राजनीति
जींद उप-चुनाव परिणाम- जाट बहुल क्षेत्र में भाजपा की जीत के मायने

आशुचित्र- अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराना मुश्किल होगा।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 12,935 वोटों के बड़े अंतर से जींद उप-चुनाव जीता है। जननायक जनता पार्टी (जजपा) के दिग्विजय चौटाला के 37,631 वोटों की तुलना में भाजपा के उम्मीदवार डॉ कृष्ण लाल मिधा को 50,566 वोट मिले। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) के रणदीप सिंह सुरजेवाला 22,740 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे और बमुश्किल अपनी सीट बचा पाए।

जींद को हरियाणा की राजनीतिक राजधानी माना जाता है। प्रत्येक इकाई, चाहे वह पुरानी हो या नई, इसे आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए सेमीफाइनल मान रही थी। यह मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व के साथसाथ भाजपा की अच्छी तरह से गैरजाट/ जाट-विरोधी राजनीति का परीक्षण भी था।

पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला की राजनीतिक प्रासंगिकता और विरासत भी दाँव पर लगी थी, क्योंकि उनके पोते दुष्यंत और दिग्विजय चौटाला ने तीन महीने पहले ही आईएनएलडी को विभाजित करके एक नया संगठन जजपा को स्थापित किया था।

कांग्रेस ने अपने राष्ट्रीय प्रवक्ता और पड़ोसी कैथल निर्वाचन क्षेत्र के मौजूदा विधायक सुरजेवाला, जो कि राहुल गाँधी के करीबी माने जाते हैं, को चुनावी मैदान में उतार दिया और इस चुनावी लड़ाई में कांग्रेस भी सभी को कड़ी टक्कर देने में जुट गई।

अब जब चुनाव के परिणाम सामने गए हैंतो कुछ महत्त्वपूर्ण बातें इन परिणामों से सीखीं जा सकती हैं, जिन्हें आने वाले वर्षों में राज्य की राजनीति में याद किया जाएगा।

पहली  बात, जींद ने एक गैरजाट विधायक के चुनाव की परंपरा को जीवित रखा है। हालाँकि जाट मतदाता 30 प्रतिशत से अधिक हैं, लेकिन पिछले चार दशकों में इस समुदाय का कोई भी व्यक्ति यहाँ से नहीं जीता है। 1977 के बाद से निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व छः बार एक बनिया और दो बार किसी पंजाबी द्वारा किया गया है।

इस उप-चुनाव में भाजपा द्वारा एक पंजाबी को मैदान में उतारा गया और जजपा, कांग्रेस एवं आईएनएलडी द्वारा तीन मज़बूत जाट उम्मीदवारों को इस चुनावी प्रतियोगिता में उतारा गया तथा इन सबके बीच कड़ा मुक़ाबला देखा गया। इसी संदर्भ में भाजपा के प्रदर्शन को समझा जाना चाहिए। इसका फायदा भाजपा को मिला। 2014 में भी पार्टी केवल 2,257 वोटों से आईएनएलडी से हार गई थी। इसलिए भाजपा की जीत अप्रत्याशित या अकल्पनीय नहीं थी, जैसा कि कई लोगों ने कहा था। लेकिन निश्चित रूप से यह अंतर दर्शाता है कि पार्टी सदस्यों द्वारा केवल पाँच से सात हजार वोटों से जीत के अंतर का अंदेशा लगाया जा रहा था

दूसरा, भाजपा अब निर्विवाद रूप से राज्य में सत्ता हासिल करने की सबसे मजबूत राजनीतिक ताकत है, जिसे राज्य को गंभीरता से लेना चाहिए। पिछले महीने ही इसने पांच बड़े शहरों में महापौर चुनाव जीते थे। अब, इसने अपेक्षाकृत पिछड़े इलाके में जाट शासित सीट हासिल कर ली है।

भाजपा का गैरजाट गठबंधन चुनावी लाभांश दे रहा है। इस पार्टी के पहली बार इस सीट पर जीतने का सबसे बड़ा कारण भी यह है। हालाँकि, इसका श्रेय भाजपा को दिया जाना चाहिए कि उसने चुनाव का जाति की तर्ज पर ध्रुवीकरण नहीं किया। ग्रामीण क्षेत्रों में जजपा की कम अंतर से जीत यह संकेत देती है कि कई जाटों ने भी इस बार भाजपा को वोट दिया है क्योंकि आखिरी समय में आईएनएलडी ने भी अपने कार्यकर्ताओं को भाजपा का समर्थन करने के लिए उकसाया ताकि उसका मुख्य प्रतिद्वंद्वी जजपा हार जाए।

एक और कारण प्रशासन का कुशल प्रबंधन था। इससे पहले, हर किसी को इस बारे में रिपोर्ट मिलती थी कि कैसे आईएनएलडी कार्यकर्ता गैरआईएनएलडी मतदाताओं को गाँवों में अपना मत डालने की स्वतंत्रता नहीं देते थे। लेकिन खट्टर प्रशासन ने चुनाव अधिकारियों को सख्त आदेश दिया कि ऐसी घटनाओं को इस बार दोहराया जाए और सभी को स्वतंत्र रूप से मतदान करने की अनुमति दी जाए।

