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क्या बेहतर बाँध प्रबन्धन बचा सकता था केरल में जीवन?
क्या बेहतर बाँध प्रबन्धन बचा सकता था केरल में जीवन?

प्रसंग
  • केरल के बांधों में ऊपरी सीमा तक पानी का संचय करने और उसको अचानक छोड़ने के परिणामस्वरूप भारी बाढ़ आ गई।
  • पानी को धीरे धीरे छोड़कर आपदा की तीव्रता को कम किया जा सकता था।

पिछले कुछ हफ्तों से हर जगह केरल के खौफनाक दृश्य हावी रहे हैं क्योंकि राज्य ने लगभग एक शताब्दी में आई सबसे भयानक बाढ़ का सामना किया है। मानसून से पहले आई बारिश ने केरल को नुकसान पहुँचाना करना शुरू कर दिया, जून 2018 में जारी नीति आयोग की समग्र जल प्रबंधन सूची ने जल संसाधन प्रबंधन के संदर्भ में केरल को बारहवां स्थान दिया, क्योंकि इसने जल प्रबंधन के कार्य के लिए औसत से भी कम अंक हासिल किए थे।

इसके अलावा, गृह मंत्रालय ने अपनी बाढ़ की अतिसंवेदनशीलता सूची में केरल को बाढ़ के सन्दर्भ में सातवें सबसे संवेदनशील राज्य के रूप में सूचीबद्ध किया। इस सूची का निर्माण कुछ मानदण्डों, जैसे 1950 से 2016 तक की अवधि में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों और अन्य कारकों के अलावा बाढ़ के लिए अतिसंवेदनशील मेट्रोपॉलिटन और बड़े शहरों के आधार पर किया गया था। यह सूची इस जानकारी पर जोर देती है कि बाढ़ के विषय में केरल खतरे के उच्च स्तर का सामना करता है।

अब जब पानी का स्तर घट रहा है, तो कई जगहों से यह प्रश्न उठाए जा रहे हैं कि क्या अत्याधिक वर्षा से उत्पन्न होने वाली स्थिति को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता था या नहीं। राज्य के बांध प्रबंधन के कार्य पर सवाल उठाए जा रहे हैं क्योंकि 35 बाँधों को एकसाथ पिछले कुछ समय में नहीं खोला गया था।

अधिकतर प्रश्न राज्य के बांध प्रबंधन के कार्य को निर्दिष्ट किए गए हैं क्योंकि 35 बांधों के शटर थोड़े ही समय के भीतर खोल दिए गए थे, जो इससे पहले कभी नहीं हुआ था। इसके पीछे यह तर्क दिया गया है कि रिकॉर्ड वर्षा के साथ पहले से उमड़ हो रहे बांधों से पानी छोड़े जाने की वजह से पहले से संदिग्ध स्थिति और खराब हो गई।

बांध सुरक्षा विशेषज्ञों ने कहा है कि, सही मायनों में, बांधों के हौज या जलाशयों के पूरी तरह भरने से पहले ही पानी को बांधों से छोड़ दिया जाना चाहिए था। इससे नदी के किनारे रहने वाले हजारों लोगों को बड़े पैमाने पर घर खाली करने से रोका जा सकता था क्योंकि बढ़े हुए पानी ने नदी के किनारों और बस्तियों, ग्रामीण और शहरियों सभी को एक समान रुप से बाढ़ से प्रभावित कर दिया। विशेषज्ञों ने यह भी कहा है कि मानसून की शुरुआत से पहले, बांध प्रबंधन को अपेक्षाकृत बांधों को खाली करवाने के लिए  बेहतर सुविधाओं को अपनाने की आवश्यकता है, जो केरल के सन्दर्भ में नहीं हो पाया था ।

अधिकारियों द्वारा बांधों के पानी से पूरी तरह से भर जाने से पहले पानी न छोड़ने के पीछे एक कारण यह भी है कि केरल राज्य बिजली बोर्ड (केएसईबी) और सिंचाई विभाग राज्य के सभी बांधों को संचालित करता है। ऐसा माना जाता है कि जब बांधों से पानी छोड़ने के निर्धारण की बात आती है तो यह बिजली उत्पादन और सिंचाई के लिए पानी का भंडारण दोनों निकायों पर निर्भर करता है।

पिछले दोनों महीनों, जून और जुलाई, में दर्ज की गई अतिरिक्त बारिश ने बांधों को लबालब भर दिया था, लेकिन भारतीय मौसम विज्ञान विभाग और केंद्रीय जल आयोग के सटीक पूर्वानुमानों की कमी ने बांधों से जल्द से जल्द पानी छोड़ने और राज्य के अधिकारियों की निर्णय लेने की क्षमता में बाधा डाली। यह भी ध्यान देने योग्य होगा कि नेशनल फ्लड फोरकास्टिंग नेटवर्क का केरल में कोई स्टेशन नहीं है, जिसे गंभीरता से लेने की जरुरत है।

इसमें कोई शक नहीं है कि बाढ़ से होने वाले नुकसान को बांध प्रबंधन द्वारा अच्छी सुविधाओं को अपनाकर कम किया जा सकता था। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि 8 अगस्त को मानसून आने से पहले जब बारिश कम हो गई थी तब अगर दो सप्ताह की अवधि में पानी को समय पर छोड़ दिया जाता तो बाढ़ से होने वाले नुकसान को 20-40 प्रतिशत तक कम किया जा सकता था।

मौजूदा बाढ़ ने 9,512 करोड़ रुपये के अनुमानित नुकसान के साथ कहर बरपाया है, यह आवश्यक है कि इस आपदा से सबक लिया जाए। जलवायु परिवर्तन के कारण खराब मौसम अब आम घटना बन चुकी है और इस तरह की भयानक घटनाओं की तीव्रता या दुर्घटना की भविष्यवाणी करने में कठिनाइयां आ सकती हैं, इसलिए यह जरुरी है कि बांध प्रबंधन में अच्छी सुविधाओं को अपनाया जाए जिससे केरल में आई बाढ़ जैसी स्थिति दोहराई न जाए ।