राजनीति
एक आधुनिक राष्ट्र भारत, एक मध्ययुग के युद्ध में फँसा है
अरुष टंडन - 15th February 2019

आशुचित्र- भारत सिर्फ पाकिस्तानी जिहादियों से ही लड़ने के लिए अस्तित्व में नहीं है, बल्कि पाकिस्तानी जिहादियों का एकमात्र उद्देश्य भारत के विरुद्ध जंग है।

जिहादियों के पास जन्नत का सुकून है। आधुनिक देशों को भविष्य की चिंता है।

क्या होगा अगर पुलवामा हमले का बदला लेने के लिए भारत पाकिस्तान से प्रतिकार करेगा या जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अज़हर को मार गिराएगा? इस कदम में जिहादियों द्वारा निश्चित बदले का जोखिम है। भारत की सुरक्षा व खुफिया संस्थाएँ निस्संदेह तैयार हैं लेकिन तब क्या जब सैंकड़ों में से कोई एक जिहादी भी आकर अपनी योजना को अंजाम दे देगा?

पाकिस्तान के विरुद्ध युद्ध छेड़ने से पहले भारत को सभी विकल्पों पर विचार करना होगा और यही भारत की कमज़ोरी है। सिर्फ इसलिए क्योंकि दूसरा पक्ष समय और संसाधनों को पूरी तरह व्यय करने के लिए तैयार है।

भारत सिर्फ पाकिस्तानी जिहादियों से ही लड़ने के लिए अस्तित्व में नहीं है, बल्कि पाकिस्तानी जिहादियों का एकमात्र उद्देश्य भारत के विरुद्ध जंग है। किसी भी युद्ध में भभारत को सभी दिशाओं के सभी विकल्पों पर विचार करना आवश्यक है। इससे होने वाले नुकसानों पर भी चर्चा आवश्यक है क्योंकि अंततः भारत को ही उसे झेलना होगा। वहीं, जिहाद में किसी प्रकार का नुकसान नहीं है। जब ज़िंदा है तो जिहादी जन्नत के रास्ते की ओर उन्मुख है और जब मर गया तो वह एक नायक है जिसे जन्नत नसीब हुई। जहाँ भारत को भविष्य की चिंता है, जिहादियों का कोई भविष्य ही नहीं है। उनके पास तो जन्नत है।

लेकिन निस्संदेह उन्हें भी भारत के प्रतिकार से भयभीत होना चाहिए और अपने लोगों की जानों के लिए चिंतित। हाँ, तर्क कहता है कि ऐसा होना चाहिए। लेकिन यदि ऐसा ही है तो क्यों वे अभी तक नहीं रुके और एक के बाद एक हमले क्यों कर रहे हैं। कोई यह कह सकता है कि भारत के रणनीतिक संयम के कारण ऐसा है। अभी तक भारत ने पाकिस्तानी जिहादियों को यह दर्शाया नहीं है कि हर आतंकी हमले के लिए उन्हें कीमत चुकानी पड़ेगी है। और निर्णय लेता हुआ कोई भी व्यक्ति उस कीमत को क्यों गिनेगा जो उसे पता है कि उसके ऊपर नहीं आएगी।

मुख्य बात यह है कि जहाँ पाकिस्तान से युद्ध को भारत दो आधुनिक देशों के मध्य युद्ध के रूप में देखता है, वहीं पाकिस्तान इसे एक धर्म युद्ध समझता है जिसे पूरा करना उसका कर्तव्य है। इस प्रकार एक युद्ध में दोनों पक्षों के रूख में अंतर है और यह भारत को बहुत नुकसान पहुँचा रहा है। भारत की कई समस्याओं में से पाकिस्तान एक है। वहीं पाकिस्तान के लिए ऐसा है कि यह भारत को हराकर इस्लाम की ऐतिहासिक सभ्यता परियोजना की पूर्ति करेगा। भारत सुरक्षा और नीतिगत हितों को ध्यान में रखकर पाकिस्तान के विरुद्ध अपनी रणनीति बनाता है या बनाने का प्रयास करता है। लेकिन वहीं भारत के प्रति पाकिस्तान की रणनीति एक दैवीय उद्देश्य की पूर्ति है।

