राजनीति
करुणानिधि को मरीना पर जगह मिलने के बाद भी कुछ महत्वपूर्ण मसले अभी भी मौजूद हैं

प्रसंग
  • स्मारक का स्थान राजनीतिक ताकतों के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई का कारण नहीं बन सकता है।
  • दुर्भाग्य से, मरीना वही बन गया है।

कोई नहीं जानता कि तमिलनाडु सरकार पर कौन सा भूत सवार है, कि वह राज्य के सबसे वरिष्ठ राजताओं में से एक, एम करुणानिधि को, द्रविड़ मुनेत्र कझागम (द्रमुक) के प्रथम मुख्यमंत्री सी एन अन्नादुराई के करीब दफन करने की अनुमति नहीं दे रही है। राज्य की जनता की अत्यधिक भावनात्मक मानसिक स्थिति को देखते हुए, ऐसा कोई रास्ता नहीं था जिसके माध्यम से उच्च न्यायालय राज्य के तर्क,  कि केवल पदासीन मुख्यमंत्रियों को उनके गुजरने पर मरीना बीच में स्थान मिलता है, का समर्थन कर सकती थी। पूर्व मुख्यमंत्रियो को इसके अतिरिक्त दफनाये जाने की जगह मिलेगी। करुणानिधि के मामले में, राज्य ने गाँधी मंडपम में दो एकड़ जमीन की पेशकश की, जहाँ राजाजी और कामराज की समाधियां मौजूद हैं। उच्च न्यायालय ने राज्य के आदेश को निरस्त किया और करुणानिधि को मरीना में दफन करने की इजाजत दे दी।

करुणानिधि और अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझागम (एआईएडीएमके) के हाल ही में विस्थापित नेता जे जयललिता के बीच उच्च स्तरीय व्यक्तिगत शत्रुता को देखते हुए, राज्य सरकार के फैसले को असली चतुरता के रूप में समझा जाना संभव है, लेकिन यह केवल आधी कहानी हो सकती है। वास्तव में एआईएडीएमके सरकार, जो कि अपने अस्तित्व के लिए कई खतरों का सामना कर रही है, को इसमें कोई संदेह नहीं था कि वह हर तरह से हार जाएगी: अगर अदालत ने करुणानिधि को मरीना में दफन करने की इजाजत देने के पक्ष में फैसला किया, तो सरकार को शर्मिंदगी होती; ओर यदि अदालत ने सरकार के रुख का समर्थन किया, तो डीएमके अपने लिए एक बड़ी सहानुभूति की लहर उत्पन्न कर लेती और राज्य को खलनायक के रूप में देखा जाता। एआईएडीएमके आगे की चमक खो देती, अगर यह माना जाए कि वर्त्तमान में  उसके पास कुछ चमक है,।

हारने वाली स्थिति में, कोई भी कम हारने वाली स्थिति को चुनता है। राज्य ने अधिक जोखिम भरा विकल्प चुना जब कि अदालत को शायद ही कभी इनके पक्ष में फैसला करना आसान होता। हालांकि अदालतों ने कभी-कभी कानून और व्यवस्था के संभावित खतरों को देखे बिना फैसले दिए हैं, इस बार शायद ही अदालत मरीना में अपने नेता को दफनाने की द्रमुक की मांग को खारिज करती।

यह कहने के बाद, समाधि स्थल विवाद के परिणामस्वरूप कुछ परेशान करने वाले मुद्दे सामने आए हैं।

पहला, अगर कोई यह मान लेता कि मरीना पर स्मारक और समाधि स्थल बनाने के खिलाफ दायर विभिन्न सार्वजनिक हितों के मुकदमे (पीआईएल) वैध थे, तो यह चिंताजनक है कि इन सभी याचिकाओं को वापस लेने की अनुमति थी – या इन्हें रद्द कर दिया गया थी – एक बार यह स्पष्ट हो जाने के बाद कि यह करुणानिधि के समाधि स्थल के निर्णय को प्रभावित करेगा (कुछ को कुछ महीनों पहले खारिज कर दिया गया था)। किसी को तो यह पूछना चाहिए कि मूल याचिकाएं, सिद्धांत के मुकाबले राजनीति द्वारा प्रेरित थीं या नहीं। किसी को यह भी पूछना चाहिए कि क्या कुछ याचिकाकर्ताओं ने, यदि वे अपने पीआईएल के साथ बने रहे, तो डीएमके पार्टी के तरफदारों के हाथों हिंसा से डरते हुए अपनी याचिकाएं वापस ले लीं। यह याद करने लायक है कि मद्रास उच्च न्यायालय की पूर्व मुख्य न्यायाधीश इंदिरा बनर्जी, जिन्हें हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत किया गया था, व्यक्तिगत रूप से जयललिता का स्मारक बनाने की अनुमति देने के खिलाफ थीं।

