राजनीति
रोहिंग्याओं के मामले में भारत को बांग्लादेश के सामने कठोर होना होगा

आशुचित्र- क्यों भारत को मानवाधिकार और अन्य संगठनों के दबाव का विरोध करना चाहिए जो रोहिंग्याओं को देश में आश्रय देने की बात कहते हैं।

भारत और बांग्लादेश के सीमा सैनिकों में पाँच दिन के तनाव के बाद मंगलवार को अंततः भारत ने निराश्रित 31 रोहिंग्याओं को आश्रय दिया। संभवतः नई दिल्ली अंतर्राष्ट्रीय दबाव में आ गई जिसमें खुले मैदान में आश्रयहीन रोहिंग्याओं, जो दोनों देशों के सशस्त्र सैनिकों के बीच फँसे हुए थे, को असहाय कहा जा रहा था।

भारतीय सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के अनुसार 18 जनवरी को ये रोहिंग्या बांग्लादेश के ब्राह्मणबरिया से त्रिपुरा के सेपाहिजला जिले में अवैध रूप से प्रवेश करने का प्रयास कर रहे थे। बीेसएप ने इन्हें प्रवेश करने नहीं दिया लेकिन खाना और पानी अवश्य दिया।

लेकिन बॉर्डर गार्ड्स बांग्लादेश (बीजीबी) ने दावा किया है कि ये 31 रोहिंग्या जिनमें कई बच्चे और महिलाएँ भी हैं, जम्मू-कश्मीर में रह रहे थे और बीएसएफ इन्हें बांग्लादेश में घुसाने का प्रयास कर रहा था। बीजीबी ने उन्हें प्रवेश नहीं करने दिया और वे दोनों देशों की सीमाओं के बीच फँस गए।

यदि बीजीबी की बात पर विश्वास भी किया जाए तो यह साफ है कि बांग्लादेश से प्रवेश किए बिना रोहिंग्या भारत में आकर जम्मू-कश्मीर में नहीं रह सकते थे। लाखों रोहिंग्या जो म्यानमार से बांग्लादेश में आए थे, उनमें से लगभग 40,000 अवैध रूप से भारत में प्रवेश कर चुके हैं।

ये रोहिंग्या म्यानमार के रखाइन से बांग्लादेश के चित्तागौंग प्रांत में प्रवेश कर रहे थे जहाँ उन्हें निर्धारित शिविरों में रहना था लेकिन यहाँ से वे आसानी से भाग सकते थे और त्रिपुरा के रास्ते भारत में प्रवेश करते थे। 2 करोड़ से ज़्यादा बांग्लादेशी अवैध रूप से भारत में प्रवेश कर असम और पश्चिम बंगाल में बस गए हैं।

नई दिल्ली को ढाका को यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि रोहिंग्याओं की ज़िम्मेदारी बांग्लादेश की है क्योंकि इसी ने उन्हें अपने देश में आश्रय देने का वादा किया था। और यह देखना भी ढाका की ही ज़िम्मेदारी है कि ये रोहिंग्या भारत सीमा पार न करें जैसा कि वे समूहों में करते आए हैं।

इन रोहिंग्याओं में अधिकांश कट्टर वहाबी इस्लाम को मानते हैं जिसके कारण बांग्लादेश भी इनसे परेशान है। रोहिंग्याओं के प्रति भारत की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है और इसे बांग्लादेश को यह स्पष्ट कर देना चाहिए कि ये उनका भार नहीं उठाएगा।

भविष्य में भी भारत को रोहिंग्याओं को आश्रय देने की बात स्वीकर नहीं करनी चाहिए। नई दिल्ली को सऊदी अरब का उदाहरण देना चाहिए जिसने इस्लामिक देश होने के बावजूद अवैध रूप से आए रोहिंग्याओं को वापस बांग्लादेश भेज दिया है। ढाका ट्रिब्युन की एक रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब ने 250 रोहिंग्याओं को जेद्दाह के डिटेंशन सेंटर में बड़ी विकट स्थिति में रखा था और अब ये उन्हें वापस भेज रहा है। इस गल्फ देश में लगभग तीन से पाँच लाख रोहिंग्या है और अंतर्राष्ट्रीय दबाव के बावजूद यह उन्हें वापस भेजने के निर्णय से पीछे नहीं हट रहा है।

जहाँ कई रोहिंग्या शरणार्थियों को सऊदी अरब ने वैध रूप से आश्रय दिया है, वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो जाली दस्तावेजों को प्रयोग कर वहाँ प्रवेश कर गए हैं। जेद्दाह को लगता है कि बांग्लादेश ने जान-बूझकर उनके जाली दस्तावेजों को नज़रअंदाज़ कर उन्हें सऊदी अरब में प्रवेश करवाया है।

म्यानमार से आए रोहिंग्याओं ने सबसे पहले बांग्लादेश में ही शरण ली, साथ ही शरणार्थियों का अतिरिक्त बोझ उठाने के लिए बांग्लादेश को विदेशी सहायता भी मिल रही है तो यह सुनिश्चित करना बांग्लादेश की ही ज़िम्मेदारी है कि रोहिंग्या निर्धारित शिविरों में ही रहें। जेद्दाह ने सीधे तौर पर ढाका को कह दिया है कि यदि बांग्लादेश यह सुनिश्चित नहीं कर सकता तो इसे उन रोहिंग्याओं को वापस लेने की ज़िम्मेदारी लेनी होगी जो जाली दस्तावेजों के माध्यम से सऊदी अरब में प्रवेश कर गए हैं।

भारत को भी इसी प्रकार की मुद्रा अपनानी चाहिए और उन संगठनों के दबाव का विरोध करना चाहिए जो मानवाधिकार के नाम पर रोहिंग्याओं को भारत में बसाना चाहते हैं। रोहिंग्याओं को म्यानमारी सुरक्षा बलों के हमले के कारण रखाइन छोड़ना पड़ा था। यह हिंसा इस्लामिक स्टेट (आईएस) से संबंधित अराकन रोहिंग्या सैल्वेशन आर्मी (अरसा) द्वारा म्यानमारी बलों और बौद्धों पर किए गए हमलों से भड़की थी। अधिकांश रोहिंग्या कट्टरपंथी हैं व अरसा से उनके संबंध हैं।

20वीं सदी की शुरुआत से रोहिंग्या बड़ी संख्या में म्यानमारी बौद्धों की हत्या करते आए हैं। रोहिंग्याओं ने रखाइन का म्यानमार से अलग कर पीर्वी पाकिस्तान में जोड़ने के लिए एक सैन्य विद्रोह छेड़ दिया था। इस विद्रेह की असफलता के बावजूद रोहिंग्या रखाइन के अराकनी बौद्धों की सामुदायिक सफाई करने का प्रयास करते रहे हैं।