राजनीति
आधिपत्य कायम रखने के लिए कामरेड का तरीका: जेएनयू में चुनावी धांधली
जेएनयू में चुनावी धांधली

प्रसंग
  • इस तरह ‘लेफ्ट यूनिटी’ गठबंधन ने जेएनयू छात्र संघ चुनाव जीत लिए।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) एक वामपंथी आधिपत्य वाला परिसर है, जिसे गलत तरीके से लोकतंत्र का केंद्र माना गया है। परिसर में वामपंथी वर्चस्व प्राकृतिक नहीं है, यह 1960 के दशक के अंत में कांग्रेस (आई) और कम्युनिस्टों के बीच गुपचुप समझौते के परिणामस्वरूप शुरू हुआ जब यह निर्णय लिया गया कि कांग्रेस राजनीतिक नेतृत्व का चेहरा होगी जबकि कम्युनिस्ट राजनीतिक एवं अकादमिक सांस्कृतिक एजेंडा स्थापित करेंगे। बाधाओं की कुछ छोटी अवस्थाओं को छोड़कर, यह समझौता अब तक आसानी से चल रहा है।

कैंपस में कुख्यात राष्ट्र विरोधी नारेबाजी के बाद राहुल गांधी द्वारा जेएनयू के वामपंथियो के साथ खड़े होने का जल्दबाजी में लिया गया निर्णय उस समझौते की निरंतरता की गवाही है। हालांकि, एक प्रभावी तरीके से नये एजेंडे बनाने के लिए वामपंथियों के जेएनयू ब्रांड की क्षमता बहुत कम हो गई है, लेकिन फिर भी राहुल गांधी के राजनीतिक परामर्शदाता और भाषण लेखक संदीप सिंह एक वामपंथी पूर्व जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष हैं।

प्रतिष्ठान विरोधी छवि होने के विपरीत, सामान्य तौर पर भारतीय वामपंथी और विशेष तौर पर जेएनयू के वामपंथी हमेशा से ही प्रतिष्ठान का हिस्सा रहे हैं। इस विशेषाधिकार का लाभ उठाते हुए, विश्वविद्यालय के वामपंथी शिक्षकों और प्रशासकों की पहली पीढ़ी ने नियुक्ति और भर्ती प्रक्रियाओं को इस तरह से डिजाइन किया है जो जेएनयू में वामपंथी विरासत को हमेशा उत्पन्न करता रहेगा।

पहली पीढ़ी के कामरेडों द्वारा विकसित और स्थापित परंपराओं का उद्देश्य हर प्रकार से वामपंथी विरासत को बनाए रखना था, उस समय में भी जब वामपंथी राजनीति के लिए राज्यों का सीधा समर्थन अनुपलब्ध था। अन्य विश्वविद्यालयों के विपरीत, जेएनयू के चुनावों में विश्वविद्यालय प्रशासन की कोई भूमिका नहीं देखी जाती है। वर्ष 2006-07 में लिंगदोह समिति की सिफारिशों के कार्यान्वयन के बाद भी जेएनयू चार विशिष्ट मामलों को छोड़कर जेएनयूएसयू संविधान का पालन करता है।

जेएनयू की एक विशिष्टता चुनाव समिति का संस्थान है जो छात्रों द्वारा जेएनयू छात्र संघ के लिए चुनाव आयोजित करने के लिए गठित एक निकाय है। जेएनयूएसयू संविधान के अनुच्छेद 18 में चुनाव समिति का उल्लेख है। इस समिति के सदस्यों को किस तरह से भर्ती किया जाता है, इसका विश्लेषण करना बहुत दिलचस्प है। जेएनयूएसयू संविधान के अनुच्छेद 18 (3) में वर्णित है, “चुनाव समिति के प्रत्येक सदस्य को छात्र परिषद का 2/3 का अनुमोदन होना चाहिए” और उसी खंड में यह दिया गया है कि चुनाव समिति के सदस्यों की स्वीकृति छात्र परिषद यानी जेएनयूएसयू की मध्यस्थता के माध्यम से होगी।

2/3 की ऊँची सीमा रेखा स्पष्ट रूप से यह बताती है कि जेएनयूएसयू का पद छोड़ने वाला सदस्य यह निर्णय लेने में प्रभावी माना जाएगा कि चुनाव समिति में किसका चयन होगा और किसका नहीं। यह व्यवस्था स्वयं ही संदिग्ध है, विशेष रूप से इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि जेएनयू राजनीति के प्रारंभिक दशकों में वामपंथी संगठनों को निर्विरोध चुना गया था और चुनाव समिति के अनुकूल नामांकनों की श्रृंखला उनके द्वारा बहुत अधिक कायम रखी गई है।