लेकिन धर्म के इस बैनर के पीछे पहचान खोने का भय छिपा हुआ है। एक पहचान जिसमें एक देश को हमेशा तुच्छ समझा गया और हमेशा कम आँका गया।

पाकिस्तान (या इसे चलाने वाले राजनीतिज्ञों) के लिए भारत से संघर्ष अपनी पहचान को बनाए रखने का माध्यम है। ज़रा सोचें कि अगर पाकिस्तान और बारत सहयोगी पड़ोसी देश होते तो क्या होता। यदि ऐसा होता तो देर-सवेर यह प्रश्न उठता कि यदि पाकिस्तान और भारत शांतिपूर्वक रह सकते हैं तो क्या हिंदू और मुस्लिम भी शांतिपूर्वक रह सकते हैं? और यदि हिंदू और मुस्लिम शांतिपूर्वक रह सकते हैं तो विभाजन ही क्यों हुआ? फिर पाकिस्तान की ज़रूरत ही क्या है?

भारत से संघर्ष पाकिस्तान की पहचान के लिए पोषक तत्व है।

अभी तक कश्मीर पाकिस्तान को भारत-विरोधी दिखने का मौका दे रहा है। लेकिन यदि कश्मीर नहीं होता तो पाकिस्तानी भारत के किसी औऱ क्षेत्र को चुन लेता और वहाँ से युद्ध छेड़ता क्योंकि यदि भारत-विरोधी नहीं है तो फिर पाकिस्तान और क्या है?

भारत इस प्रकार से अस्तित्व की लड़ाई नहीं लड़ रहा है लेकिन इसने अपने पश्चिमी पड़ोसी के कारण बहुत नुकसान झेला है।

फिर सवाल यह है कि भारत किस तरह से एक ऐसे राज्य के खिलाफ खुद को सुरक्षित करे जो धार्मिक रूप से भारत को नुकसान पहुंचाना और यहां तक ​​कि उसे नष्ट करना चाहता है? भारत युद्ध जीत सकता है, प्रतिबंध लगा सकता है, संधियों को समाप्त कर सकता है, जिहादी नेताओं को समाप्त कर सकता है, लेकिन इनमें से कोई भी स्थायी शांति और सुरक्षा की गारंटी नहीं देता। पाकिस्तान में भारत-विरोधी विचारधारा बनी रहेगी। और इसे नए अनुयायी मिलते रहेंगे,और फिर ये सिलसिला चलता रहेगा।

भारत के लिए स्थायी शांति और सुरक्षा का वादा करने वाले केवल दो परिदृश्य दिखाई देते हैं।

पहला यह कि बलूचिस्तान और सिंध में अलगाववादी आंदोलनों के दबाव में पाकिस्तान इस क्षेत्र को छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित करे और इसके बाद अवशिष्ट, बहुत कमजोर, ‘पंजाब पाकिस्तानराज्य अपनी शक्तियों को भारत की बजाय कहीं ओर लगाने के लिए मजबूर हो जाएगा

दूसरा यह कि स्वप्रेरित होकर पाकिस्तान खुद के लिए एक नई पहचान बनाए जिसके लिए भारत के साथ लगातार संघर्ष करते रहना आवश्यक न है

निकट भविष्य में इनमें से किसी भी परिदृश्य के सही होने की संभावना केवल शून्य से थोड़ी अधिक है।

इसलिए भारत के लिए यह बहुत-बहुत लंबी लड़ाई है। एक ऐसा युद्ध जहाँ हालाँकि भारत इक्कीसवीं सदी के एक जिम्मेदार राष्ट्र की तरह अपने विकल्प चुनेगा, वहीं इसके शत्रुओं के लिए विकल्प चुनना बहुत आसान होगा। उन्हें केवल इस बात के बीच चयन करना होगा कि वे स्वर्ग जाते हैं या स्वर्ग जाने के मार्ग पर चलते हैं।

अरुष स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं। उनकी रुचि ऐतिहासिक व्यक्तित्वों, स्वतंत्र भारत के इतिहास और भारतीय संस्कृति में है।