राजनीति
सबरीमाला को चुनावों से दूर रखने का निर्णय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध

आशुचित्र- 

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में घृणा वचन और धार्मिक समूहों पर निशाना साधते हुए कथनों को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।
  • सबरीमाला जैसे मुद्दे को चुनावों से अलग नहीं रखा जा सकता, वह भी तब जब यह इतने सारे भक्तों के लिए महत्त्वपूर्ण है।

केरल मुख्य चुनाव आयुक्त टीका राम मीणा ने कहा है कि सबरीमाला मुद्दे को उठाना आम चुनावों के लिए लगाई गई आचार संहिता का उल्लंघन होगा।

उन्होंने घोषणा की कि कोई भी अभियान ईश्वर या धर्म के नाम पर नहीं चलाया जा सकता क्योंकि यह आधारभूत लोकतांत्रिक व्यवहार का उल्लंघन होगा। घृणा वचनों और धार्मिक समूहों पर निशाना साधते हुए कथनों पर रोक लगाना एक बात है लेकिन एक ऐसा मुद्दा जो केरल के लाखों लोगों के लिए चिंता का विषय है, उसे चुनावी मुद्दा बनने से नहीं रोका जा सकता।

किस आधार पर चुनाव आयोग ने जनता के लिए भावनात्मक मुद्दे को मतदान से अलग रखने के लिए कहा है? मतदाताओं से यह कहना कि जो मुद्दा उनके लिए सच में मायने रखता है, उसे न उठाया जाए, किस प्रकार से लोकतांत्रिक हुआ? जब कम्युनिस्ट वर्ग, जाति और कुछ अन्य रोज़गार और आरक्षण के नाम पर ध्रुवीकरण कर सकते हैं तो मतदाताओं को सबरीमाला जैसे वास्तविक मुद्दों पर क्यों न संबोधित किया जाए और यह कैसे उस हिंदू वर्ग के लोगों के धार्मिक अधिकारों का खंडन नहीं हुआ जो स्वामी अयप्पा को उस विशेष रूप में पूजते हैं?

सबरीमाला में प्रजनन आयुवर्ग की महिलाओं को प्रवेश देने के सर्वोच्च न्यायालय के गलत निर्णय के बाद केरल में इसपर गहम-गहमी बनी हुई है। इस आयुवर्ग की लगभग सभी महिलाओं ने स्वेच्छा से परंपराओं का सम्मान करते हुए मंदिर में प्रवेश करने का प्रयास नहीं किया क्योंकि स्वामी अयप्पा यहाँ नैश्तिक ब्रह्मचारी के रूप में विराजमान हैं। सर्वोच्च न्यायालय में समीक्षा याचिकाओं की बाढ़ आ गई और अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि सितंबर 2018 के निर्णय को परिवर्तित किया जाएगा या नहीं।

17वें लोकसभा चुनावों के लिए घोषित तिथियों में केरल में तीसरे चरण में 23 अप्रिल को मतदान होंगे।

इस बात में दोहरे मानक नहीं अपनाए जा सकते- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार पर चुनाव आयोग सिर्फ इसलिए अपने मन से प्रतिबंध नहीं लगा सकता है क्योंकि यह धार्मिक मामला है। संविधान में यह कहीं नहीं लिखा है कि वोट केवल आर्थिक मुद्दों के आधार पर मांगे जाएँ। और वह भी तब जब इस समय में पहचान और विश्वास के मुद्दे कई लोगों के लिए बहुत मायने रखते हैं।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में घृणा वचन और धार्मिक समूहों पर निशाना साधते हुए कथनों को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। सबरीमाला जैसे मुद्दे को चुनावों से अलग नहीं रखा जा सकता, वह भी तब जब यह इतने सारे भक्तों के लिए महत्त्वपूर्ण है।

इस मानक के आधार पर किसी पार्टी को राम मंदिर बनवाने या पुनः बाबरी मस्जिद स्थापित करने का दावा कर वोट नहीं मांगने चाहिए। यदि चुनाव आयोग बिना सोचे-समझे इस प्रतिबंध को लागू करता है तो यह केरल के प्रत्याशियों को दूसरे माध्यम से इसका प्रचार करने के लिए मजबूर करेगा। यह प्रतिबंध कारगर सिद्ध नहीं होगा। आयोग को पुनर्विचार करना चाहिए।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।