लंबे समय तक जेएनयू में छात्र राजनीति “लाल रंग के विभिन्न रंगों के बीच” एक आंतरिक खेल थी। 70 के दशक में सामने आने वाले और 80 के दशक में गायब हो जाने वाले मुक्त विचारकों ने वामपंथियों को चुनावी चुनौती दी। लेकिन जेएनयू में वामपंथी-नेतृत्व को चुनौती देने के लिए उनमें आवश्यक संगठन और वैचारिक दृष्टिकोण की कमी थी। शैक्षिक परिसरों में वामपंथियों का विरोध करने के लिए ज्यादातर कांग्रेस की अनिच्छा की वजह से भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन हमेशा प्रभावहीन रहा। 1990 की शुरूआत में यह वामपंथी चुनौती एबीवीपी (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) की स्थापना और वृद्धि का नतीजा हुई। 90 के दशक के उत्तरार्द्ध में वामपंथियों और एबीवीपी के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा देखी गई, सन् 2000 में एबीवीपी ने अध्यक्ष पद पर अपनी पहली जीत हासिल की।

इस प्रकार एबीवीपी को पद से हटाने के लिए जेएनयू के दो सबसे बड़े वामपंथी दल ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन और स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया एक साथ आ गए। एक दशक से ज्यादा समय में एबीवीपी जेएनयू परिसर में धीरे-धीरे सिमटता चला गया, लेकिन 2016 में यह एकमात्र सबसे बड़े संगठन के रूप में उभरा जब इसने ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन और स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया को फिर से एक साथ आने पर मजबूर कर दिया।

‘लेफ्ट यूनिटी’, वामपंथी संगठनों के गठबंधन के लिए एक प्रचलित शब्द, में अब जेएनयू परिसर के चारों प्रमुख वामपंथी दल शामिल हैं। पिछले चार सालों में एक और संगठन बिरसा अंबेडकर फूले स्टूडेंट एसोसिएशन (बीएपीएसए) भी उभरा है, जिसका मुख्य रूप से वामपंथ के पूर्व-कार्यकर्ताओं द्वारा गठन किया गया है। 2015-16 में एक भरोसेमंद शुरूआत करने के बाद बीएपीएसए ने दलितों और मुस्लिमों के हितों के लिये खड़े होने का दावा किया है, अपनी राजनीतिक संरचनात्मक सीमाओं के कारण बीएपीएसए का पतन होना शुरू हो गया है।

आज पहली बार जेएनयू की राजनीति दो अलग-अलग वैश्विक दृष्टिकोण में बंटी हुई है। ‘लेफ्ट यूनिटी’ और एबीवीपी आमने सामने हैं। इन परिस्थितियों में, पिछले कुछ सालों में वामपंथियों द्वारा स्थापित किए गए ‘खेल के नियम’ एबीवीपी के खिलाफ ‘लेफ्ट यूनिटी’ के लिए काफी उपयोगी साबित हो रहे हैं। जेएनयू छात्र संघ 2018-19 के लिए हाल ही मे संपन्न हुए चुनाव, जिनके नतीजे रविवार को अनसुलझे विवादों के बीच घोषित किए गए थे, में कुछ अजीब घटनाएं देखी गईं जो चुनाव की ओर संकेत कर रहीं थीं।

शनिवार को सुबह करीब 3.30 बजे, चुनाव आयोग ने एबीवीपी उम्मीदवारों के काउंटिंग एजेंटों की अनपस्थिति में ही विज्ञान स्कूलों से आने वाले मतपत्र पेटियों की गिनती शुरू कर दी। यह जेएनयू संविधान के परिशिष्ट 1 (जो चुनाव आयोजित करने के नियम बताता है) के भाग 3 में दिए गए नियम 5(बी) का खुले तौर पर उल्लंघन था। यह नियम बताता है कि “गिनती करते समय सभी मतपत्रों को उम्मीदवारों को या उम्मीदवार द्वारा अधिकृत व्यक्ति को दिखाया जाएगा।”

विज्ञान स्कूलों को एबीवीपी का गढ़ माना जाता है और विज्ञान में 75 प्रतिशत मतदान (सभी स्कूलों में से सबसे ज्यादा) एबीवीपी के लिए एक अच्छा संकेत है। एबीवीपी ने चुनाव आयोग के इस फैसले पर विरोध किया और इसे पक्षपातपूर्ण होने का आरोपी ठहराया, इसके जवाब में चुनाव आयोग ने अपनी शर्तों को आगे रखते हुए कहा कि वोटों की गिनती को तब तक दोबारा शुरू नहीं किया जाएगा जब एबीवीपी चुनाव आयोग पर लगाए गए आरोप के लिए माफी नहीं माँग लेता। इसके कुछ घंटों बाद, चुनाव आयोग ने एबीवीपी पर अप्रत्यक्ष रूप से मतपत्र पेटियों की छीनाछपटी करने और चुनाव आयोग के सदस्यों के साथ मारपीट का आरोप लगाते हुए एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की। इसके तुरंत बाद वामपंथियों ने सोशल मीडिया पर एक अभियान शुरू कर दिया और कहा कि एबीवीपी ने हिंसा की है और बूथ पर कब्जा कर लिया है।

