राजनीति
क्या वसुंधरा राजे सरकार की आर्थिक नीति भाजपा को वोट दिलवा सकती है?

प्रसंग
  • प्रभावशाली, सुसंगत और ठोस सरकारी पहलों की एक लंबी सूची होने के बावजूद वसुंधरा राजे सरकार का भाग्य अधर में लटका हुआ है।

क्या अच्छी अर्थव्यवस्था ही अच्छी राजनीति है? इस पर पारंपरिक समझ का जवाब तो हाँ ही है। भारतीय मीडिया इस पर बहुत ज्यादा जोर देती है कि अर्थव्यवस्था में होने वाली वृद्धि किस तरह से मतदाताओं की भावनाओं को प्रभावित करती है। लेकिन क्या एक अच्छी पाठ्यपुस्तक से प्रमाणित आर्थिक नीति वोट दिलवा सकती है? इसका जवाब 7 दिसंबर को राजस्थान में ही दिया जाना है।

वसुंधरा राजे की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार उतनी ही अनुदार रही है जितनी भारतीय राजनीति अनुमति देती है। वसुंधरा राजे सरकार ने आर्थिक रूप से जिन अनुदार अवस्थाओं को अपनाया है वह न तो साधारण हैं और न ही किसी अन्य राज्य या पार्टी के अधिकांश मुख्यमंत्रियों से उसकी समानता की जा सकती है।

फिर भी, मतदान की ओर अग्रसर राजस्थान में चुनाव अभियानों में आर्थिक नीति के बारे में शायद बहुत कम बात की गई है। अपने आप में यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है – भारतीय चुनाव एक भावनात्मक मामला है। जहाँ पर राजनेता नीति के बारे में बात करते हैं, तो वे इसके परिणामों के बारे में बात करते हैं न कि इसके इनपुट के बारे में। लेकिन वसुंधरा राजे सरकार द्वारा किए गए बदलावों के विस्तार को देखते हुए यह बहुत ही दुखद है कि चुनावी संदेशों में उनके काम का बहुत ही कम जिक्र किया गया है।

2013 से वसुंधरा राजे सरकार ने दो तरह की सरकारी पहलों पर काम किया है – आपूर्ति के क्षेत्र में सुधार और क्षमता निर्माण।

आपूर्ति के क्षेत्र में सुधार के लिए वसुंधरा राजे सरकार द्वारा किए गए प्रयासों को सबसे ज्यादा श्रम सुधार में देखा जाता है। उनकी सरकार ने श्रम कानूनों में बदलाव लाने के लिए राज्यों के लिए एक मापदंड स्थापित किया, यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें नरेन्द्र मोदी की सरकार कई प्रयासों के बावजूद भी कामयाब न हो सकी। राजस्थान ने तीन प्रमुख श्रम कानूनों – औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947, संविदा श्रम अधिनियम, 1970 और फैक्टरी अधिनियम, 1948 – को बदलने के लिए कानून पारित किए। केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रव्यापी बदलाव किए जाने से पहले राज्य ने अप्रेंटिस अधिनियम में भी संसोधन किया।

इन संशोधनों ने राजस्थान में कार्यरत औद्योगिक इकाईयों के लिए सरकार की बिना किसी पूर्व अनुमति के कामबंदी करने और लगभग 300 श्रमिकों को बाहर निकालने का रास्ता आसान कर दिया। ये बदलाव छोटे व्यवसायों की सहायता करने के लिए किए गए थे ताकि वे भविष्य में होने वाली छंटनी के नतीजों से डरे बिना सीधे पेरोल पर अधिक श्रमिकों को नियुक्त कर सकें। राज्य ने श्रमिकों के संगठन बनाने के लिए 30 प्रतिशत की सीमा भी निर्धारित की पहले यह 15 प्रतिशत ही थी। इन बदलावों को नवंबर 2014 में भारतीय राष्ट्रपति द्वारा मंजूरी मिलने के बाद लागू कर दिया गया था।

राजस्थान विशेष आर्थिक क्षेत्र विधेयक ने राज्य में कृषि भूमि पर अधिग्रहण करना आसान बना दिया। चूँकि राजस्थान बहुत ज्यादा शहरी राज्य नहीं है इसलिए केंद्र सरकार द्वारा रियल एस्टेट (नियामक एवं विकास) अधिनियम को पारित करने से पहले एक दूरदर्शी विधेयक ‘अपार्टमेंट स्वामित्व विधेयक’ ने संपत्ति के लेनदेन को और पारदर्शी बना दिया। राज्य ने विशेष रूप से नवीनीकरण ऊर्जा परियोजनाओं के लिए आसान भूमि अधिग्रहण के प्रावधान भी किए – यह ऐसा क्षेत्र है जिसमें राजस्थान आने वाले वर्षों में उच्च वृद्धि देखेगा, क्योंकि यह पर्याप्त धूप और बंजर भूमि के बड़े इलाकों से संपन्न है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को सात दिनों के भीतर ही भूमि आवंटन की अनुमति मिल जाती है और राज्य ने आसान भूमि आवंटन के लिए अपना खुद का एक भूमि बैंक बनाने की दिशा में काम किया है।

