (कठुआ मामले के संदर्भ में उनका आरोप)। आश्चर्य की बात है कि क्या यह संदर्भ केरल में उनकी सरकार का था?

पिछले साल, पिनाराई विजयन सरकार ने कथित तौर पर महिलाओं पर घात लगाने और बलात्कार के मामले में कांग्रेस विधायक एम विंसेंट को गिरफ्तार करने में काफी तत्परता प्रकट की थी। ऐसा क्यों है कि कम्युनिस्ट सरकार अपने विधायक ससी या बिशप मुल्लाकल, जो विशेष रूप से मामले को दबाने की कोशिश कर रहा है, के मामले में वही तत्परता नहीं

इन सबसे ऊपर, सीपीआई-एम के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री वी एस अच्युतानंदन ने इस साल जून में केरल उच्च न्यायालय में निचली अदालत के आदेश को चुनौती दी, जिसमें आइसक्रीम पार्लर मामले में आगे की जांच को खारिज कर दिया था। अच्युतानंदन ने पिनारायी सरकार पर आरोप लगाया है कि वह पूरी तरह से जांच किए बिना किसी मामले के मुकदमें को बंद करने का प्रयास कर रही है।

चर्च ने बिशप मुल्लाकल के मामले में भी खुद को बचाने का प्रयास नहीं किया है। पिछले वर्ष, चर्च ने बांग्लादेशी द्वारा कोलकाता में एक नन के बलात्कार का जोरदार विरोध किया। अब, यह बिशप की रक्षा करने की कोशिश कर रहा है। चर्च के प्रति यह द्वेषपूर्ण रवैया  क्यों?

मई 2016 में, जब केरल के एरणाकुलम जिले के पेरुम्बावूर में एक अनुसूचित जाति की एक युवा लड़की के साथ बलात्कार और हत्या कर दी गई थी, तो सीपीआई-एम पोलित ब्यूरो ने एक बयान जारी किया था:

“पोलित ब्यूरो ने मांग की है कि महिला के साथ क्रूरता से किया गया बलात्कार और भयानक हिंसा की जांच उच्च स्तरीय जांच महिला पुलिस अधिकारी की अध्यक्षता में एक जांच समिति को सौंपी जानी चाहिए। अपराधियों को पकड़ने के लिए तत्काल कदम उठाए जाएंगे और निर्भया कांड के बाद आपराधिक कानूनों में किए गए संशोधन के साथ फास्ट ट्रैक कोर्ट के माध्यम से उन्हें पकड़ा जाना चाहिए। मामले को दबाने का प्रयास करने वालों के खिलाफ कार्यवाही भी शुरू की जानी चाहिए।”

 4 मई 2016 को सीपीआई-एम पोलित ब्यूरो

क्या सीपीआई-एम पोलित ब्यूरो ने इस प्रेस नोट को इसलिए जारी किया क्योंकि तब राज्य में चुनाव होने वाले थे? क्या सीपीआई-एम पोलित ब्यूरो ने इस तरह के यौन शोषण के मामलों पर अपने बयान पढ़े हैं। तो इन मामलों में अपने बयानों के हिसाब से कार्यवाही क्यों नहीं कर रहे?

महिला सुरक्षा पर कम्युनिस्ट रिकॉर्ड निराशाजनक रहता है। केरल सरकार पर पर्याप्त दबाव डालना लोगों पर निर्भर करता है कि वह न्याय करने के लिए अनिच्छुक हैं।

एमआर सुब्रमणि स्वराज्य के कार्यकारी संपादक हैं। वे @mrsubramani पर ट्वीट करते हैं।