दिलचस्प बात यह है कि जब वामपंथी कार्यकर्ता इस प्रचार के साथ व्यस्त थे, तो वे स्वयं काउंटिग क्षेत्र से बाहर घूम रहे थे, जो वोट काउंटिग प्रक्रिया के सही तरीके से किए जाने पर सवाल उठाता है। स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज (एसआईएस) -1, जहां वोट गिने जा रहे थे, बिल्डिंग के सामने बड़ी संख्या में वामपंथी इकट्ठा हो गए और उन्होंने ईसी के पक्ष में नारे लगाना शुरू कर दिया। जेएनयू में पहली बार “ईसी जिंदाबाद” का नारा सुना गया था, और इसने उन सभी लोगों के मन संदेह पैदा कर दिया है जो जेएनयू राजनीति से अवगत है।

सभी लोग इस बात को लेकर हैरान थे कि ईसी और लेफ्ट यूनिटी के बीच ऐसा क्या चल रहा है जिसके कारण ये दोनों एक-दूसरे का समर्थन कर रहे हैं। ईसी ने एबीवीपी पर शर्त लगाते हुए शनिवार की देर शाम को काउंटिग फिर से शुरू कि एबीवीपी के काउंटिग एजेंटों को उन मतपत्रों में मतों की गिनती करने की अनुमति नहीं दी जाएगी, जो एबीवीपी के प्रतिनिधियों की अनुपस्थिति में ईसी द्वारा पहले ही खोले गए थे।

एबीवीपी ने चुनाव समिति पर पूरे चुनाव प्रक्रिया में पक्षपातपूर्ण पार्टी बनने का आरोप लगाया है। यह देखा गया था कि पूर्व-चुनाव गठबंधन के रूप में चुनाव लड़ने वाले चार संगठनों को उनके पोस्टर चिपकाने और वोट मांगने की अपील करने के लिए प्रत्येक को एक दीवार की जगह दी गई थी, जबकि एबीवीपी को केवल एक दीवार की जगह दी गई थी। इस प्रकार, वामपंथियों को एबीवीपी को आवंटित की गई जगह से चार गुना अधिक जगह दी गई। इसके अलावा, ईसी द्वारा बुलाई गई सभी संगठनों की बैठकों में, एक संगठन से आने वाले सदस्यों की संख्या तय की गई थी, जिसमें हमेशा एबीवीपी की तुलना में लेफ्ट यूनिटी के चार गुने लोगों ने भाग लिया।

यह भी उल्लेख किया जाना चाहिए कि वामपंथियों का खुलासा करने वाले एबीवीपी के कई पर्चे ईसी द्वारा संशोधित और अस्वीकृत किए गए थे। ईसी के खिलाफ एबीवीपी का आरोप पहली ऐसी घटना नहीं है। 2014 में, एसएफआई ने एआईएसए के पक्ष में काम करने के ईसी पर आरोप लगाकर कई घंटों तक गिनती रोक दी थी। 2014 में एसएफआई ने ईसी पर एआईएसए के पक्ष में काम करने का आरोप लगाते कई घंटों तक काउंटिग रोक दी थी। उस समय, एआईएसए और वामपंथी संगठनों के बीच एक तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई थी। आज, एसएफआई आराम से उस घटना को भूल गया है और चुनाव समिति के विजय गीत का गुणगान कर रहा है।

उसी वर्ष, 16 मई को जब लोकसभा चुनाव के परिणाम सामने आए, तब एआईएसए के नेतृत्व में वामपंथी संगठनों ने परिसर में एक रैली की, जिसमें स्पष्ट रूप से कह रहे थे कि वे ऐसे लोकतंत्र में विश्वास नहीं रखते हैं जो किसी एक विशिष्ट पार्टी और एक व्यक्ति के पक्ष में परिणाम देता है। जेएनयू वामपंथ केवल उसके स्वयं के जीतने पर ही लोकतंत्र का सम्मान करता है। हाल ही में जेएनयूएसयू चुनाव, जिसके परिणामों पर सभी गैर-वामपंथी संगठनों को संदेह हो रहा है, के बाद जेएनयू परिसर में हिंसा की छड़ी लगी हुई है।

सोशल मीडिया वामपंथी कैडरों द्वारा एबीवीपी और अन्य छात्रों पर किए गए हमलों के वीडियो और तस्वीरों से भरा पड़ा है। जेएनयूएसयू के पूर्ववर्ती अध्यक्ष ने लाठियां चलते और और एक एसएफआई कार्यकर्ता द्वारा हसिए से एबीवीपी की लड़कियों पर हमला करते देखा। परिसर में वामपंथियों द्वारा दिखाई गई हिंसक प्रकृति को उनकी जीत के बाद के नारे “जेएनयूएसयू तो झाँकी है, 2019 अभी बाकी है” के साथ पढ़ा जाना चाहिए।

शशांक तिवारी दिल्ली विश्वविद्यालय में एक अनुसंधान विद्यार्थी हैं।