कृषि सुधार के लिए वसुंधरा राजे सरकार द्वारा उठाए गए कदम भी काफी अग्रणी रहे। उनकी सरकार ने राज्य की मंडियों में लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं को तर्कसंगत बनाकर एकल कृषि बाजार के निर्माण का मार्ग खोला। किसानों के लिए बागवानी उत्पादों की बिक्री को आसान बनाने के लिए बाजार शुल्क और कराधान संरचनाओं को भी तर्कसंगत बनाया गया। राजस्थान ने खरीदारों के कैप्टिव उपयोग के लिए कृषि उपज की थोक खरीद की भी अनुमति दी।

शायद सबसे महत्त्वपूर्ण अनुदार सुधार राज्य में भूमि अभिलेखों को एक वैधानिक समर्थन प्रदान करना था। राजस्थान छोटे और हाशिए पर वाले भू-स्वामियों के पक्ष में कानूनों के साथ, शायद सबसे ज्यादा मजबूत भूमि स्वामित्व और निजी संपत्ति वाले राज्यों में से एक है। राज्य ने फिर से छोटे भूमि स्वामियों का पक्ष लेते हुए लेनदेन से पहले भूमि एकत्रीकरण की भी अनुमति दी, अन्यथा छोटे भूमि स्वामियों को इस तरह के भूमि के लेनदेन करने के लिए काफी भागदौड़ करनी पड़ती थी।

निजी संपत्ति के अधिकारों की इस मान्यता को उदार बनाते हुए इतना और आगे बढ़ा दिया गया था कि जंगली और बंजर इलाकों में रहने वाले जनजातीय समुदाय वन उत्पादों का परिवहन और व्यापार कर सकते हैं।

वसुंधरा राजे ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली में निजी क्षेत्र को भी शामिल करने का प्रयोग किया। फ्यूचर ग्रुप को फेयर प्राइस शॉप ब्रांड वाले अन्नपूर्णा भंडार को चलाने के लिए तैयार किया गया, अन्नपूर्णा भंडार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के साथ कम दरों पर बेचने के लिए अपनी व्यापारिक वस्तुएं भी लाया। इसका उद्देश्य व्यापार को लाभदायक बनाना और फेयर प्राइस शॉप के मालिकों द्वारा की जाने वाली चोरी और जमाखोरी को कम करना था। यह साहसिक प्रयोग पूरी तरह से सफल तो नहीं हो पाया लेकिन शायद देश के पास अपनाने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली का यह एक आदर्श मॉडल है।

इस कार्यकाल में, वसुंधरा राजे ने राजस्थान के लिए एक बड़ी समस्या को हल करने में भी अच्छी तरक्की की – इसकी बिजली वितरण कंपनियों की हालत (डीआईएससीओएम)। कर्ज और बढ़ते घाटे से परेशान, राजस्थान सरकार ने मोदी सरकार की उज्जवल डिस्कॉम अश्योरेन्स योजना के माध्यम से डिस्कॉम के हिस्से के कर्ज को अपनी किताबों में हस्तांतरित कर दिया। फिर सरकार कोटा और भरतपुर जैसे शहरों में बिजली वितरण प्रबंधन के लिए निजी क्षेत्र की कंपनी सीईएससी को लाई, इस तरह से सरकार ने मूल समस्या – राज्य डिस्कॉम की अक्षमता – से निपटने की कोशिश की।

राजे सरकार ने 61 राज्य अधिनियमों और 187 मौलिक राज्य अधिनियमों को भंग करने के लिए एक विधेयक पारित किया, जो शासन के लिए प्रासंगिक नहीं थे। राजस्थान वेक्सेशियस लिटिगेशन (प्रिवेंशन) बिल, 2015 ने मुकदमा चलाने वाले दलों और महाधिवक्ताओं को निराशाजनक मामलों में हस्तक्षेप करने और उनको रद्द करने की अनुमति दी। यह राज्य में न्यायिक विलंब को कम करने में एक सराहनीय कदम था।

क्षमता निर्माण में भी राजस्थान ने बड़े बदलाव देखे हैं।

राजे ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान ही भामाशाह योजना को पुनर्जीवित कर दिया था लेकिन बाद में अशोक गहलोत सरकार ने इसे बंद कर दिया। भामाशाह योजना एक कार्ड आधारित सरकारी योजना है, जो समाज के आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों को अन्य चीजों के साथ किफायती स्वास्थ्य सेवाएं और पीडीएस (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) के लाभ प्रदान करती है। स्वास्थ्य सेवाओं के लाभ निजी-सार्वजनिक हिस्सेदारी के मॉडल पर प्रदान किए जाते हैं, यही योजना आयुष्मान भारत योजना की पथ प्रदर्शक बनी।