दूसरा, शायद राज्य सरकार मरीना पर दफनाने की मनमानी नीति को बनाने में चूक गई, लेकिन यह कोई मामला नहीं हो सकता है कि प्रमुख राजनीतिक नेताओं के लिए मरीना पर स्मारक बनाना उनका जन्म सिद्ध अधिकार है। जहां अन्नदुराई, करुणानिधि, एमजीआर और जयललिता काफी लोकप्रिया नेता थे वहीं कोई इस बात पर संदेह नहीं करता कि अगले आधे दशक में राज्य से अधिक लोकप्रिय उभर कर आयेंगे। क्या मरीना, प्राकृतिक आश्चर्यो से भरे हुए दुनिया के दूसरे सबसे लंबे समुद्र तट, की एक कब्रिस्तान के रूप में पहचान होनी चाहिए? अगर एक बार आप मरीना को प्रतिष्ठा का मुद्दा बना देते हैं तो कौन सा राजनीतिक दल किसी अन्य स्मारक स्थल को स्वीकार करेगा? जाहिर है कि राज्य को एक द्विपक्षीय नीति विकसित करनी चाहिए जहाँ भविष्य में श्मशान स्थल स्थित होंगे और जहाँ स्मारक बनाए जा सकते हों।

तीसरा, अदालत में किए गए द्रमुक वकीलों का एक अजीब तर्क यह भी था कि करुणानिधि सैद्धांतिक रूप से अन्नादुराई के करीबी थे, और गांधी मंडपम, जहाँ कामराज और राजाजी के स्मारक हैं, के बजाय उनका स्मारक स्थल अन्नादुराई के करीब उचित मानते है। लेकिन यह वास्तव में सैद्धांतिक सम्बन्धों और दुश्मनी को मृत्यु तक साथ घसीटने के सामान है। इसका यह मतलब निकलता है कि यदि आप राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं तो आप शांति की साझेदारी नहीं कर सकते, शांति तो केवल मरने के बाद ही मिलती है। यह तमिलनाडु की राजनीति के भविष्य में कुछ अच्छा नहीं होने का संकेत है, जो व्यक्तिगत प्रतिशोध और एजेंडा द्वारा लगातार संचालित किया जाएगा। द्रमुक के वकीलों ने एक और घिसापिटा बयान दिया, उन्होंने अदालत के फैसले के बाद मीडिया को बताया कि करुणानिधि की “आत्मा” को अब शांति मिले। क्या वे भूल गए हैं कि द्रमुक के मुखिया नास्तिक थे, जिनके तर्कवाद ने आत्मा के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी?

चौथा, स्मारक स्थल राजनीतिक ताकतों के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई नहीं बन सकता है। जो दुर्भाग्य से, मरीना बन गया है। यह समय यह कहने का है कि करुणानिधि वहाँ पर दफन किए वाले आखिरी राजनेता होंगे और भविष्य में वहाँ पर कोई भी स्मारक बनाने की अनुमति नहीं दी जाएगी, इस बात पर ध्यान न देते हुए कि नेता किस पार्टी से संबंधित है।

नेताओं को भावी स्मारकों के निर्माण पर द्विपक्षीय नीति विकसित करना ही राज्य सरकार के लिए सबसे विवेकपूर्ण सीख होगी और इस नीति की शर्तों पर ही भूमि उनके अनुयायियों को आवंटित की जाएगी।

जगन्नाथ स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वह @TheJaggi पर ट्वीट करते हैं।