जटिल जाति की गतिशीलता के अलावा, अन्य कारक भी थे जिन्होंने भाजपा की सफलता में योगदान दिया। जींद के लोग ऐसे पार्टियों के उम्मीदवारों के लिए मतदान करते थे जो विपक्ष में बैठते थे और उन्हें लगा कि इससे क्षेत्र में विकास बाधित हो रहा है इसलिए वे सत्ताधारी पार्टी के एक विधायक का चुनाव करना चाहते थे। भाजपा ने हाल ही में शहर में कई विकास परियोजनाएँ शुरू कीं जो लोगों को अच्छी लगी। मुख्यमंत्री खट्टर के शासन में सरकारी नौकरियों की भर्ती में पारदर्शिता भी भाजपा की सफलता में सहायक थी। हाल ही में इसने 18,000 ग्रुप डी पदों के परिणाम जारी किए और जींद चयनित उम्मीदवारों की संख्या में तीसरे स्थान पर आया।

तीसरी  बात, भाजपा के बाद सबसे बड़ा लाभ नवगठित संगठन जजपा को मिला। दादा ओपी चौटाला और चाचा अभय चौटाला के साथ कड़वे मतभेदों के बाद दुष्यंत और दिग्विजय चौटाला ने तीन महीने पहले आईएनएलडी से नाता तोड़ लिया। अपने भाई अजय और माँ नैना के साथ दोनों भाइयों ने मिलकर जजपा की स्थापना की। हिसार के सांसद दुष्यंत चौटाला ने अपने छोटे भाई दिग्विजय को मैदान में उतारा। हालाँकि, यह उम्मीद की जा रही थी कि जजपा आईएनएलडी को पछाड़ देगा लेकिन किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि जिस आईएनएलडी को पिछली बार 31,000 वोट मिले थे, उसे केवल 3,454 वोट मिलेंगे। इसका अस्तित्व अब खतरे में है क्योंकि इसके 13 विधायकों और कार्यकर्ताओं को जजपा से जुड़ जाने से रोकना कठिन हो जाएगा।

चौथी  बात, सबसे बड़ा हारने वाला भारतीय राष्ट्रीय लोकदल है। जींद इसका सबसे महत्त्वपूर्ण गढ़ था और इसने 2009 और 2014 में मिधा के पिता डॉ हरि चंद मिधा को मैदान में उतारा था जिनका पिछले साल निधन हो गया और इसी वजह से उपचुनाव की आवश्यकता थी। ग्रामीण क्षेत्रों में भारतीय राष्ट्रीय लोकदल की पकड़ अटूट थी। इसके कार्यकर्ता गैर-इनेलो मतदाताओं को भी वोट देने के लिए बाहर नहीं आने देते थे और वोट देने के उनके अधिकार का प्रयोग भी नहीं करने देते थे। खट्टर प्रशासन द्वारा चुनाव अधिकारियों को आदेश दिए जाने के बाद यह बदल गया क्योंकि आदेशानुसार  ऐसी किसी भी शरारत को बर्दाश्त न करना था। यही एक कारण है कि भाजपा इस बार गाँवों से इतने वोट पाने में सफल रही। भाजपा के पूर्व सांसद राज कुमार सैनी की लोकतांत्रिक सुरक्षा पार्टी (एलएसपी) जो चौथे स्थान पर थी, उसे भी लाभ प्राप्त हुआ।

पाँचवी  बात, रणदीप सिंह सुरजेवाला हार गए। वह पड़ोसी कैथल निर्वाचन क्षेत्र से मौजूदा विधायक हैं और उन्हें राहुल गांधी ने ही चुनाव लड़ने के लिए कहा था। हालाँकि इनके प्रतिद्वंद्वियों ने इसे कांग्रेस के दिवालियापन के रूप में देखा, लेकिन पार्टी की गणना यह थी कि चूँकि जाट मतदाता आईएनएलडी-जजपा के बीच विभाजित होंगे, इसलिए सुरजेवाला भाजपा के खिलाफ एक विश्वसनीय विकल्प और वास्तविक दावेदार के रूप में उभर सकते हैं।

लेकिन, जजपा ने दिग्विजय चौटाला में जैसे एक मजबूत जाट उम्मीदवार को मैदान में उतारकर कांग्रेस की योजनाएँ बिगाड़ दीं। सुरजेवाला ने 2014 के स्तर से अपनी पार्टी की स्थिति में सुधार किया, लेकिन फिर भी अपनी जमा राशि बचाने में मुश्किल से कामयाब हुए। उनकी पहुँच हमेशा एक निर्वाचन क्षेत्र तक ही सीमित रही, लेकिन मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने से उन्हें रोका नहीं जा सका। हालाँकि, हरियाणा के सभी प्रमुख युद्धरत गुटों में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा, किरण चौधरी, शैलजा, प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर ने एकजुट होकर सुरजेवाला के लिए प्रचार किया, उन्हें खुशी होगी कि कम से कम उनकी हार ने मुख्यमंत्री उम्मीदवारों की जगह को थोड़ा खुला छोड़ा है।

जींद चुनाव ने हरियाणा के लोगों को एक महत्वपूर्ण चुनावी संदेश दिया है कि भविष्य में केवल तीन गंभीर पार्टियाँ होंगी- भाजपा, कांग्रेस और जजपा। पंचकुला से दिल्ली तक ग्रांड ट्रंक रोड बेल्ट पर भाजपा को 25 सीटें मिलने की संभावना है। इसमें राव इंद्रजीत सिंह भी मौजूद हैं जो 12 सीटों वाले पूरे यादव क्षेत्र को जीत सकते हैं। जाट क्षेत्र की सीटें हुड्डा की कांग्रेस और दुष्यंत चौटाला की जजपा के बीच विभाजित हो जाएगी। जल्द ही, भाजपा विरोधी ताकतें खट्टर को हटाने के लिए एकजुट होकर अनौपचारिक गठबंधन के लिए संघर्ष शुरू कर देंगी लेकिन फिर भी ज़्यादा मुश्किलें खड़ी नहीं कर पाएँगी।

अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराना मुस्किल होगा!