राणा प्रताप के एक विश्वसनीय सेनापति के नाम पर, भामाशाह योजना को राजे सरकार अपने इस कार्यकाल में फिर से शुरू करना चाहती थी, जिसका उद्देश्य वित्तीय समावेशन और अन्य सरकारी लाभों पर ध्यान केंद्रित करना होता। इस कार्ड की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह घर की महिला को ही मुख्य लाभार्थियों के रूप में रखती थी। यह योजना इतनी लोकप्रिय रही कि अशोक गहलोत, अगर कांग्रेस चुनाव जीतती है तो मुख्यमंत्री बनने के प्रबल दावेदार, ने साफ तौर पर कह दिया कि इस बार वे ‘वसुंधरा सरकार द्वारा किए गए अच्छे कामों’ पर प्रतिबंध नहीं लगाएंगे।

मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन योजना पूरे राज्य में एक प्रमुख और सर्वव्यापी जल संरक्षण कार्यक्रम के रूप में शुरू की गई थी। सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा देकर और आमतौर पर बारिश वाले राज्य में जल स्तर में सुधार पर ध्यान देकर, राजे सरकार ने कम निवेश और बड़े पैमाने पर जल संरक्षण उपायों को संस्थागत बनाने का प्रयास किया।

वसुंधरा राजे ने शिक्षा के क्षेत्र में छोटे लेकिन दिखाई देने वाले सुधार भी किए, उन्होंने स्कूली शिक्षा का घनत्व और पहुँच बढ़ाने के लिए इसमें भी निजी क्षेत्र की भागीदारी का प्रयास किया। शेखावटी जैसे पारंपरिक रूप से रूढ़िवादी क्षेत्रों में पिछले कुछ सालों से सरकारी या सरकार द्वारा सहायता प्राप्त स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो कि सेवा वितरण में सुधार को दर्शाता है।

केंद्र सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की केंद्रीय तेल इकाईयों के साथ कड़ी बातचीत के बाद बाड़मेर रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल्स कॉम्प्लेक्स परियोजना को फिर से शुरू किया गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काफी लंबे समय से लंबित रिफाइनरी के निर्माण को जनवरी 2018 में हरी झंडी दिखा दी, इसमें 6 बिलियन डॉलर से ज्यादा का निवेश किया जाएगा।

राजस्थान में क्षमता निर्माण ने केंद्र सरकार की योजनाओं का पूरा लाभ उठाया है। स्वच्छ भारत अभियान का एक हिस्सा होने के नाते राज्य को करीब 80 लाख से अधिक शौचालय प्राप्त हुए हैं। 950 से अधिक नए औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) खोले गए – राजस्थान में शिल्पकारों और स्वनियोजित श्रमिकों की बड़ी आबादी है – जो सीधे तौर पर आईटीआई प्रशिक्षण का लाभ उठा सकते हैं। राज्य में 8000 किलोमीटर से अधिक राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण किया गया, जो केवल पाँच सालों में मौजूदा 7000 किलोमीटर के सड़क नेटवर्क के दोगुने से ज्यादा है। सामाजिक सुरक्षा योजना जीवन ज्योति बीमा योजना में राजस्थान में 14 लाख से ज्यादा लोगों के नामांकन के साथ सबसे ज्यादा नामांकन देखा गया है। जनधन योजना के तहत 2 करोड़ 50 लाख से ज्यादा नए बैंक खाते खोले गए थे और भामाशाह योजना के तहत सीधे लाभ प्राप्त करने के लिए उनको इस योजना से भी लिंक किया गया था। प्रधानमंत्री आवास योजना, विद्युतीकरण योजना और साथ ही उज्जवला योजना ने राजस्थान में बहुत ही मजबूत पदचिह्न बनाए हैं।

इस आर्थिक आधारभूत संरचना को भी वसुंधरा राजे सरकार द्वारा लोकप्रियता के आधार पर शीर्ष स्थान पर रखा गया है। लगभग 200 शहरी केंद्रो में किफायती खाद्य आउटलेट हैं। नई माताओं को वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए योजनाएं हैं, जिनमें बालिका शिशु की माँ बनी माताओं पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। समाज के विशेष वर्गों के लिए आसान ऋण उपलब्ध हैं।

प्रभावशाली, सुसंगत और ठोस सरकारी पहलों की एक लंबी सूची होने के बावजूद वसुंधरा राजे सरकार का भाग्य अधर में लटका हुआ है।

जाति, सत्ता विरोध, विद्रोही उम्मीदवार और धारणा की लड़ाई वाला यह चुनाव अभियान 5 दिसंबर की शाम को थम गया। चुनावों को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर ध्यान आकर्षित करने के लिए शायद कई सालों तक राजे जैसे मुख्यमंत्रियों की जरूरत पड़ेगी।

इसके अलावा, परिणाम चाहे जो हो, वसुंधरा राजे अपने कार्यकाल पर इस संतुष्टि के साथ नज़र डाल सकती हैं कि उनकी सरकार एक विशिष्ट विचारधारा पर आधारित रही है।

आशीष चंदोरकर सार्वजनिक नीति, राजनीति और करेंट अफेयर्स पर लिखते हैं। वह पुणे में रहते हैं। इनका ट्वीटर हैंडिल @c_aashish है।